तेहरान,26 फरवरी (युआईटीवी)- ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयासों को नया आयाम देने के उद्देश्य से ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची बुधवार को एक राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए जेनेवा के लिए रवाना हुए। यहाँ दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता का नया दौर प्रस्तावित है। यह बातचीत ऐसे समय में हो रही है,जब वेस्ट एशिया क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य तैनाती के कारण दोनों देशों के संबंधों में तनाव बना हुआ है।
चीनी समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार,क्षेत्रीय परिस्थितियों और सुरक्षा चिंताओं के चलते यह वार्ता अहम मानी जा रही है। अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कुछ महीनों में बयानबाजी तेज हुई है,विशेषकर परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर। ऐसे में जेनेवा में होने वाली यह अप्रत्यक्ष बातचीत संभावित समझौते की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है।
विदेश मंत्री अराघची ने रवाना होने से एक दिन पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि ईरान गुरुवार को अमेरिका के साथ वार्ता फिर से शुरू करेगा और वह न्यायसंगत तथा समान समझौते के संकल्प के साथ वार्ता में भाग लेंगे। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के पास एक ऐतिहासिक अवसर है कि वे एक ऐसा अभूतपूर्व समझौता करें,जो पारस्परिक चिंताओं का समाधान करे और साझा हितों की रक्षा करे। अराघची ने इस बात पर जोर दिया कि समझौता संभव है,बशर्ते कूटनीति को प्राथमिकता दी जाए और संवाद को ईमानदारी से आगे बढ़ाया जाए।
ईरान की आधिकारिक समाचार एजेंसी आईआरएनए के मुताबिक,ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गलीबाफ ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अमेरिका के प्रति ईरान के सभी विकल्प खुले हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि तेहरान गरिमा-आधारित कूटनीति को प्राथमिकता देता है,लेकिन यदि आवश्यक हुआ तो वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटेगा। गलीबाफ के इस बयान को कूटनीतिक लचीलेपन और सामरिक सख्ती के मिश्रण के रूप में देखा जा रहा है।
दूसरी ओर,अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी मंगलवार को कहा कि वह ईरान के साथ टकराव को कूटनीति के माध्यम से सुलझाना पसंद करेंगे। हालाँकि,उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी भी परिस्थिति में ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं देंगे। ट्रंप के इस बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका वार्ता के लिए तैयार है,लेकिन परमाणु कार्यक्रम को लेकर उसकी सख्त शर्तें बरकरार हैं।
इसी बीच,ईरान के उप विदेश मंत्री (राजनीतिक मामलों) मजिद तक़्त रावांची ने भी वार्ता को लेकर सकारात्मक रुख व्यक्त किया है। उन्होंने एनपीआर रेडियो को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि ईरान परमाणु समझौता हासिल करने के लिए जो भी आवश्यक होगा,करने को तैयार है। रावांची ने कहा कि ईरान जेनेवा में पूरी ईमानदारी और सद्भावना के साथ वार्ता कक्ष में प्रवेश करेगा और उसे उम्मीद है कि अमेरिकी पक्ष भी इसी भावना के साथ आगे बढ़ेगा।
रावांची ने आगे कहा कि यदि सभी पक्षों में राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद है,तो समझौता जल्द ही संभव है। उनके अनुसार,मौजूदा परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण अवश्य हैं,लेकिन संवाद और कूटनीतिक प्रयासों के जरिए समाधान निकाला जा सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि जेनेवा में होने वाली यह अप्रत्यक्ष वार्ता दोनों देशों के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों और परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की चिंताओं के बीच यह जरूरी हो गया है कि दोनों पक्ष तनाव को कम करने के लिए ठोस कदम उठाएं।
ईरान और अमेरिका के बीच संबंध लंबे समय से उतार-चढ़ाव से गुजरते रहे हैं। 2015 के परमाणु समझौते के बाद कुछ समय के लिए तनाव में कमी आई थी,लेकिन बाद की राजनीतिक घटनाओं और प्रतिबंधों ने हालात को फिर जटिल बना दिया। अब जब दोनों देश एक बार फिर वार्ता की मेज पर लौट रहे हैं,तो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की निगाहें इस प्रक्रिया पर टिकी हैं।
जेनेवा में प्रस्तावित यह दौर भले ही अप्रत्यक्ष हो,लेकिन इसके परिणाम सीधे तौर पर क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा पर प्रभाव डाल सकते हैं। यदि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है,तो यह न केवल परमाणु कार्यक्रम पर स्पष्टता ला सकती है,बल्कि आर्थिक प्रतिबंधों और सुरक्षा चिंताओं पर भी प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
फिलहाल,दोनों देशों के नेताओं के बयानों से संकेत मिलता है कि कूटनीति को एक और मौका दिया जा रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह प्रयास स्थायी समाधान की ओर बढ़ता है या फिर मतभेदों की खाई और गहरी होती है।
