वाशिंगटन,13 मार्च (युआईटीवी)- मध्य-पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच अमेरिका ने एक अहम कदम उठाते हुए रूस से तेल खरीदने को लेकर कुछ देशों को अस्थायी राहत देने का फैसला किया है। यह फैसला उस समय आया है,जब क्षेत्र में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। इस निर्णय के तहत अमेरिका ने उन देशों को रूस से तेल खरीदने की अनुमति दी है जिनके लिए पहले से समुद्र में ट्रांजिट में मौजूद रूसी तेल की खेप प्रतिबंधों के कारण फँस गई थी। इस फैसले का उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखना और तेल की आपूर्ति को बाधित होने से बचाना बताया जा रहा है।
इससे एक दिन पहले ही अमेरिका ने भारत को भी रूस से तेल खरीदने पर राहत देने की घोषणा की थी। भारत लंबे समय से इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाता रहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देगा और किसी भी बाहरी दबाव के आधार पर निर्णय नहीं करेगा। भारत का कहना रहा है कि ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में निर्णय पूरी तरह से देश की जरूरतों और परिस्थितियों के अनुसार ही लिए जाएँगे। यही कारण है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भी भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रूसी तेल की खरीद जारी रखी है।
अमेरिका के इस नए फैसले की जानकारी देते हुए स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यह कदम वैश्विक तेल आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने और मौजूदा संकट के बीच ऊर्जा बाजार में संतुलन स्थापित करने के लिए उठाया गया है। उनके अनुसार यह अनुमति केवल उन तेल खेपों के लिए है,जो पहले ही जहाजों पर लोड होकर समुद्र में ट्रांजिट में हैं और प्रतिबंधों के कारण विभिन्न स्थानों पर फँस गई हैं। उन्होंने कहा कि इस कदम का उद्देश्य केवल मौजूदा आपूर्ति को बाजार तक पहुँचाने की सुविधा देना है,ताकि अचानक आपूर्ति में कमी से तेल की कीमतों में तेज उछाल न आए।
अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने इस संबंध में एक अस्थायी प्राधिकरण जारी किया है। इस प्राधिकरण के अनुसार 12 मार्च से पहले जहाजों पर लोड किए गए रूसी मूल के कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री,डिलीवरी या ऑफलोडिंग से जुड़े लेन-देन को अनुमति दी जाएगी। इसका मतलब यह है कि जिन देशों के लिए यह तेल पहले से समुद्र में भेजा जा चुका है,वे उसे खरीद सकते हैं और अपने बंदरगाहों पर उतार सकते हैं,भले ही रूस पर लगाए गए प्रतिबंध अभी भी प्रभावी हों।
बेसेंट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला सीमित अवधि के लिए है और इसका दायरा भी सीमित है। उन्होंने कहा कि यह कोई स्थायी नीति परिवर्तन नहीं है,बल्कि मौजूदा परिस्थितियों में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर रखने के लिए एक अस्थायी कदम है। उनके अनुसार इस निर्णय से रूस को कोई बड़ा वित्तीय लाभ नहीं होगा क्योंकि इससे केवल पहले से ट्रांजिट में मौजूद तेल की खेपों को बाजार तक पहुँचने की अनुमति दी जा रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि रूस को अपने ऊर्जा निर्यात से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा तेल उत्पादन स्थल पर लगाए गए करों से मिलता है,इसलिए इस सीमित छूट से रूस की सरकार को कोई विशेष आर्थिक लाभ नहीं मिलने वाला है। उनका कहना था कि अमेरिका का उद्देश्य केवल इतना है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में अचानक आपूर्ति संकट न पैदा हो और तेल की कीमतें अनियंत्रित तरीके से न बढ़ें।
इस फैसले के पीछे एक बड़ा कारण मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव को भी माना जा रहा है। हाल के दिनों में ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। इस क्षेत्र से दुनिया के बड़े हिस्से को तेल की आपूर्ति होती है और यहाँ किसी भी तरह का सैन्य तनाव तुरंत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतों को प्रभावित करता है। ऐसे में अमेरिका यह सुनिश्चित करना चाहता है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक तेल की आपूर्ति बनी रहे।
ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव का एक बड़ा कारण यह भी है कि कई महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों और ऊर्जा अवसंरचना पर खतरे की आशंका बढ़ गई है। यदि इन मार्गों पर किसी तरह की बाधा आती है,तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि कई देश वैकल्पिक स्रोतों और आपूर्ति मार्गों की तलाश में जुटे हुए हैं।
इस पृष्ठभूमि में रूस की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। रूस आज भी दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातकों में से एक है। रूस का तेल यूरोप,एशिया और अन्य कई क्षेत्रों में ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हालाँकि,2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे।
यह प्रतिबंध रूस की वित्तीय संस्थाओं,शिपिंग नेटवर्क और ऊर्जा निर्यात को निशाना बनाकर लगाए गए थे। इनका उद्देश्य रूस की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाना और उसे यूक्रेन युद्ध को लेकर अंतर्राष्ट्रीय दबाव के अधीन करना था,लेकिन इसके बावजूद रूस वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।
इसी कारण कई देशों के लिए रूस से तेल खरीदना ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अहम बना हुआ है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश के लिए सस्ती और स्थिर आपूर्ति बेहद जरूरी है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है और अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में ऊर्जा बाजार में किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और घरेलू कीमतों पर पड़ सकता है।
भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भी स्पष्ट रूप से कहा था कि उसकी ऊर्जा खरीद नीति पूरी तरह राष्ट्रीय हितों पर आधारित होगी। नई दिल्ली ने बार-बार दोहराया कि ऊर्जा सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है और वह किसी भी देश के दबाव में आकर अपने निर्णय नहीं बदलेगा। भारत का यह रुख वैश्विक मंचों पर भी साफ दिखाई देता रहा है।
अमेरिका द्वारा भारत को दी गई छूट और अब अन्य देशों को दी गई इसी तरह की अनुमति को कई विशेषज्ञ वैश्विक ऊर्जा संतुलन बनाए रखने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। उनके अनुसार यदि प्रतिबंधों के कारण बड़ी मात्रा में तेल बाजार तक नहीं पहुँचता तो वैश्विक कीमतों में तेज उछाल आ सकता है,जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
इस फैसले पर टिप्पणी करते हुए अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि सरकार का मानना है कि तेल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी केवल अस्थायी है और यह वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम है। उन्होंने विश्वास जताया कि दीर्घकाल में ऊर्जा आपूर्ति मजबूत बनी रहेगी और बाजार स्थिरता की ओर लौटेगा।
इस संदर्भ में उन्होंने यह भी कहा कि डोनाल्ड ट्रंप की ऊर्जा नीति ने अमेरिका में तेल और गैस उत्पादन को रिकॉर्ड स्तर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनका कहना था कि इस नीति के कारण अमेरिकी बाजार में ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिली है और वैश्विक बाजार में भी आपूर्ति को मजबूती मिली है।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि तेल की कीमतों में मौजूदा वृद्धि एक अस्थायी बाधा है और दीर्घकाल में यह स्थिति स्थिर हो जाएगी। उनका मानना है कि ऊर्जा बाजार में संतुलन बनाए रखने के लिए विभिन्न देशों के बीच सहयोग और समन्वय बेहद जरूरी है।
वर्तमान परिस्थितियों में वैश्विक ऊर्जा बाजार कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक ओर मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ रहा है,तो दूसरी ओर रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पहले से ही ऊर्जा आपूर्ति के पारंपरिक मार्ग प्रभावित हैं। इसके अलावा कई देशों की अर्थव्यवस्थाएँ महामारी के बाद तेजी से उभर रही हैं,जिससे ऊर्जा की माँग भी बढ़ी है।
ऐसे में सरकारें एक कठिन संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं। एक तरफ वे रूस और ईरान जैसे देशों पर प्रतिबंधों के माध्यम से दबाव बनाए रखना चाहती हैं,वहीं दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करना चाहती हैं कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो और बाजार में कीमतों का संतुलन बना रहे।
अमेरिका द्वारा दिया गया यह अस्थायी प्राधिकरण इसी संतुलन का एक उदाहरण माना जा रहा है। इससे एक ओर प्रतिबंधों की नीति जारी रहती है,वहीं दूसरी ओर वैश्विक ऊर्जा बाजार को अचानक झटके से बचाने की कोशिश भी की जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यदि मध्य-पूर्व में तनाव और बढ़ता है या ऊर्जा आपूर्ति मार्गों में किसी तरह की रुकावट आती है,तो वैश्विक तेल बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। ऐसे में प्रमुख ऊर्जा उपभोक्ता और उत्पादक देशों के बीच समन्वय और भी महत्वपूर्ण हो जाएगा।
फिलहाल अमेरिका का यह फैसला यह संकेत देता है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता को बनाए रखना अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और आर्थिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। भारत समेत कई देशों के लिए यह राहत भरा कदम माना जा रहा है,क्योंकि इससे उन्हें मौजूदा परिस्थितियों में अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ अतिरिक्त लचीलापन मिल सकता है।
