नई दिल्ली,28 सितंबर (युआईटीवी)- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंहल की जन्मशती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके जीवन, विचारों, कार्यशैली और राष्ट्र के प्रति समर्पण को याद करते हुए एक विस्तृत विशेष आलेख लिखा है। प्रधानमंत्री ने सोमवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर अपने आलेख का लिंक साझा किया। उन्होंने अशोक सिंहल के व्यक्तित्व को दृढ़ संकल्प, सादगी, आध्यात्मिक आस्था और सामाजिक एकता के प्रति समर्पण का अद्भुत संगम बताया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संदेश में लिखा कि अशोक सिंहल का व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरणा देता रहेगा। उन्होंने कहा कि संगठन के कार्यों के प्रति सिंहल की निष्ठा, आध्यात्मिक विश्वास और समाज को एकजुट करने की भावना उनके जीवन की विशेष पहचान थी। अपने आलेख में प्रधानमंत्री ने अशोक सिंहल के साथ बिताए कई दशकों के अनुभवों और व्यक्तिगत संस्मरणों को भी साझा किया।
प्रधानमंत्री ने अपने आलेख की शुरुआत एक प्रसिद्ध सुभाषित से की। उन्होंने लिखा, “वृक्ष कबहुं नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।” इस सुभाषित का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते और नदी अपने जल को अपने पास रोककर नहीं रखती। इसी प्रकार संत स्वभाव के व्यक्ति भी स्वयं को प्राथमिकता नहीं देते, बल्कि दूसरों की सेवा और लोककल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय परंपरा में ऋषियों और संतों ने हमेशा मानवता के कल्याण के लिए समर्पित जीवन को व्यक्तिगत उपलब्धियों से अधिक महत्व दिया है। उनके अनुसार अशोक सिंहल का जीवन इसी भावना का उदाहरण था। उन्होंने कहा कि सिंहल ने आध्यात्मिक साधना, सांस्कृतिक जागरण और सामाजिक कार्यों के साथ संगठनात्मक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में अपना पूरा जीवन लगा दिया।
प्रधानमंत्री ने बताया कि 27 सितंबर से अशोक सिंहल की जन्मशती का वर्ष शुरू हुआ है। उन्होंने इसे इस महान व्यक्तित्व को सम्मान देने का महत्वपूर्ण अवसर बताया। प्रधानमंत्री के अनुसार अशोक सिंहल ने कई दशकों तक समाज और संगठन के कार्यों के लिए पूरी निष्ठा के साथ काम किया और देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर लोगों से संपर्क स्थापित किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अशोक सिंहल के साथ अपने शुरुआती संपर्क को याद करते हुए वर्ष 1981 का एक प्रसंग साझा किया। उन्होंने बताया कि उस समय वह संगठन के एक युवा कार्यकर्ता के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रहे थे। इसी दौरान उन्हें अशोक सिंहल का हाथ से लिखा हुआ एक पत्र मिला था।
प्रधानमंत्री के अनुसार उस पत्र में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम की जानकारी दी गई थी और उन्हें कुछ जिम्मेदारियाँ सौंपी गई थीं। उन्होंने कहा कि उस समय अशोक सिंहल से पत्र मिलना उनके लिए बेहद विशेष और यादगार अनुभव था। प्रधानमंत्री ने लिखा कि यह छोटी-सी घटना उनके जीवन की उन स्मृतियों में शामिल हो गई, जिन्हें वह लंबे समय तक अपने साथ लेकर चले।
उन्होंने कहा कि उन्हें अशोक सिंहल के साथ लंबे समय तक काम करने, उनसे सीखने, संवाद करने और उनका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला। प्रधानमंत्री ने अपने आलेख में बताया कि उन्होंने सिंहल को कई दशकों तक दिन-रात संगठन और समाज के कार्यों में जुटे हुए देखा।
अशोक सिंहल देश के दूरदराज इलाकों की लंबी और कई बार कठिन यात्राएँ किया करते थे। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों के प्रति उनके लगाव का उल्लेख किया। उनके अनुसार सिंहल लगातार इस बात पर विचार करते रहते थे कि समाज के वंचित और अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों के लिए और क्या किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री ने प्राकृतिक आपदाओं के दौरान अशोक सिंहल की सक्रियता को भी याद किया। उन्होंने कहा कि जब भी देश में कहीं बड़ी प्राकृतिक आपदा आती थी,सिंहल प्रभावित लोगों तक पहुँचने वालों में सबसे आगे रहते थे। वर्ष 2001 में गुजरात के कच्छ में आए विनाशकारी भूकंप के बाद का अनुभव प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से याद किया।
उन्होंने लिखा कि कच्छ भूकंप के बाद अशोक सिंहल के साथ बिताया समय उनके लिए अविस्मरणीय रहा। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में लोगों के बीच पहुँचकर उनकी स्थिति को समझना और सहायता के लिए प्रयास करना सिंहल की कार्यशैली का हिस्सा था। प्रधानमंत्री ने उनके व्यक्तित्व में समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता को महत्वपूर्ण विशेषता के रूप में रेखांकित किया।
प्रधानमंत्री ने अशोक सिंहल के पारिवारिक जीवन और पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि सिंहल एक प्रतिष्ठित और संपन्न परिवार से आते थे। उनके पिता महावीर सिंहल प्रशासनिक सेवा में अपनी पहचान बना चुके थे। परिवार के अन्य सदस्यों ने भी अलग-अलग क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की थीं।
प्रधानमंत्री ने बताया कि अशोक सिंहल के एक भाई बीपी सिंहल पुलिस अधिकारी बने और बाद में संसद सदस्य भी रहे। उनके दूसरे भाई वीपी सिंहल त्रिपुरा के मुख्य सचिव बने थे। परिवार के अन्य सदस्यों ने वाणिज्य और कृषि जैसे क्षेत्रों में सफलता प्राप्त की। हालाँकि,अशोक सिंहल ने अपने जीवन के लिए बिल्कुल अलग मार्ग चुना।
प्रधानमंत्री के अनुसार बहुत कम उम्र में ही उनके व्यक्तित्व में दूसरों के प्रति करुणा और सेवा की भावना दिखाई देने लगी थी। प्रयागराज में उनका बचपन बीता और वहाँ संगम के तट से उनका विशेष लगाव था। वह कई घंटे नदी के किनारे बैठते थे। संगम पर आने वाले साधु-संतों और श्रद्धालुओं के साथ उनका आत्मीय संपर्क रहा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रयागराज का वातावरण और साधु-संतों का सान्निध्य अशोक सिंहल की भारत की सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति समझ को और गहरा करता गया। दूसरों के लिए जीने की उनकी भावना ने उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर प्रेरित किया और आगे चलकर उन्होंने अपना पूरा जीवन संगठन तथा समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
प्रधानमंत्री ने अपने आलेख में अशोक सिंहल की संगठनात्मक क्षमता और प्रभावशाली वक्तृत्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सिंहल ने निरंतर प्रयास और अथक परिश्रम के माध्यम से अनेक संस्थाओं और आंदोलनों को मजबूत करने में भूमिका निभाई।
उनकी वाणी में ऐसा प्रभाव था कि वह बड़े से बड़े जनसमूह को भी अपनी बात से जोड़ लेते थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी अभिव्यक्ति की शैली बेहद प्रभावशाली थी और वह अपनी बात को स्पष्ट तथा प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुँचाते थे।
संत समाज के साथ अशोक सिंहल के संबंधों को भी प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि देशभर के साधु-संतों के बीच सिंहल का गहरा सम्मान था। आध्यात्मिक जगत से उनका संपर्क केवल औपचारिक नहीं था,बल्कि उनके सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा भी था।
प्रधानमंत्री ने अशोक सिंहल की संगठनात्मक क्षमता का उल्लेख करते हुए दो महत्वपूर्ण घटनाओं को याद किया। पहली घटना वर्ष 1993 की थी,जब विश्व हिंदू परिषद ने स्वामी विवेकानंद के शिकागो संबोधन के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अमेरिका में एक सम्मेलन आयोजित किया था।
प्रधानमंत्री ने कहा कि विदेश में इस तरह के बड़े सम्मेलन की कल्पना और उसकी योजना बनाना अशोक सिंहल की संगठनात्मक क्षमता को दर्शाता है। उनके अनुसार सिंहल भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं को वैश्विक स्तर पर लोगों तक पहुँचाने के प्रयासों में भी सक्रिय रहे।
दूसरी घटना वर्ष 2000 की थी,जब त्रिनिदाद और टोबैगो की राजधानी पोर्ट ऑफ स्पेन में विश्व हिंदू सम्मेलन आयोजित हुआ था। प्रधानमंत्री ने बताया कि वह स्वयं भी उस कार्यक्रम में मौजूद थे। इस तरह की गतिविधियों के माध्यम से अशोक सिंहल ने भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़े लोगों के बीच संपर्क को मजबूत करने का प्रयास किया।
प्रधानमंत्री ने अपने आलेख में राम जन्मभूमि आंदोलन में अशोक सिंहल की भूमिका को भी विस्तार से याद किया। उन्होंने कहा कि सिंहल के सार्वजनिक जीवन और कार्यों का उल्लेख राम जन्मभूमि आंदोलन के संदर्भ के बिना पूरा नहीं हो सकता।
प्रधानमंत्री ने वर्ष 1991 में दिल्ली के बोट क्लब पर आयोजित रैली में अशोक सिंहल के भाषण का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान सिंहल की सक्रिय भूमिका और उनके भाषणों ने समर्थकों के बीच प्रभाव पैदा किया। प्रधानमंत्री ने उस दौर में घायल अवस्था में सिंहल की सामने आई तस्वीर को भी याद किया।
प्रधानमंत्री ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का उल्लेख करते हुए कहा कि इस यात्रा में अशोक सिंहल जैसे लोगों के लंबे समय के समर्पण की भूमिका रही। उन्होंने लिखा कि यदि आज अशोक सिंहल जीवित होते और अयोध्या में भव्य राम मंदिर देखते,तो वह इस दृश्य को देखकर बेहद भावुक और प्रसन्न होते।
प्रधानमंत्री ने अशोक सिंहल के सामाजिक दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि वह सामाजिक एकता और समानता के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि समाज में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने अयोध्या में राम मंदिर की पहली ईंट रखने के प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस अवसर के लिए बिहार से आने वाले विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता और वंचित वर्ग से जुड़े कामेश्वर चौपाल को चुना गया था। प्रधानमंत्री ने इसे सामाजिक समरसता के प्रति अशोक सिंहल की सोच से जोड़कर देखा।
इसी तरह काशी में आयोजित एक धर्म संसद के दौरान डोम राजा को सम्मानित करने के उनके फैसले का भी प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया। उनके अनुसार ऐसे कदम यह दिखाते थे कि अशोक सिंहल सामाजिक एकता और समानता को केवल विचार के स्तर पर नहीं, बल्कि व्यवहार में भी महत्व देते थे।
प्रधानमंत्री ने बताया कि राष्ट्र निर्माण के अलावा अशोक सिंहल के दो प्रिय क्षेत्र शिक्षा और संगीत थे। शिक्षा में भी उनका विशेष ध्यान वैदिक शिक्षा पर रहता था। वह शिक्षा को समाज और राष्ट्र के भविष्य के निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम मानते थे।
वाराणसी के सांसद के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी के साथ अशोक सिंहल के संबंध को भी याद किया। उन्होंने बताया कि सिंहल ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी और काशी उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही।
प्रधानमंत्री ने एकल विद्यालय की पहल के साथ उनके गहरे जुड़ाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा को समाज के दूरदराज और वंचित क्षेत्रों तक पहुंचाने की दिशा में अशोक सिंहल की विशेष रुचि थी। उनका मानना था कि शिक्षा के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास और अवसर पहुँचाए जा सकते हैं।
प्रधानमंत्री ने अशोक सिंहल के संगीत प्रेम को याद करते हुए कहा कि उन्हें करीब से जानने वाले लोग जानते थे कि वह बहुत सुंदर गाते थे। प्रधानमंत्री ने नागपुर में हुई उन बैठकों का स्मरण किया,जिनमें सिंहल ‘एकल गीत’ गाया करते थे।
उन्होंने वर्ष 2015 में अशोक सिंहल के 90वें जन्मदिवस समारोह का भी उल्लेख किया। इस अवसर का एक वीडियो व्यापक रूप से चर्चा में आया था,जिसमें सिंहल ने ‘हे मातृभूमि मेरी, हे पितृभूमि मेरी’ गीत प्रस्तुत किया था। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके गायन ने वहां मौजूद लोगों को प्रभावित किया था।
प्रधानमंत्री के अनुसार अशोक सिंहल के व्यक्तित्व में संगठनात्मक क्षमता, आध्यात्मिकता, सामाजिक सरोकार, सांस्कृतिक चेतना, शिक्षा और संगीत के प्रति प्रेम एक साथ दिखाई देता था। यही विविधताएँ उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाती थीं।
अपने आलेख के अंतिम हिस्से में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अशोक सिंहल ने अपने जीवन का हर क्षण राष्ट्र के उत्कर्ष के सपने के साथ बिताया। उन्होंने अपना जीवन व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं के बजाय समाज और राष्ट्र के कार्यों के लिए समर्पित किया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि अशोक सिंहल की जन्मशती केवल उनके जीवन को याद करने का अवसर नहीं है,बल्कि उनके विचारों और कार्यों से नई पीढ़ी को परिचित कराने का भी अवसर है। उन्होंने जोर दिया कि अधिक से अधिक युवाओं को उनके विराट व्यक्तित्व, संगठन के प्रति उनकी निष्ठा, आध्यात्मिक जीवन,सामाजिक समरसता के प्रति प्रतिबद्धता और राष्ट्र सेवा की भावना के बारे में जानना चाहिए।
प्रधानमंत्री के इस आलेख में अशोक सिंहल के जीवन के कई पहलुओं को एक साथ सामने रखा गया है। इसमें उनके बचपन से लेकर संगठनात्मक जीवन, साधु-संतों के साथ संबंध, सामाजिक कार्य, प्राकृतिक आपदाओं के समय सक्रियता, सांस्कृतिक गतिविधियों, राम जन्मभूमि आंदोलन, शिक्षा और संगीत के प्रति लगाव तक का उल्लेख किया गया है। प्रधानमंत्री ने अपने व्यक्तिगत संस्मरणों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया कि अशोक सिंहल का जीवन केवल संगठनात्मक गतिविधियों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें समाज,संस्कृति, आध्यात्मिकता और राष्ट्र के प्रति गहरा समर्पण भी दिखाई देता था।
अशोक सिंहल की जन्मशती के अवसर पर प्रधानमंत्री ने उनके जीवन को परमार्थ और राष्ट्र सेवा की उस परंपरा से जोड़ा,जिसमें व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों से आगे बढ़कर समाज और देश के लिए काम करता है। उनके अनुसार सिंहल की जीवन यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसी विरासत है, जिसे समझना और उससे परिचित होना आवश्यक है।
