‘द केरल स्टोरी 2: गोज बियॉन्ड’ (तस्वीर क्रेडिट@KomalNahta)

‘केरला स्टोरी-2’ पर घिरी कानूनी बहस: केरल हाई कोर्ट ने निर्माताओं और सीबीएफसी को जारी किया नोटिस

कोच्चि,20 फरवरी (युआईटीवी)- केरल हाई कोर्ट ने गुरुवार को हिंदी फीचर फिल्म ‘केरला स्टोरी-2’ के निर्माताओं और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत कर दी है। यह नोटिस उस रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान जारी किया गया,जिसमें फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा दिए गए प्रमाणन को चुनौती दी गई है। याचिका में फिल्म के टीजर और ट्रेलर की सामग्री पर गंभीर आपत्तियाँ उठाई गई हैं और आरोप लगाया गया है कि प्रमाणन प्रक्रिया में वैधानिक प्रावधानों का समुचित पालन नहीं किया गया।

याचिकाकर्ता का कहना है कि फिल्म की प्रचार सामग्री में विभिन्न राज्यों की महिलाओं को प्रेम संबंधों के माध्यम से फंसाकर जबरन धार्मिक परिवर्तन के लिए मजबूर किए जाने का चित्रण किया गया है। हालाँकि,कथित कहानी को कई राज्यों में फैली घटनाओं से जोड़ा गया बताया गया है,लेकिन फिल्म के शीर्षक में आतंकवाद,जबरन धर्मांतरण और जनसांख्यिकीय साजिश जैसे संवेदनशील मुद्दों को केवल केरल राज्य से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि इस प्रकार की प्रस्तुति राज्य की छवि और सामाजिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।

याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से टीजर के अंत में प्रदर्शित हिंदी नारे “अब सहेंगे नहीं,लड़ेंगे” पर आपत्ति दर्ज की है। उनका कहना है कि यह नारा प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का आह्वान करता प्रतीत होता है और इससे सांप्रदायिक तनाव भड़कने की आशंका उत्पन्न हो सकती है। अदालत के समक्ष प्रस्तुत दलीलों में कहा गया कि सिनेमा की व्यापक पहुँच को देखते हुए ऐसे संदेशों का प्रभाव गहरा हो सकता है,विशेषकर तब जब विषय पहले से ही संवेदनशील हो।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने सिनेमैटोग्राफ अधिनियम,1952 की धारा 5बी के तहत निर्धारित मानकों का उचित पालन नहीं किया। इस धारा के अनुसार किसी भी फिल्म को प्रमाणन तब नहीं दिया जा सकता,यदि उसकी सामग्री सार्वजनिक व्यवस्था,शालीनता या नैतिकता के विरुद्ध हो अथवा अपराध के लिए उकसाने की संभावना रखती हो। याचिकाकर्ता का तर्क है कि फिल्म के ट्रेलर और टीजर की भाषा तथा दृश्य इन मानकों के अनुरूप नहीं हैं और प्रमाणन से पूर्व गहन परीक्षण अपेक्षित था।

याचिका में वर्ष 2023 में प्रदर्शित फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ से जुड़े मामले का भी उल्लेख किया गया है,जिस पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हुई थी। उस दौरान निर्माताओं ने एक स्पष्ट डिस्क्लेमर जोड़ने पर सहमति जताई थी,जिसमें यह कहा गया था कि फिल्म में प्रस्तुत कुछ आँकड़ों के लिए प्रामाणिक डेटा उपलब्ध नहीं है और कहानी आंशिक रूप से काल्पनिक है। याचिकाकर्ता का कहना है कि पूर्व में न्यायिक हस्तक्षेप और विवादों के बावजूद सीक्वल को पर्याप्त परीक्षण के बिना प्रमाणित कर दिया गया,जबकि इसकी सामग्री का सामाजिक और सांप्रदायिक प्रभाव गंभीर हो सकता है।

याचिका में यह भी रेखांकित किया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संरक्षित है,किंतु यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा और नैतिकता के हित में इस पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अदालत के समक्ष प्रस्तुत दलीलों में कहा गया कि जब किसी रचनात्मक कृति का प्रभाव व्यापक जनसमूह पर पड़ता हो,तब उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है। इस संदर्भ में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 196 और 197 का उल्लेख करते हुए यह दावा किया गया है कि फिल्म की सामग्री धार्मिक या क्षेत्रीय समूहों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा दे सकती है।

याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि फिल्म को दिए गए प्रमाणन को रद्द किया जाए,शीर्षक और डिस्क्लेमर पर पुनर्विचार किया जाए तथा आगे की न्यायिक समीक्षा तक फिल्म की रिलीज पर अंतरिम रोक लगाई जाए। अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद संबंधित पक्षों से जवाब माँगा है और मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को निर्धारित की है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण परीक्षण बन सकता है। भारत में सिनेमा को सामाजिक विमर्श का सशक्त माध्यम माना जाता है और कई बार फिल्मों ने संवेदनशील मुद्दों पर बहस को जन्म दिया है। हालाँकि,अदालतें बार-बार यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि कलात्मक अभिव्यक्ति पर अंकुश अंतिम उपाय होना चाहिए,लेकिन जब सामग्री से संभावित सामाजिक तनाव की आशंका हो,तब न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बनती है।

राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएँ भी इस मामले में सामने आ सकती हैं,क्योंकि विषय सीधे तौर पर धार्मिक और क्षेत्रीय पहचान से जुड़ा है। इससे पहले भी ऐसी फिल्मों पर व्यापक बहस और विरोध प्रदर्शन हुए हैं। अदालत का निर्णय न केवल इस फिल्म के भविष्य को प्रभावित करेगा,बल्कि प्रमाणन प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी व्यापक असर डाल सकता है।

फिलहाल,फिल्म के निर्माता और प्रमाणन बोर्ड को अदालत में अपना पक्ष रखना होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे फिल्म की सामग्री को कलात्मक स्वतंत्रता के दायरे में उचित ठहराते हैं या किसी प्रकार के संशोधन और डिस्क्लेमर के लिए सहमत होते हैं। अदालत की अगली सुनवाई तक इस मामले पर कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा जारी रहने की संभावना है।