सियोल,25 अप्रैल (युआईटीवी)- दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग अपनी महत्वपूर्ण दो-देशीय यात्रा पूरी कर स्वदेश लौट आए हैं। इस छह दिवसीय दौरे के दौरान उन्होंने भारत और वियतनाम के साथ आर्थिक,रणनीतिक और तकनीकी सहयोग को नई दिशा देने की कोशिश की। उनकी यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और आपूर्ति शृंखलाओं में अनिश्चितता बढ़ी हुई है। ऐसे हालात में दक्षिण कोरिया,भारत और वियतनाम के बीच बढ़ता सहयोग न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने अपनी यात्रा के पहले चरण में नई दिल्ली में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन किया। इस बैठक में दोनों देशों ने कई अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई,जिनमें ऊर्जा,महत्वपूर्ण खनिज,कृत्रिम बुद्धिमत्ता,वित्त और जहाज निर्माण जैसे क्षेत्र प्रमुख रहे। यह बैठक केवल पारंपरिक कूटनीतिक वार्ता तक सीमित नहीं रही,बल्कि इसमें भविष्य की वैश्विक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक साझेदारी को मजबूत करने पर भी विशेष ध्यान दिया गया।
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच व्यापारिक संबंधों को नई ऊँचाई पर ले जाने के उद्देश्य से दोनों पक्षों ने अपने ‘व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते’ को उन्नत करने के लिए वार्ता में तेजी लाने का निर्णय लिया। वर्तमान में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 25 अरब डॉलर के आसपास है,जिसे 2030 तक बढ़ाकर 50 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य दोनों देशों की आर्थिक क्षमता और आपसी सहयोग की संभावनाओं को दर्शाता है।
इस शिखर सम्मेलन के दौरान कुल 15 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए,जो विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करेंगे। खासतौर पर जहाज निर्माण क्षेत्र में सहयोग को लेकर उत्साह देखने को मिला। दक्षिण कोरिया इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी देशों में शामिल है और भारत में एक संयुक्त शिपयार्ड के निर्माण की योजना इस सहयोग को नई दिशा दे सकती है। इससे न केवल औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलेगा,बल्कि रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
भारत दौरे के बाद राष्ट्रपति ली जे म्युंग वियतनाम की राजधानी हनोई पहुँचे,जहाँ उन्होंने वियतनाम के शीर्ष नेता टो लाम के साथ उच्च स्तरीय वार्ता की। इस बैठक में दोनों देशों ने ऊर्जा,बुनियादी ढाँचा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया। इसके साथ ही आपूर्ति शृंखलाओं के समन्वय को बढ़ाने पर भी सहमति बनी,जिससे वैश्विक बाजार में स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
हनोई में आयोजित शिखर सम्मेलन के बाद राष्ट्रपति ली ने कहा कि मध्य-पूर्व में हाल के घटनाक्रमों को देखते हुए ऊर्जा संसाधनों और प्रमुख कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक हो गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे समय में सहयोग और समन्वय ही सबसे प्रभावी समाधान हो सकता है। वियतनाम और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ता सहयोग इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इस यात्रा के दौरान स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया गया कि एशियाई देशों के बीच आपसी सहयोग अब केवल क्षेत्रीय मुद्दों तक सीमित नहीं है,बल्कि यह वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक संतुलन को भी प्रभावित कर रहा है। भारत,वियतनाम और दक्षिण कोरिया जैसे देश तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाएँ हैं और इनके बीच मजबूत साझेदारी वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को अधिक लचीला और स्थिर बना सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि इसमें पारंपरिक व्यापारिक सहयोग के साथ-साथ नई तकनीकों और उभरते क्षेत्रों पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता,महत्वपूर्ण खनिज और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग आने वाले समय में वैश्विक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकता है।
दक्षिण कोरिया की यह पहल यह भी दर्शाती है कि वह अपनी विदेश नीति को अधिक सक्रिय और बहुआयामी बना रहा है। भारत और वियतनाम के साथ संबंधों को मजबूत करना उसकी ‘इंडो-पैसिफिक’ रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है,जिसके तहत वह क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहता है।
राष्ट्रपति ली जे म्युंग की यह यात्रा कई मायनों में सफल रही है। इससे न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती मिली है,बल्कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सहयोग का एक मजबूत आधार भी तैयार हुआ है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन समझौतों और योजनाओं का वास्तविक प्रभाव क्या होता है,लेकिन इतना तय है कि इस दौरे ने एशियाई सहयोग को एक नई दिशा दी है।
