नई दिल्ली,16 मार्च (युआईटीवी)- देश की अदालतों में सुनवाई पूरी होने के बाद फैसलों की लिखित कॉपी जारी करने में हो रही देरी को लेकर दाखिल याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने सुनवाई पूरी कर ली और अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यह मुद्दा किसी एक न्यायाधीश से जुड़ा हुआ नहीं है,बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र में सुधार और जवाबदेही सुनिश्चित करने से संबंधित है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि न्यायपालिका के भीतर समय प्रबंधन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार की आवश्यकता है,ताकि अदालतों के फैसलों की लिखित प्रतियां समय पर उपलब्ध कराई जा सकें।
सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि इस मामले को किसी विशेष न्यायाधीश के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस न्यायाधीश के मामले के कारण यह मुद्दा सामने आया है,वे फौजदारी कानून के क्षेत्र में एक बेहद सक्षम और अनुभवी जज हैं। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि कई बार अदालतों में मामलों की संख्या बहुत अधिक होती है और जज अधिक से अधिक मामलों को निपटाने की कोशिश करते हैं। ऐसी स्थिति में समय प्रबंधन की चुनौती सामने आ जाती है।
सीजेआई ने कहा कि न्यायाधीशों के सामने कई तरह की जिम्मेदारियाँ होती हैं और उनके पास भी दिन के केवल 24 घंटे ही होते हैं। उन्होंने कहा कि अदालतों को यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी होगी कि सुनवाई के बाद लिखित आदेश और फैसले समय पर जारी किए जा सकें। उनके अनुसार न्यायपालिका की विश्वसनीयता और पारदर्शिता के लिए यह बेहद जरूरी है कि अदालतों के आदेशों की आधिकारिक प्रतियाँ जल्द-से-जल्द उपलब्ध हों।
इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी बताया कि अदालत द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी ने न्यायपालिका में सुधार और जवाबदेही बढ़ाने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। अदालत ने इन सुझावों को सकारात्मक बताया और कहा कि इनमें न्यायिक प्रणाली को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने की क्षमता है। अदालत ने निर्देश दिया कि एमिकस द्वारा दी गई सिफारिशों की सॉफ्ट कॉपी देश के सभी उच्च न्यायालयों को भेजी जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि सभी हाईकोर्ट इन सिफारिशों का अध्ययन करने के बाद अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव 10 दिनों के भीतर सुप्रीम कोर्ट को भेज सकते हैं। अदालत का मानना है कि इस तरह की प्रक्रिया से न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर व्यावहारिक अनुभव और सुझाव सामने आएँगे,जिससे सुधारों को अधिक प्रभावी तरीके से लागू किया जा सकेगा।
यह पूरा मामला तब सामने आया,जब सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई,जिसमें आरोप लगाया गया कि कई मामलों में अदालतें सुनवाई के दौरान अपना फैसला मौखिक रूप से सुना देती हैं,लेकिन उसकी लिखित प्रति लंबे समय तक उपलब्ध नहीं हो पाती। याचिका में कहा गया कि कई बार फैसले की कॉपी मिलने में कई सप्ताह लग जाते हैं और कुछ मामलों में तो महीनों तक आदेश की आधिकारिक प्रति जारी नहीं होती।
याचिका में यह भी कहा गया कि इस तरह की देरी से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है और संबंधित पक्षों को कई प्रकार की व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए,जब तक लिखित आदेश उपलब्ध नहीं होता,तब तक संबंधित पक्ष उच्च अदालत में अपील दाखिल करने या अन्य कानूनी कदम उठाने में सक्षम नहीं होते। इससे न्याय पाने की प्रक्रिया और लंबी हो जाती है।
कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि अदालतों के आदेशों की लिखित प्रतियाँ समय पर उपलब्ध होना न्यायिक प्रणाली के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इससे न केवल न्यायिक पारदर्शिता बढ़ती है,बल्कि अदालतों के फैसलों के क्रियान्वयन में भी तेजी आती है। यदि आदेशों की प्रतियाँ समय पर उपलब्ध नहीं होतीं,तो इससे न्यायिक प्रशासन पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी संकेत दिया कि इस मुद्दे का समाधान केवल आलोचना से नहीं,बल्कि ठोस संस्थागत सुधारों के माध्यम से ही संभव है। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका के भीतर प्रशासनिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने और तकनीकी साधनों के बेहतर उपयोग से इस समस्या को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।
पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका ने डिजिटल प्रणाली को अपनाने की दिशा में कई कदम उठाए हैं,जिनमें ई-कोर्ट्स,ऑनलाइन केस ट्रैकिंग और डिजिटल रिकॉर्डिंग जैसी पहल शामिल हैं। इसके बावजूद कई मामलों में लिखित आदेशों की उपलब्धता में देरी की शिकायतें सामने आती रही हैं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत आने वाले समय में इस मुद्दे पर विस्तृत आदेश जारी कर सकती है,जिसमें अदालतों द्वारा फैसले सुनाने और उनकी लिखित प्रतियाँ जारी करने की समयसीमा और प्रक्रिया से जुड़े दिशानिर्देश भी शामिल हो सकते हैं।
कानूनी जगत की नजर अब सुप्रीम कोर्ट के आगामी फैसले पर टिकी हुई है। माना जा रहा है कि अदालत का निर्णय न्यायपालिका के प्रशासनिक ढाँचे और कामकाज में सुधार के लिए महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है। यदि अदालत इस मुद्दे पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करती है,तो इससे निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों में न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाने में मदद मिल सकती है।
