नाटो के महासचिव मार्क रुट्टे (तस्वीर क्रेडिट@Osint613)

ईरान मुद्दे पर बढ़ा अमेरिका-नाटो तनाव,ट्रंप ने गठबंधन से अलग होने के संकेत दिए

वाशिंगटन,9 अप्रैल (युआईटीवी)- ईरान के साथ जारी तनाव के बीच अमेरिका और नाटो देशों के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। हालिया घटनाक्रम में डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो के महासचिव मार्क रूटे से अहम मुलाकात की,जिसमें अमेरिका की इस सैन्य गठबंधन से संभावित दूरी को लेकर चर्चा हुई। इस बैठक ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नई चिंताओं को जन्म दिया है,खासतौर पर उस समय जब मध्य पूर्व में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।

व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने मीडिया को जानकारी देते हुए कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप नाटो की वर्तमान भूमिका और उसकी प्रभावशीलता से संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने ट्रंप के हवाले से कहा कि गठबंधन का “परीक्षण हुआ और वह इसमें असफल रहा।” इस बयान ने संकेत दिया कि अमेरिका नाटो की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठा रहा है और भविष्य में अपने रुख में बदलाव कर सकता है।

लेविट ने यह भी बताया कि नाटो से अलग होने की संभावना पर चर्चा की गई है और आने वाले समय में इस मुद्दे पर और बातचीत हो सकती है। हालाँकि,उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि अमेरिका वास्तव में इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने जा रहा है या यह केवल रणनीतिक दबाव बनाने का हिस्सा है।

यह पूरी स्थिति उस समय पैदा हुई है,जब ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को लेकर नाटो के कई सदस्य देशों ने खुलकर समर्थन नहीं दिया। इस बात से ट्रंप प्रशासन नाराज नजर आ रहा है। अमेरिकी नेतृत्व का मानना है कि इस तरह के महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में सहयोगी देशों का पूरा समर्थन मिलना चाहिए,लेकिन यूरोपीय देशों की सतर्क और सीमित प्रतिक्रिया ने अमेरिका की नाराजगी को बढ़ा दिया है।

ट्रंप और मार्क रूटे के बीच हुई इस बैठक में केवल ईरान ही नहीं,बल्कि अन्य वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा हुई। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग रूट की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयासों के साथ-साथ रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए कूटनीतिक पहल भी शामिल थी। यह संकेत देता है कि अमेरिका और नाटो के बीच मतभेद के बावजूद संवाद जारी है और दोनों पक्ष वैश्विक स्थिरता बनाए रखने के लिए कुछ साझा मुद्दों पर सहयोग करने को तैयार हैं।

इसी क्रम में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी नाटो महासचिव रूटे से अलग से मुलाकात की। इस बैठक में सहयोग बढ़ाने और गठबंधन के भीतर जिम्मेदारियों के बँटवारे पर चर्चा की गई। अमेरिका लंबे समय से यह माँग करता रहा है कि नाटो के अन्य सदस्य देश रक्षा खर्च और सुरक्षा जिम्मेदारियों में अधिक योगदान दें।

हालाँकि,अमेरिका के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद देखने को मिल रहे हैं। रिपब्लिकन पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने नाटो के महत्व को दोहराया है। सीनेट आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के चेयरमैन रोजर विकर और हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के चेयरमैन माइक रोजर्स ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि एक मजबूत नाटो अमेरिका के हित में है। उन्होंने यह भी कहा कि हाल के अमेरिकी सैन्य अभियानों में नाटो सहयोगियों के समर्थन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इन बयानों से यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका के भीतर नाटो को लेकर एकराय नहीं है। जहाँ एक ओर ट्रंप प्रशासन गठबंधन की उपयोगिता पर सवाल उठा रहा है,वहीं दूसरी ओर कई नेता इसे अमेरिका की वैश्विक रणनीति का अहम हिस्सा मानते हैं।

ट्रंप के हालिया बयानों ने यूरोप में भी चिंता बढ़ा दी है। नाटो लंबे समय से पश्चिमी देशों की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का आधार रहा है और अमेरिका इसका सबसे प्रमुख सदस्य रहा है। ऐसे में यदि अमेरिका इस गठबंधन से दूरी बनाता है,तो इसका असर न केवल यूरोप की सुरक्षा पर पड़ेगा,बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।

गौरतलब है कि नाटो की स्थापना 1949 में हुई थी और तब से यह पश्चिमी देशों के बीच रक्षा सहयोग का सबसे मजबूत मंच बना हुआ है। इसका म्यूचुअल डिफेंस क्लॉज यह सुनिश्चित करता है कि यदि किसी सदस्य देश पर हमला होता है,तो अन्य सदस्य उसकी रक्षा के लिए आगे आएँगे। यही प्रावधान नाटो को अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से अलग और अधिक प्रभावशाली बनाता है।

हालाँकि,व्हाइट हाउस ने बाद में यह स्पष्ट किया कि ट्रंप और रूटे की बैठक समाप्त हो चुकी है और फिलहाल नीति में किसी भी तरह के बदलाव की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका ने अभी तक नाटो से अलग होने का कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है,लेकिन इस संभावना को पूरी तरह से नकारा भी नहीं गया है।

ईरान मुद्दे पर उभरे इस तनाव ने अमेरिका और नाटो के रिश्तों में नई दरार की ओर इशारा किया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह मतभेद केवल कूटनीतिक दबाव तक सीमित रहता है या वास्तव में अमेरिका अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करता है। फिलहाल,वैश्विक राजनीति में यह मुद्दा एक बड़े घटनाक्रम के रूप में उभर रहा है,जिसका असर अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा और सहयोग के भविष्य पर पड़ सकता है।