होर्मुज जलडमरूमध्य संकट से तेल बाजार में उथल-पुथल (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

होर्मुज जलडमरूमध्य संकट से तेल बाजार में उथल-पुथल,कीमतें 100 डॉलर के पार; ट्रंप बोले—‘ईरान के परमाणु खतरे के खिलाफ यह अस्थायी कीमत’

नई दिल्ली,9 मार्च (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा झटका देखने को मिला है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित होने के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह तेजी वैश्विक बाजारों के लिए चिंताजनक संकेत है और यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है,तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल की कीमतों में इस अचानक आई तेजी का बचाव करते हुए कहा कि यह ईरान के परमाणु खतरे का सामना करने के लिए चुकाई जा रही अस्थायी कीमत है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखे एक संदेश में कहा कि जब तक ईरान के परमाणु खतरे को पूरी तरह समाप्त नहीं कर दिया जाता,तब तक दुनिया को कुछ आर्थिक दबाव झेलने पड़ सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि जब यह खतरा खत्म हो जाएगा,तो तेल की कीमतें जल्द ही सामान्य स्तर पर लौट आएँगी।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि मध्य पूर्व के कई बड़े तेल उत्पादकों ने उत्पादन कम करना शुरू कर दिया है और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति लगभग ठप जैसी स्थिति में पहुँच गई है। यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया के सबसे व्यस्त ऊर्जा परिवहन मार्गों में गिना जाता है।

तेल बाजार में तेजी का असर प्रमुख बेंचमार्क कीमतों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। अमेरिकी मानक तेल पश्चिम टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमत लगभग 20.75 प्रतिशत बढ़कर 109.75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई है। इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला मानक कच्चा तेल भी 18 प्रतिशत से अधिक बढ़कर करीब 109.48 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गया। विश्लेषकों का कहना है कि यह तेजी 1980 के दशक की शुरुआत के बाद तेल वायदा कारोबार में दर्ज सबसे बड़े साप्ताहिक उछालों में से एक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में यह उछाल केवल मौजूदा आपूर्ति संकट की वजह से नहीं है,बल्कि भविष्य की आशंकाओं ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। निवेशकों और ऊर्जा कंपनियों को डर है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो तेल की आपूर्ति में और गंभीर बाधाएँ आ सकती हैं। इस समुद्री मार्ग से दुनिया के कुल समुद्री तेल परिवहन का बड़ा हिस्सा गुजरता है और तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की बड़ी मात्रा भी इसी रास्ते से वैश्विक बाजारों तक पहुँचती है।

रिपोर्टों के मुताबिक क्षेत्र में बढ़ते हमलों और सुरक्षा खतरों के कारण तेल टैंकरों की आवाजाही भी प्रभावित हुई है। कई जहाज मालिक और शिपिंग कंपनियाँ इस क्षेत्र से गुजरने से बच रही हैं या फिर अपनी यात्राओं को धीमा कर रही हैं। परिणामस्वरूप तेल की आपूर्ति में देरी हो रही है और वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ती जा रही है। ऊर्जा उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति बनी रहती है तो दुनिया भर में ईंधन की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है।

खाड़ी क्षेत्र के कुछ प्रमुख तेल उत्पादकों ने भी उत्पादन कम करना शुरू कर दिया है। कई तेल भंडारण टैंक तेजी से भर रहे हैं क्योंकि निर्यात मार्गों में बाधा आने के कारण कंपनियों के लिए तेल को बाजार तक पहुँचाना मुश्किल हो गया है। कुछ ऊर्जा कंपनियों को तो अपने तेल कुओं को अस्थायी रूप से बंद करना या उत्पादन की गति कम करनी पड़ रही है। इससे वैश्विक आपूर्ति और अधिक प्रभावित हो सकती है।

तेल की कीमतों में इस उछाल का असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहा है,बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। एशियाई शेयर बाजारों में कारोबार शुरू होते ही भारी गिरावट देखने को मिली। जापान का प्रमुख शेयर सूचकांक लगभग पाँच प्रतिशत तक गिर गया। इसी तरह दक्षिण कोरिया के शेयर बाजार में सात प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएँ ऊर्जा आयात पर काफी हद तक निर्भर हैं और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से उनके उद्योगों और व्यापार पर सीधा असर पड़ सकता है।

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी से वैश्विक मुद्रास्फीति भी बढ़ सकती है। ईंधन महँगा होने से परिवहन लागत बढ़ जाती है और इसका असर खाद्य पदार्थों से लेकर उपभोक्ता वस्तुओं तक की कीमतों पर पड़ता है। यही वजह है कि ऊर्जा संकट अक्सर व्यापक आर्थिक समस्याओं का कारण बन जाता है।

ऊर्जा क्षेत्र के इतिहासकार डेनियल येर्गिन ने इस स्थिति को बेहद गंभीर बताते हुए कहा है कि यह रोजाना तेल उत्पादन के लिहाज से दुनिया के इतिहास में सबसे बड़े व्यवधानों में से एक बन सकता है। उनके अनुसार यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है,तो वैश्विक ऊर्जा बाजार को भारी झटका लग सकता है।

इस संकट का असर वैश्विक व्यापार मार्गों पर भी पड़ रहा है। मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे के कारण एशिया,यूरोप और मध्य पूर्व के बीच व्यापारिक जहाजों की आवाजाही धीमी हो गई है। कई शिपिंग कंपनियाँ वैकल्पिक मार्ग तलाशने की कोशिश कर रही हैं,लेकिन इससे परिवहन की लागत और समय दोनों बढ़ रहे हैं।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर एशिया और यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। इन क्षेत्रों की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा फारस की खाड़ी से आने वाले तेल और गैस पर निर्भर करता है। यदि आपूर्ति में लंबी बाधा आती है,तो इन देशों को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है।

हालाँकि,अमेरिका की स्थिति कुछ अलग मानी जा रही है। पिछले एक दशक में अमेरिका ने घरेलू तेल उत्पादन में बड़ी वृद्धि की है और वह ऊर्जा निर्यातक देशों की श्रेणी में भी शामिल हो चुका है। इसके बावजूद वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने का असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है,क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में तेजी का प्रभाव घरेलू ईंधन कीमतों पर भी पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊँचे स्तर पर बनी रहती हैं,तो दुनिया भर में आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ सकती है। कई विकासशील देशों के लिए ऊर्जा आयात की लागत बढ़ना बड़ी चुनौती बन सकता है।

इतिहास बताता है कि फारस की खाड़ी में तेल संकट का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर हमेशा बड़ा असर रहा है। 1973 के अरब तेल प्रतिबंध के दौरान भी तेल की कीमतों में अचानक भारी उछाल आया था,जिससे कई देशों में आर्थिक मंदी जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। इसी तरह 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति के समय भी तेल आपूर्ति बाधित होने से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ गई थीं।

मौजूदा संकट को भी उसी तरह के संभावित ऊर्जा झटके के रूप में देखा जा रहा है। बाजार विश्लेषकों के कुछ अनुमानों के अनुसार यदि तनाव कम नहीं हुआ,तो इस साल के अंत तक कच्चे तेल की कीमतें 143 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं।

फिलहाल वैश्विक बाजारों की नजरें मध्य पूर्व की स्थिति पर टिकी हुई हैं। यदि क्षेत्र में तनाव कम होता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति फिर से सामान्य होती है,तो कीमतों में कुछ राहत मिल सकती है,लेकिन यदि संघर्ष और बढ़ता है तो ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और अधिक गहराने की आशंका है।

दुनिया के कई देश और अंतर्राष्ट्रीय संगठन स्थिति पर नजर रखे हुए हैं और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह संकट अस्थायी साबित होता है या फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक लंबी चुनौती बन जाता है। फिलहाल इतना तय है कि तेल की कीमतों में आई यह तेजी दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ा संकेत है और इसका असर आने वाले महीनों में व्यापक रूप से महसूस किया जा सकता है।