नई दिल्ली,27 अप्रैल (युआईटीवी)- भारत और न्यूजीलैंड के बीच लंबे समय से चर्चा में रहा मुक्त व्यापार समझौता आखिरकार सोमवार को औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित होने जा रहा है। यह समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को एक नई दिशा देने वाला माना जा रहा है और इसके जरिए द्विपक्षीय व्यापार,निवेश तथा रोजगार के क्षेत्र में बड़े अवसर खुलने की उम्मीद है। इस ऐतिहासिक मौके पर भारत मंडपम में आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और न्यूजीलैंड के उनके समकक्ष टॉड मैक्ले की मौजूदगी में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएँगे।
इस समझौते को लेकर न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है। उन्होंने कहा कि दशकों से इस तरह के समझौते की संभावना पर संदेह जताया जाता रहा,लेकिन अब यह हकीकत बनने जा रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि एक साल पहले भारत यात्रा के दौरान उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई मुलाकात में इस समझौते को लेकर बातचीत शुरू करने पर सहमति बनी थी और अब वह प्रयास सफल होने जा रहा है।
लक्सन ने इस समझौते को “एक पीढ़ी में एक बार होने वाला अवसर” बताते हुए कहा कि इससे न्यूजीलैंड के निर्यातकों को भारत जैसे विशाल बाजार तक अभूतपूर्व पहुँच मिलेगी, जहाँ 1.4 अरब से अधिक लोग रहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा और कृषि,बागवानी तथा अन्य क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा। उनके अनुसार,इससे स्थानीय समुदायों में आय बढ़ेगी और लोगों के जीवन स्तर में सुधार होगा।
भारत और न्यूजीलैंड के बीच यह मुक्त व्यापार समझौता अगले पाँच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर लगभग 5 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखता है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में, जब पश्चिम एशिया में तनाव और अन्य अनिश्चितताएँ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर रही हैं,यह समझौता दोनों देशों के लिए स्थिरता और विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। भारतीय निर्यातकों के लिए यह एक बड़ा अवसर होगा,जिससे वे न्यूजीलैंड के बाजार में अपनी उपस्थिति मजबूत कर सकेंगे।
इस समझौते के तहत भारतीय कंपनियों को न्यूजीलैंड के बाजार में बिना किसी शुल्क के प्रवेश मिलेगा,जिससे उन्हें प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त हासिल होगी। वहीं,न्यूजीलैंड से भारत आने वाले लगभग 95 प्रतिशत उत्पादों पर शुल्क में छूट या कमी दी जाएगी। इन उत्पादों में ऊन, कोयला,लकड़ी,शराब,समुद्री भोजन,चेरी,एवोकाडो और ब्लूबेरी जैसे सामान शामिल हैं। इससे भारतीय बाजार में इन उत्पादों की उपलब्धता बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिलेंगे।
हालाँकि,भारत ने अपने घरेलू किसानों और उद्योगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कुछ संवेदनशील क्षेत्रों को इस समझौते के दायरे से बाहर रखा है। इनमें डेयरी उत्पाद,प्याज,चीनी,मसाले,खाद्य तेल और रबर जैसे क्षेत्र शामिल हैं। यह कदम इस बात को दर्शाता है कि भारत ने इस समझौते में संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है,ताकि घरेलू उद्योगों को नुकसान न पहुँचे।
न्यूजीलैंड को भी इस समझौते के तहत कई महत्वपूर्ण लाभ मिलने वाले हैं। उसे कीवी फल और सेब जैसे प्रमुख निर्यात उत्पादों पर कोटा आधारित शुल्क में कमी मिलेगी। इसके अलावा भेड़ के मांस,ऊन और वानिकी उत्पादों पर शुल्क-मुक्त प्रवेश प्रदान किया जाएगा। मनुका शहद,बेबी फूड और कुछ समुद्री उत्पादों पर भी शुल्क में कमी की व्यवस्था की गई है,जिससे न्यूजीलैंड के निर्यातकों को फायदा होगा।
इस समझौते की एक और महत्वपूर्ण विशेषता पेशेवरों के लिए आवागमन को आसान बनाना है। न्यूजीलैंड ने हर साल 5,000 भारतीय पेशेवरों को अस्थायी रोजगार वीजा देने पर सहमति जताई है,जिससे वे तीन वर्षों तक वहाँ काम कर सकेंगे। इसमें सूचना प्रौद्योगिकी,इंजीनियरिंग,स्वास्थ्य सेवा,शिक्षा और निर्माण जैसे क्षेत्रों के पेशेवर शामिल होंगे। इसके साथ ही योग प्रशिक्षकों,आयुष चिकित्सकों,रसोइयों और संगीत शिक्षकों जैसे पारंपरिक पेशों को भी इसमें शामिल किया गया है,जो सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि यह निवेश,नवाचार और तकनीकी सहयोग को भी बढ़ावा देगा। अनुमान है कि अगले 15 वर्षों में न्यूजीलैंड से भारत में लगभग 20 अरब डॉलर का निवेश हो सकता है,जिससे विनिर्माण,अवसंरचना और सेवाओं के क्षेत्र में विकास को गति मिलेगी। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी।
भारत और न्यूजीलैंड के बीच यह मुक्त व्यापार समझौता दोनों देशों के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह न केवल व्यापारिक संबंधों को मजबूत करेगा,बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग को भी नई ऊँचाइयों तक ले जाएगा। आने वाले समय में इसका प्रभाव दोनों अर्थव्यवस्थाओं पर स्पष्ट रूप से दिखाई देगा और यह समझौता वैश्विक व्यापार परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में उभर सकता है।
