इस्तांबुल,14 फरवरी (युआईटीवी)- रूस और यूक्रेन के बीच जारी भीषण युद्ध को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंबे समय से कूटनीतिक प्रयास किए जा रहे हैं। अमेरिका की मध्यस्थता में अब तक दो दौर की शांति वार्ता हो चुकी है और अब तीसरे दौर की बैठक स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर में आयोजित होने जा रही है। यह बैठक 17-18 फरवरी को प्रस्तावित है,जिसमें रूस,यूक्रेन और अमेरिका के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस संभावित वार्ता को लेकर उम्मीदें भी हैं और आशंकाएँ भी,क्योंकि पिछले दो दौर में कुछ प्रगति के संकेत तो मिले,लेकिन मूल विवादों पर कोई ठोस सहमति नहीं बन पाई।
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने प्रेस ब्रीफिंग के दौरान पुष्टि की कि अगली बैठक अगले सप्ताह आयोजित होगी। उन्होंने कहा कि स्थान और सटीक तारीखों की आधिकारिक घोषणा जल्द की जाएगी,लेकिन यह स्पष्ट है कि वार्ता अगले सप्ताह ही होगी। तुर्किए की सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलु एजेंसी के मुताबिक,बैठक का आयोजन जिनेवा में 17-18 फरवरी को किया जाएगा। जिनेवा को लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक वार्ताओं का केंद्र माना जाता है,ऐसे में इस शहर का चयन भी प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है।
इससे पहले जनवरी में और फिर फरवरी की शुरुआत में संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी आबू धाबी में दोनों पक्षों के बीच दो दौर की वार्ता हुई थी। इन बैठकों में अमेरिका ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। दूसरे दौर की बातचीत में एक अहम प्रगति तब देखने को मिली,जब दोनों देशों ने युद्धबंदियों की अदला-बदली पर सहमति जताई। यह युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार था जब इस स्तर पर कैदियों की रिहाई को लेकर ठोस कदम उठाया गया।
फरवरी की शुरुआत में हुई बातचीत के बाद रूस और यूक्रेन ने लगभग पाँच महीने के अंतराल के बाद बड़े पैमाने पर कैदियों की अदला-बदली की। दोनों पक्षों ने 157-157 कैदियों को रिहा किया। यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने बताया कि रिहा किए गए लोगों में सैन्यकर्मियों के साथ-साथ आम नागरिक भी शामिल थे। इसे मानवीय दृष्टिकोण से एक सकारात्मक कदम माना गया,जिसने यह संकेत दिया कि दोनों देशों के बीच संवाद की संभावना अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
हालाँकि,कैदियों की अदला-बदली जैसे मानवीय मुद्दों पर सहमति बनने के बावजूद क्षेत्रीय विवाद,युद्धविराम और सुरक्षा गारंटी जैसे मूल मुद्दों पर अब भी गहरी खाई बनी हुई है। बातचीत के बाद रूस और यूक्रेन की ओर से कोई संयुक्त राजनीतिक या सुरक्षा बयान जारी नहीं किया गया,जिससे यह स्पष्ट होता है कि आपसी मतभेद अब भी गंभीर हैं। यूक्रेन की राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा परिषद के सचिव रुस्तम उमेरोव ने कहा कि यूक्रेनी प्रतिनिधिमंडल ने सम्मानजनक और स्थायी शांति की माँग की,लेकिन उन्होंने किसी ठोस परिणाम का खुलासा नहीं किया।
अमेरिका की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में बेहद महत्वपूर्ण रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने बातचीत को सकारात्मक और ठोस बताया था। उन्होंने पुष्टि की कि अमेरिका,रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधि कैदियों की अदला-बदली पर सहमत हुए हैं,लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि व्यापक समाधान तक पहुँचने के लिए अभी कई दौर की बातचीत और कठिन फैसलों की जरूरत होगी। अमेरिका लगातार यह प्रयास कर रहा है कि कम से कम मानवीय मुद्दों पर सहमति बनती रहे,जिससे भविष्य में बड़े समझौते की राह आसान हो सके।
रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष अब केवल दो देशों तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि यह वैश्विक राजनीति,ऊर्जा सुरक्षा और यूरोपीय स्थिरता से भी जुड़ चुका है। युद्ध के चलते हजारों लोगों की जान जा चुकी है और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। ऐसे में जिनेवा में होने वाली तीसरे दौर की वार्ता को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय गंभीरता से देख रहा है। स्विट्जरलैंड लंबे समय से तटस्थ देश रहा है और शांति वार्ताओं की मेजबानी के लिए जाना जाता है,इसलिए यहाँ बातचीत होना दोनों पक्षों के लिए एक सुरक्षित मंच प्रदान कर सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि अगर जिनेवा वार्ता में युद्धविराम की दिशा में कोई ठोस संकेत मिलता है तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। हालाँकि,जमीन के विवाद,कब्जाए गए क्षेत्रों की स्थिति और भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दे बेहद जटिल हैं। रूस अपनी सुरक्षा चिंताओं और रणनीतिक हितों का हवाला देता रहा है,जबकि यूक्रेन अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं दिखता।
इन परिस्थितियों में जिनेवा की बैठक को निर्णायक कहना जल्दबाजी होगी,लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि संवाद की निरंतरता ही फिलहाल सबसे बड़ी उम्मीद है। कैदियों की अदला-बदली जैसे कदम विश्वास बहाली की दिशा में छोटे लेकिन महत्वपूर्ण संकेत हैं। यदि इन प्रयासों को आगे बढ़ाया जाता है और मानवीय मुद्दों पर सहमति कायम रहती है,तो भविष्य में व्यापक शांति समझौते की संभावना मजबूत हो सकती है।
फिलहाल दुनिया की नजरें 17-18 फरवरी को जिनेवा में होने वाली बैठक पर टिकी हैं। क्या यह वार्ता युद्धविराम की दिशा में ठोस कदम साबित होगी या फिर मतभेदों की लंबी सूची में एक और अध्याय जुड़ जाएगा,यह आने वाला समय ही बताएगा,लेकिन इतना तय है कि कूटनीतिक प्रयास जारी रहना ही इस संघर्ष से बाहर निकलने की एकमात्र राह है।
