नई दिल्ली,22 मई (युआईटीवी)- भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी लगातार नए आयाम हासिल कर रही है। रक्षा,प्रौद्योगिकी,निवेश और व्यापार जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के रिश्ते पहले से कहीं अधिक मजबूत दिखाई दे रहे हैं। इसी बीच भारत-यूएस वार्षिक लीडरशिप समिट में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने बड़ा संकेत देते हुए कहा कि भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौता अगले कुछ हफ्तों या महीनों में अंतिम रूप ले सकता है। उनके इस बयान ने दोनों देशों के कारोबारी और रणनीतिक संबंधों को लेकर नई उम्मीदें जगा दी हैं। समिट में दिए गए उनके संबोधन को भारत-अमेरिका आर्थिक साझेदारी के भविष्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सर्जियो गोर ने अपने संबोधन में कहा कि व्यापार समझौते को लेकर बातचीत काफी लंबे समय से चल रही है और इसमें दोनों पक्ष गंभीरता के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई लोग सवाल पूछते हैं कि समझौते में इतना समय क्यों लग रहा है,लेकिन अगर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो ऐसी डील्स में लंबा समय लगना सामान्य बात है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यूरोपीय संघ के साथ कई व्यापार समझौतों को अंतिम रूप लेने में करीब 19 साल लगे थे,जबकि भारत और अमेरिका के बीच इस दिशा में बातचीत को लगभग डेढ़ साल ही हुआ है। उनका कहना था कि दोनों देशों को भरोसा है कि निकट भविष्य में यह समझौता पूरा हो जाएगा और इससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं को स्थिरता तथा नए अवसर प्राप्त होंगे।
अमेरिकी राजदूत ने इस दौरान तकनीकी सहयोग और निवेश को भारत-अमेरिका संबंधों का सबसे मजबूत आधार बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच केवल व्यापारिक संबंध ही नहीं बढ़ रहे,बल्कि प्रौद्योगिकी,नवाचार और डिजिटल विकास के क्षेत्र में भी गहरी साझेदारी बन रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक्सपोर्ट कंट्रोल और तकनीकी फ्लो को लेकर भरोसे पर आधारित स्पष्ट और रचनात्मक बातचीत की जरूरत है,ताकि दोनों देशों के उद्योग और तकनीकी क्षेत्र अधिक प्रभावी तरीके से एक-दूसरे के साथ काम कर सकें।
समिट के दौरान सर्जियो गोर ने भारत में अमेरिकी कंपनियों के बढ़ते निवेश का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि माइक्रोसॉफ्ट ने भारत में 17.5 बिलियन डॉलर के निवेश की घोषणा की है। इस निवेश में हाइपरस्केल क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार भी शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार,यह निवेश भारत के डिजिटल इकोसिस्टम को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। इससे क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा सेंटर और डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में रोजगार और तकनीकी विकास को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
इसी तरह गूगल द्वारा घोषित 15 बिलियन डॉलर के एआई हब का जिक्र करते हुए अमेरिकी राजदूत ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत तेजी से एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है। गूगल का यह निवेश भारत में एआई रिसर्च और डेवलपमेंट को नई दिशा देगा। इससे स्टार्टअप्स,अनुसंधान संस्थानों और तकनीकी कंपनियों को बड़ा लाभ मिलने की संभावना है। जानकारों का मानना है कि अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों का भारत की ओर झुकाव यह दिखाता है कि भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बनने जा रहा है।
सर्जियो गोर ने यह भी बताया कि अमेरिका भारत के साथ “प्रेसिडेंट ट्रस्ट इनिशिएटिव” पर काम कर रहा है। इस पहल का उद्देश्य दोनों देशों के बीच वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग को और मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के उद्यमियों की संयुक्त टीमें उभरते तकनीकी क्षेत्रों में नए स्टार्टअप्स तैयार कर रही हैं। इसमें भारत-अमेरिका साइंस एंड टेक्नोलॉजी फोरम और अमेरिका-भारत साइंस एंड टेक्नोलॉजी एंडोमेंट फंड का सहयोग अहम भूमिका निभा रहा है। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि दोनों देश केवल सरकारी स्तर पर ही नहीं,बल्कि निजी क्षेत्र और नवाचार के क्षेत्र में भी साझेदारी को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
इस समिट की एक और महत्वपूर्ण बात अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो की प्रस्तावित भारत यात्रा रही। सर्जियो गोर ने जानकारी दी कि मार्को रुबियो भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे। इस मुलाकात को दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। राजदूत ने कहा कि जब अमेरिकी अधिकारी भारत आते हैं,तो केवल औपचारिक मुलाकातें नहीं होतीं,बल्कि उन बैठकों में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर गंभीर चर्चा की जाती है। उन्होंने संकेत दिया कि विदेश मंत्री की बातचीत में व्यापार,तकनीकी सहयोग,सुरक्षा,निवेश और रणनीतिक साझेदारी जैसे कई विषय शामिल होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता सहयोग केवल आर्थिक हितों तक सीमित नहीं है। दोनों देश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता,वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला,ऊर्जा सुरक्षा और उभरती तकनीकों के क्षेत्र में भी मिलकर काम कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में जिस तेजी से प्रगाढ़ता आई है,उसने वैश्विक राजनीति में भी नई चर्चा पैदा की है। अमेरिका भारत को एशिया में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है,जबकि भारत भी वैश्विक मंचों पर अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर चल रही बातचीत को दोनों देशों के कारोबारी समुदाय भी बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं। यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है,तो इससे दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश के नए रास्ते खुल सकते हैं। भारतीय उद्योगों को अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुँच मिल सकती है,वहीं अमेरिकी कंपनियों को भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार और तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था का लाभ मिलेगा।
कुल मिलाकर,भारत-यूएस वार्षिक लीडरशिप समिट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत और अमेरिका के रिश्ते केवल पारंपरिक कूटनीति तक सीमित नहीं रह गए हैं। अब दोनों देश व्यापार,तकनीक,निवेश और वैश्विक रणनीति के स्तर पर एक-दूसरे के सबसे महत्वपूर्ण साझेदारों में शामिल हो चुके हैं। आने वाले महीनों में यदि व्यापार समझौता अंतिम रूप लेता है,तो यह दोनों देशों के संबंधों में एक ऐतिहासिक उपलब्धि साबित हो सकता है।
