वाशिंगटन,22 मई (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने गुरुवार को कहा कि ईरान के साथ जारी बातचीत में “अच्छे संकेत” देखने को मिल रहे हैं। हालाँकि,उन्होंने साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि अभी किसी बड़े नतीजे की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। रुबियो ने दो टूक कहा कि अगर कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं,तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं। उनके इस बयान को अमेरिका की उस रणनीति के रूप में देखा जा रहा है,जिसमें बातचीत और दबाव दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।
भारत रवाना होने से पहले मियामी में मीडिया से बातचीत करते हुए रुबियो ने कहा कि ट्रंप प्रशासन टकराव के बजाय समझौते के जरिए समाधान निकालना चाहता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति की प्राथमिकता हमेशा एक अच्छा समझौता करना रही है और मौजूदा बातचीत भी उसी दिशा में आगे बढ़ रही है। रुबियो के मुताबिक अमेरिका को लगता है कि तेहरान के साथ हालिया संपर्कों में कुछ सकारात्मक प्रगति हुई है। हालाँकि,उन्होंने यह भी माना कि ईरान की राजनीतिक व्यवस्था काफी जटिल और बिखरी हुई है,जिससे बातचीत की प्रक्रिया आसान नहीं बनती।
रुबियो ने ईरान की राजनीतिक संरचना का जिक्र करते हुए कहा कि अमेरिका एक ऐसे सिस्टम से बातचीत कर रहा है,जो खुद अंदरूनी स्तर पर कई हिस्सों में बँटा हुआ दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि बातचीत में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं। इसके बावजूद अमेरिका यह परखने की कोशिश कर रहा है कि क्या कूटनीतिक रास्ते से कोई ठोस समाधान निकाला जा सकता है।
अमेरिकी विदेश मंत्री ने इस दौरान पाकिस्तान की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान से जुड़ी क्षेत्रीय कूटनीतिक गतिविधियाँ बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती हैं। रुबियो ने जानकारी दी कि पाकिस्तानी प्रतिनिधि तेहरान जाने वाले हैं और अमेरिका को उम्मीद है कि इससे संवाद की प्रक्रिया को गति मिल सकती है। हालाँकि,उन्होंने यह भी कहा कि अभी यह कहना मुश्किल है कि बातचीत निश्चित रूप से किसी समझौते तक पहुँचेगी या नहीं,लेकिन अमेरिका हर संभव प्रयास कर रहा है,ताकि अचानक कोई सकारात्मक प्रगति देखने को मिल सके।
रुबियो के बयान में जहाँ बातचीत की इच्छा दिखाई दी,वहीं दूसरी ओर उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल क्षमता को लेकर ट्रंप प्रशासन की कड़ी चेतावनियों को भी दोहराया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनके पास अन्य विकल्प भी उपलब्ध हैं। हालाँकि,उन्होंने इन विकल्पों का खुलासा नहीं किया,लेकिन संकेत साफ था कि अमेरिका जरूरत पड़ने पर सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। रुबियो ने कहा कि दुनिया जानती है कि उन विकल्पों का क्या मतलब हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह दोहरा संदेश ईरान पर दबाव बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है। एक तरफ वाशिंगटन बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहता है,वहीं दूसरी तरफ वह तेहरान को यह भी दिखाना चाहता है कि यदि समझौता नहीं हुआ तो हालात और गंभीर हो सकते हैं। पिछले कई महीनों से ईरान की परमाणु गतिविधियों,पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय मिलिशिया के समर्थन और समुद्री सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर तनाव लगातार बढ़ा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच किसी भी प्रकार की बातचीत को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय बेहद करीब से देख रहा है।
रुबियो ने अपने बयान में नाटो देशों की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि यूरोप के कई सहयोगी देश इस बात से सहमत हैं कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए और वह वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा है,लेकिन इसके बावजूद वे पर्याप्त कार्रवाई करने को तैयार नहीं दिखाई देते। रुबियो के अनुसार,ईरान के पास भले ही अभी ऐसी मिसाइलें न हों जो सीधे अमेरिका तक पहुँच सकें,लेकिन उसकी मिसाइल क्षमता यूरोप तक पहुँचने में सक्षम है। यही कारण है कि अमेरिका इस खतरे को केवल क्षेत्रीय नहीं,बल्कि वैश्विक सुरक्षा का मुद्दा मानता है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप कई बार इस बात से निराशा जाहिर कर चुके हैं कि दुनिया के देश ईरान को लेकर अमेरिका के आकलन से तो सहमत होते हैं,लेकिन जब ठोस कदम उठाने की बात आती है,तो वे पीछे हट जाते हैं। रुबियो ने कहा कि यदि दुनिया इस बात पर एकमत है कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए,तो फिर सभी देशों को इस दिशा में खुलकर आगे आना चाहिए। उनके मुताबिक,केवल बयान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वास्तविक कार्रवाई भी जरूरी है।
अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ईरान को लेकर अपने पुराने रुख को नई परिस्थितियों के हिसाब से ढालने की कोशिश कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम एशिया में तेजी से बदले घटनाक्रमों ने अमेरिका और उसके सहयोगियों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। खासकर समुद्री मार्गों की सुरक्षा,तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय संघर्षों में ईरान समर्थित समूहों की भूमिका को लेकर अमेरिका लगातार दबाव बना रहा है।
हालाँकि,इन तमाम तनावों के बीच रुबियो ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि कूटनीति अभी भी अमेरिका की पहली पसंद है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप हमेशा किसी डील,किसी समझौते और किसी शांतिपूर्ण समाधान को प्राथमिकता देते हैं। अमेरिका यह देखना चाहता है कि क्या बातचीत के जरिए ऐसी स्थिति बनाई जा सकती है,जिससे क्षेत्रीय तनाव कम हो और परमाणु विवाद का समाधान निकल सके।
विशेषज्ञों के अनुसार,अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा कूटनीतिक संपर्क आने वाले समय में पश्चिम एशिया की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। यदि बातचीत आगे बढ़ती है,तो इससे क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है और ऊर्जा बाजारों में स्थिरता आ सकती है,लेकिन अगर वार्ता विफल होती है,तो हालात और अधिक जटिल हो सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया की नजरें अब वाशिंगटन और तेहरान के बीच चल रही इस नई कूटनीतिक प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं।
रुबियो के बयान ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका फिलहाल बातचीत और दबाव दोनों रास्तों पर एक साथ आगे बढ़ रहा है। एक ओर वह ईरान को समझौते के लिए प्रेरित करना चाहता है,वहीं दूसरी ओर यह संदेश भी देना चाहता है कि यदि कूटनीति कामयाब नहीं होती,तो अमेरिका के पास अन्य विकल्प भी मौजूद हैं। आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट हो सकेगा कि दोनों देशों के बीच यह संवाद किसी ठोस नतीजे तक पहुँचता है या फिर तनाव का नया दौर शुरू होता है।
