नई दिल्ली,19 फरवरी (युआईटीवी)- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फिल्म निर्माता विक्रम भट्ट और उनकी पत्नी श्वेतांबरी भट्ट को कथित करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी के मामले में नियमित जमानत दे दी है। यह मामला आईवीएफ उद्यमी अजय मुर्डिया की दिवंगत पत्नी की प्रस्तावित बायोपिक से जुड़े एक फिल्म सौदे को लेकर उत्पन्न वित्तीय विवाद से संबंधित है। दंपति को पिछले वर्ष दिसंबर में राजस्थान पुलिस ने गिरफ्तार किया था और उन्हें जोधपुर केंद्रीय जेल में रखा गया था।
इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने श्वेतांबरी भट्ट को अंतरिम जमानत दी थी,जबकि विक्रम भट्ट की याचिका पर सुनवाई जारी थी। अब न्यायालय के ताजा आदेश ने राजस्थान उच्च न्यायालय के उस फैसले को निरस्त कर दिया है,जिसमें दंपति को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। इस निर्णय को फिल्म जगत और कानूनी हलकों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ,जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली शामिल थे,ने मामले की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया यह एक व्यावसायिक लेन-देन से जुड़ा विवाद प्रतीत होता है। हालाँकि,प्राथमिकी में धोखाधड़ी के आरोपों का उल्लेख किया गया है,लेकिन न्यायालय ने संकेत दिया कि विवाद का समाधान आपराधिक मुकदमेबाजी के बजाय मध्यस्थता के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।
न्यायालय ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया कि वे सर्वोच्च न्यायालय मध्यस्थता केंद्र से संपर्क कर वित्तीय असहमति को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने की संभावनाएँ तलाशें। पीठ ने यह भी कहा कि जमानत इस अपेक्षा के साथ दी जा रही है कि पक्षकार विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए ईमानदारी से प्रयास करेंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं है,बल्कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए राहत प्रदान की गई है।
शिकायतकर्ता अजय मुर्डिया के अनुसार,उन्होंने विक्रम भट्ट और उनकी पत्नी के साथ एक फिल्म परियोजना को लेकर समझौता किया था,जिसमें उनकी दिवंगत पत्नी के जीवन पर आधारित बायोपिक बनाने की योजना थी। आरोप है कि दंपति ने उन्हें फिल्म में 30 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करने के लिए प्रेरित किया और भारी मुनाफे का आश्वासन दिया,जो बाद में पूरा नहीं हुआ। शिकायत में कहा गया है कि परियोजना अपेक्षित रूप से आगे नहीं बढ़ी और निवेश की राशि को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया।
वहीं,बचाव पक्ष का कहना है कि समझौता केवल एक बायोपिक तक सीमित नहीं था,बल्कि इसमें कई फिल्म परियोजनाएँ शामिल थीं। उनके अनुसार,कुछ परियोजनाओं पर कार्य शुरू भी हो चुका था और निवेश का उपयोग फिल्म निर्माण की प्रक्रिया में किया गया। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि यह मामला एक कारोबारी विवाद है,जिसे आपराधिक रंग देना उचित नहीं है।
विक्रम भट्ट हिंदी फिल्म उद्योग के जाने-माने निर्देशक और निर्माता हैं। उन्होंने 1992 में फिल्म ‘जानम’ से अपने निर्देशन करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद उन्होंने ‘मदहोश’, ‘गुनाहगार’, ‘बंबई का बाबू’, ‘जुल्म’ और ‘कसूर’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया। वर्ष 2002 में रिलीज हुई उनकी फिल्म ‘राज’ बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई और आज भी इसे हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय हॉरर फिल्मों में गिना जाता है। उनके करियर में थ्रिलर और हॉरर शैली की फिल्मों का विशेष स्थान रहा है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख यह संकेत देता है कि न्यायपालिका व्यावसायिक विवादों में आपसी सहमति और वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को प्राथमिकता देने के पक्ष में है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यदि विवाद का मूल स्वरूप अनुबंध और वित्तीय लेन-देन से जुड़ा है,तो मध्यस्थता एक व्यावहारिक रास्ता हो सकता है।
फिलहाल,दंपति को नियमित जमानत मिल गई है और वे कानूनी प्रक्रिया में सहयोग करने के लिए बाध्य होंगे। आगे की कार्यवाही और मध्यस्थता प्रक्रिया के परिणाम पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी। फिल्म उद्योग में भी इस फैसले को ध्यान से देखा जा रहा है,क्योंकि यह मामला मनोरंजन क्षेत्र में निवेश और अनुबंध संबंधी विवादों के लिए एक मिसाल बन सकता है।
