बाफ्टा में चमकी मणिपुरी फिल्म ‘बूंग’ (तस्वीर क्रेडिट@FarOutAkhtar)

बाफ्टा में चमकी मणिपुरी फिल्म ‘बूंग’, क्षेत्रीय सिनेमा को मिला वैश्विक सम्मान

मुंबई,23 फरवरी (युआईटीवी)- भारतीय सिनेमा के लिए यह गर्व और उपलब्धि का क्षण है कि मणिपुरी भाषा की कॉमेडी-ड्रामा फीचर फिल्म ‘बूंग’ को इस वर्ष सर्वश्रेष्ठ बाल एवं पारिवारिक फिल्म के लिए प्रतिष्ठित बाफ्टा पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। वैश्विक स्तर पर सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में गिने जाने वाले बाफ्टा अवार्ड्स में किसी क्षेत्रीय भारतीय फिल्म का इस तरह सम्मानित होना न केवल मणिपुर,बल्कि पूरे देश के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।

फिल्म ‘बूंग’ का निर्माण एक्सेल एंटरटेनमेंट के बैनर तले हुआ है,जिसकी अगुवाई अभिनेता-निर्माता फरहान अख्तर करते हैं। इस फिल्म का निर्देशन प्रतिभाशाली फिल्मकार लक्ष्मीप्रिया देवी ने किया है। यह इस वर्ष की पहली भारतीय फिल्म थी,जिसे बाफ्टा में नामांकन मिला और अब इसे सर्वश्रेष्ठ बाल एवं पारिवारिक फिल्म का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है। यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि भारत की क्षेत्रीय कहानियाँ और भाषाएँ भी अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों के दिलों तक पहुँचने की क्षमता रखती हैं।

पुरस्कार समारोह के दौरान लक्ष्मीप्रिया देवी जब मंच पर ट्रॉफी लेने पहुँचीं तो उनके साथ फरहान अख्तर भी मौजूद थे। मंच पर पहुँचते ही लक्ष्मीप्रिया भावुक हो गईं और उन्होंने बाफ्टा का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी छोटी सी फिल्म को इतना बड़ा सम्मान और प्रेम मिलना अविश्वसनीय है। उन्होंने अपने संबोधन में कहा, “यहाँ तक चलना ऐसा लग रहा था मानो किसी पहाड़ की चोटी पर पहुँचने के आखिरी कुछ कदम बचे हों,जिस पर चढ़ने के बारे में हमें कभी पता ही नहीं था।” उनकी इस पंक्ति ने सभागार में मौजूद दर्शकों को भावुक कर दिया।

अपनी स्पीच में लक्ष्मीप्रिया देवी ने अपने गृह राज्य मणिपुर का जिक्र करते हुए कहा कि यह फिल्म और यह जीत उनके राज्य को समर्पित है,जिसे अक्सर नजरअंदाज और कम प्रतिनिधित्व वाला क्षेत्र माना जाता है। उन्होंने कहा कि ‘बूंग’ भारत के एक बेहद परेशान,उपेक्षित और कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्र की पृष्ठभूमि पर आधारित है। उन्होंने वैश्विक मंच से मणिपुर में शांति की वापसी के लिए प्रार्थना भी की और उम्मीद जताई कि सिनेमा संवाद और समझ का माध्यम बन सकता है।

फिल्म ‘बूंग’ की कहानी मणिपुर सीमा पर बढ़ते नस्लीय तनाव और सामाजिक अस्थिरता के बीच जीवन जी रहे एक स्कूली बच्चे के इर्द-गिर्द घूमती है। यह बच्चा बचपन से ही हिंसा,उपेक्षा और असुरक्षा का अनुभव करता आया है। कहानी में वह अपने बिखरे परिवार को फिर से एकजुट करने और अपने बिछड़े पिता को वापस लाने की कोशिश करता है। यह संघर्ष केवल एक बच्चे की निजी लड़ाई नहीं,बल्कि उस पूरे समाज की पीड़ा का प्रतीक है,जो वर्षों से अस्थिरता और संघर्ष से गुजर रहा है। फिल्म बेहद संवेदनशील ढंग से सामाजिक और राजनीतिक तनाव की पृष्ठभूमि को उकेरती है और यह दिखाती है कि इन परिस्थितियों का असर सबसे ज्यादा मासूम बच्चों पर पड़ता है।

‘बूंग’ ने बाफ्टा से पहले भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। साल 2024 में इसका प्रीमियर टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के डिस्कवरी सेक्शन में हुआ था,जहाँ इसे नई और प्रभावशाली आवाज के रूप में सराहा गया। इसके अलावा फिल्म का प्रदर्शन वारसॉ अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव 2024 में भी हुआ। भारत में इसे 55वें भारत के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित किया गया,जहाँ दर्शकों और समीक्षकों ने इसे खूब सराहा। फिल्म को मेलबर्न के भारतीय फिल्म महोत्सव 2025 में भी दिखाया गया,जिससे इसकी वैश्विक पहचान और मजबूत हुई।

फिल्म समीक्षकों का मानना है कि ‘बूंग’ की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी और सच्चाई है। बिना किसी बड़े बजट या भव्यता के,यह फिल्म अपने किरदारों और भावनाओं के जरिए दर्शकों से गहरा जुड़ाव स्थापित करती है। मणिपुरी संस्कृति,स्थानीय परिवेश और सामाजिक यथार्थ को बेहद प्रामाणिक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। यही कारण है कि यह फिल्म केवल एक क्षेत्रीय कहानी न रहकर वैश्विक मानवीय अनुभव बन जाती है।

फरहान अख्तर ने भी इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए कहा कि क्षेत्रीय कहानियों को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिलना भारतीय सिनेमा के विकास का संकेत है। उन्होंने लक्ष्मीप्रिया देवी और पूरी टीम की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह की कहानियों को सामने लाना जरूरी है,ताकि देश के दूरदराज के इलाकों की आवाज भी सुनी जा सके।

बाफ्टा में ‘बूंग’ की जीत ने यह साबित कर दिया है कि सिनेमा की भाषा सार्वभौमिक होती है। चाहे कहानी मणिपुर के छोटे से गाँव की हो या किसी बड़े महानगर की,अगर उसमें सच्चाई और संवेदना है,तो वह दुनिया भर के दर्शकों के दिलों को छू सकती है। यह सम्मान न केवल एक फिल्म की सफलता है,बल्कि उन अनगिनत कहानियों के लिए प्रेरणा है,जो अब तक हाशिए पर रही हैं। ‘बूंग’ की यह जीत भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा के लिए एक नई दिशा और नई उम्मीद लेकर आई है।