हरमनप्रीत कौर (तस्वीर क्रेडिट@PoojaAzamgadi)

कप्तानी से मिली सबसे बड़ी सीख जिम्मेदारी लेना,हरमनप्रीत कौर ने सुनाया एक दशक से ज्यादा लंबे सफर का अनुभव

नई दिल्ली,8 अक्टूबर (युआईटीवी)- भारतीय महिला क्रिकेट की दिग्गज खिलाड़ी और पूर्व कप्तान हरमनप्रीत कौर ने राष्ट्रीय टीम की अगुआई के दौरान हासिल किए अपने अनुभवों को याद करते हुए कहा है कि कप्तानी ने उन्हें सिर्फ मैदान पर फैसले लेना ही नहीं सिखाया,बल्कि सफलता और आलोचना दोनों को समान जिम्मेदारी के साथ स्वीकार करना भी सिखाया। एक दशक से अधिक समय तक भारतीय टीम के नेतृत्व समूह का हिस्सा रहने के दौरान हरमनप्रीत ने कई उतार-चढ़ाव देखे। इस लंबे सफर ने उन्हें यह समझ दी कि किसी टीम का नेतृत्व केवल जीत के समय सामने खड़े होने का नाम नहीं है,बल्कि मुश्किल दौर में भी पूरी टीम के साथ मजबूती से खड़े रहना ही असली नेतृत्व है।

हरमनप्रीत ने वर्ष 2012 में भारतीय टीम की कप्तानी की जिम्मेदारी सँभाली थी। इसके बाद से भारतीय महिला क्रिकेट में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले और टीम ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान को और मजबूत किया। उनकी कप्तानी के दौर में भारत ने कई बड़ी प्रतियोगिताओं में चुनौती पेश की और महिला क्रिकेट को लेकर देश में बढ़ती रुचि के बीच टीम का सफर लगातार आगे बढ़ता रहा। वनडे विश्व कप 2025 का खिताब जीतना उनके नेतृत्व करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा। इसके बाद एशियाई खेल 2026 में भारतीय महिला टीम ने स्वर्ण पदक हासिल किया,जिसने इस सफर को एक और यादगार उपलब्धि दी।

हरमनप्रीत के लिए कप्तानी केवल एक पद या जिम्मेदारी नहीं रही। उनके मुताबिक,इस भूमिका ने उन्हें लगातार खुद को परखने,गलतियों से सीखने और टीम की जरूरतों के मुताबिक फैसले लेने का अवसर दिया। उन्होंने कहा कि जब किसी खिलाड़ी या कप्तान से लोगों की उम्मीदें बढ़ जाती हैं,तो उसके साथ आलोचना भी आती है। कई बार टीम अपनी उम्मीदों के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाती और ऐसे समय में निराशा होना स्वाभाविक है। लेकिन कप्तानी ने उन्हें यह समझाया कि आलोचना से बचने की कोशिश करने के बजाय उसे स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना ज्यादा जरूरी है।

हरमनप्रीत ने कहा कि कप्तान के तौर पर उन्होंने यह सीखा कि जिम्मेदारी केवल खराब प्रदर्शन के समय नहीं ली जानी चाहिए। जीत मिलने पर भी कप्तान को सबसे आगे रहकर उसका श्रेय टीम के साथ साझा करना चाहिए। उनके अनुसार,नेतृत्व का अर्थ यही है कि टीम जिस भी परिस्थिति से गुजर रही हो,कप्तान को उससे अलग खड़े होने के बजाय खिलाड़ियों के साथ रहना चाहिए। हर अनुभव से सीखना और उस सीख को आगे के सफर में इस्तेमाल करना उनके नेतृत्व दर्शन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तानी सँभालने के बाद हरमनप्रीत ने इस भूमिका को व्यक्तिगत उपलब्धि के तौर पर नहीं देखा। उन्होंने कहा कि जब उन्हें वर्ष 2012 में पहली बार यह जिम्मेदारी मिली,तब उनका लक्ष्य इस अवसर का इस्तेमाल भारतीय महिला क्रिकेट को आगे बढ़ाने के लिए करना था। वह चाहती थीं कि टीम में मौजूद प्रतिभाओं को बेहतर मंच मिले और जिन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है,वहाँ लगातार काम किया जाए। उनके लिए कप्तानी किसी व्यक्तिगत पद या पहचान को मजबूत करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि खेल और टीम को आगे ले जाने की जिम्मेदारी थी।

उन्होंने माना कि लंबे सफर के दौरान हर योजना या हर लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। टीम स्पोर्ट में परिस्थितियाँ लगातार बदलती रहती हैं और हर खिलाड़ी का सफर अलग होता है। किसी एक दिन का प्रदर्शन किसी खिलाड़ी की पूरी क्षमता को तय नहीं करता। इसी तरह किसी एक टूर्नामेंट का नतीजा भी पूरी टीम के सफर का अंतिम मूल्यांकन नहीं हो सकता। हरमनप्रीत के मुताबिक,क्रिकेट में हर दिन नई चुनौती लेकर आता है और इसी वजह से खिलाड़ियों को परिणाम से ज्यादा सीखने की प्रक्रिया पर ध्यान देना चाहिए।

कप्तानी के दौरान व्यक्तिगत प्रदर्शन और टीम की जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती रहा। हरमनप्रीत ने कहा कि एक सामान्य खिलाड़ी के रूप में किसी व्यक्ति के पास अपने खेल और फैसलों को लेकर अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता होती है,लेकिन कप्तान बनने के बाद उसके फैसलों का प्रभाव पूरी टीम पर पड़ता है। ऐसे में कई बार व्यक्तिगत चिंताओं या लक्ष्यों को पीछे रखना पड़ता है,क्योंकि टीम की प्राथमिकता सबसे ऊपर होती है।

हालाँकि,हरमनप्रीत ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कप्तानी के कारण कभी अपनी बल्लेबाजी को नजरअंदाज नहीं किया। उनका मानना रहा कि एक खिलाड़ी के तौर पर उनकी सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में अपनी बल्लेबाजी को मजबूत बनाए रखना शामिल है। कप्तानी के दौरान भी उन्होंने अपने खेल को प्राथमिकता दी,लेकिन कई मौकों पर व्यक्तिगत लक्ष्य और योजनाएँ टीम की जरूरतों के पीछे रखनी पड़ीं। अब जब वह कप्तानी की जिम्मेदारी से अलग होकर एक खिलाड़ी के रूप में आगे बढ़ रही हैं,तो वह अपने खेल को और अधिक स्पष्टता के साथ देखना चाहती हैं।

उनका कहना है कि अब वह अपनी भूमिका को बेहतर ढंग से समझने,मैदान पर उसे पूरी क्षमता से निभाने और क्रिकेट के हर पल का आनंद लेने पर ध्यान देना चाहती हैं। कप्तानी की अतिरिक्त जिम्मेदारी के बिना वह अपने खेल के उन पहलुओं पर भी ध्यान दे सकती हैं,जिनके लिए लगातार समय और मानसिक ऊर्जा की जरूरत होती है। उनके लिए यह बदलाव किसी तरह पीछे हटने का संकेत नहीं है,बल्कि अपने अनुभव का इस्तेमाल एक अलग भूमिका में करने का अवसर है।

हरमनप्रीत ने नेतृत्व को केवल कप्तान तक सीमित रखने के विचार से भी असहमति जताई। उनके अनुसार,किसी भी सफल टीम में हर खिलाड़ी के भीतर जिम्मेदारी की भावना होनी चाहिए। वह हमेशा चाहती रही हैं कि टीम में मौजूद हर खिलाड़ी नेतृत्व के गुण विकसित करे। उनके मुताबिक,नेतृत्व की क्षमता केवल कप्तान को बेहतर नहीं बनाती, बल्कि खिलाड़ी को अधिक जिम्मेदार और जवाबदेह भी बनाती है।

उनका मानना है कि जब किसी खिलाड़ी में नेतृत्व की भावना विकसित होती है, तो वह अपने फैसलों और उनके प्रभाव को लेकर अधिक सजग होता है। इससे उसमें संवेदनशीलता,उदारता और दूसरों को समझने की क्षमता बढ़ती है। साथ ही,कठिन परिस्थितियों में तेजी से फैसला लेने और जिम्मेदारी स्वीकार करने का आत्मविश्वास भी पैदा होता है। हरमनप्रीत चाहती थीं कि टीम की सफलता केवल कप्तान की जिम्मेदारी न रहे,बल्कि प्रत्येक खिलाड़ी खुद को उस सफलता का भागीदार और जिम्मेदार सदस्य माने।

इसी वजह से कप्तानी छोड़ने के बाद भी हरमनप्रीत खुद को नेतृत्व से अलग नहीं मानतीं। उनके लिए नेतृत्व अब एक अलग तरीके से टीम के साथ जुड़ने का माध्यम है। अब टीम की कमान स्मृति मंधाना के हाथों में है और हरमनप्रीत अपनी लंबे समय की साथी खिलाड़ी को नेतृत्व करते हुए देखने को लेकर उत्साहित हैं। दोनों ने भारतीय क्रिकेट के साथ लंबा समय बिताया है और कई महत्वपूर्ण मुकाबलों में साथ खेला है।

हरमनप्रीत के अनुसार,स्मृति के साथ उनका रिश्ता केवल मैदान पर एक साथी खिलाड़ी का नहीं है। दोनों ने लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ खेलते हुए कई परिस्थितियों का सामना किया है। उन्होंने साथ में फैसले लिए हैं,टीम के उतार-चढ़ाव देखे हैं और भारतीय महिला क्रिकेट में हुए बदलावों का हिस्सा रही हैं। यही साझा अनुभव अब नई भूमिका में भी उनके बीच बेहतर तालमेल बनाने में मदद कर सकता है।

हरमनप्रीत ने यह भी स्पष्ट किया कि कप्तानी से हटने का फैसला किसी एक हार,किसी खास श्रृंखला या किसी एक टूर्नामेंट के परिणाम की वजह से नहीं लिया गया। यह उनके करियर और भविष्य को लेकर किया गया व्यक्तिगत आकलन था। लंबे समय तक टीम का नेतृत्व करने के बाद उन्होंने यह सोचा कि अब अपने करियर के अगले चरण में वह किस तरह योगदान देना चाहती हैं। इसलिए उनके लिए कप्तानी से अलग होना किसी अचानक आए फैसले के बजाय एक स्वाभाविक बदलाव रहा।

उनके करियर में विश्व कप जीतने का सपना हमेशा विशेष रहा। हरमनप्रीत ने कहा कि विश्व कप जीतना उनके उन बड़े सपनों में शामिल था,जिसे वह अपने खेल जीवन में पूरा होते देखना चाहती थीं। जब यह सपना पूरा हुआ,तो उनके भीतर एक अलग तरह की संतुष्टि पैदा हुई। खास बात यह रही कि उनके वनडे कप्तानी के सफर के शुरुआती वर्षों में ही उन्हें इस उपलब्धि का अनुभव मिला। इसके बाद उनके लिए नेतृत्व के सफर को लेकर किसी तरह का अधूरापन नहीं रहा।

उनके शब्दों में,अब वह अपने लंबे सफर को पीछे मुड़कर देखती हैं,तो उनके भीतर पछतावे से ज्यादा संतुष्टि और आभार का भाव है। उन्होंने माना कि यह सफर बाहर से देखने जितना आसान नहीं था। कप्तान के तौर पर लगातार उम्मीदों के बीच खेलना,टीम को सँभालना, व्यक्तिगत प्रदर्शन पर ध्यान देना और अलग-अलग परिस्थितियों में फैसले लेना चुनौतीपूर्ण रहा। लेकिन दूसरी ओर,उन्होंने यह भी माना कि सफर उतना कठिन नहीं था जितना कई बार बाहर से दिखाई देता है।

हरमनप्रीत की कहानी भारतीय महिला क्रिकेट में नेतृत्व के बदलते स्वरूप को भी दर्शाती है। जिस दौर में उन्होंने टीम की कमान सँभाली थी,उस समय महिला क्रिकेट को आज की तरह व्यापक लोकप्रियता और व्यावसायिक समर्थन नहीं मिला था। वर्षों के दौरान महिला क्रिकेट के प्रति दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ी,खिलाड़ियों को अधिक अवसर मिले और टीम ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कई बड़ी उपलब्धियाँ हासिल कीं। इस परिवर्तन के बीच हरमनप्रीत खुद भी एक खिलाड़ी से वरिष्ठ खिलाड़ी और कप्तान से अब मार्गदर्शक भूमिका की ओर बढ़ी हैं।

उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि केवल व्यक्तिगत रिकॉर्ड या कप्तानी की अवधि नहीं है, बल्कि यह है कि उन्होंने टीम में नेतृत्व की सोच को मजबूत करने की कोशिश की। वह चाहती थीं कि आने वाली पीढ़ी की खिलाड़ी केवल अपनी भूमिका निभाने तक सीमित न रहें,बल्कि जरूरत पड़ने पर टीम के लिए फैसले लेने और जिम्मेदारी उठाने में भी सक्षम हों। यही सोच अब उनके खेल जीवन के अगले चरण में भी उनके योगदान का आधार बन सकती है।

कप्तानी के दौरान आलोचना का सामना करने से लेकर विश्व कप जीतने तक हरमनप्रीत ने कई तरह के अनुभव हासिल किए। इन अनुभवों ने उन्हें यह सिखाया कि खेल में कोई भी दौर स्थायी नहीं होता। जीत के बाद भी नए लक्ष्य सामने आते हैं और हार के बाद भी वापसी का अवसर मौजूद रहता है। इसलिए एक कप्तान या खिलाड़ी की असली पहचान इस बात से बनती है कि वह परिस्थितियों के बदलने पर खुद को किस तरह ढालता है।

अब जब वह कप्तानी की जिम्मेदारी से मुक्त होकर मैदान पर उतरेंगी,तो उनके पास वर्षों का अनुभव होगा। टीम में उनकी भूमिका पहले की तरह औपचारिक नेतृत्व वाली नहीं होगी,लेकिन उनके अनुभव और समझ का महत्व बना रहेगा। नई कप्तान स्मृति मंधाना के नेतृत्व में भारतीय टीम के सामने नई चुनौतियाँ होंगी और हरमनप्रीत की मौजूदगी युवा खिलाड़ियों के लिए अनुभव का महत्वपूर्ण स्रोत हो सकती है।

हरमनप्रीत के लिए कप्तानी का अध्याय भले ही समाप्त हो गया हो,लेकिन भारतीय महिला क्रिकेट के प्रति उनकी जिम्मेदारी और जुड़ाव खत्म नहीं हुआ है। उनके अपने शब्दों में, नेतृत्व उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बना रहेगा। अब वह इसी नेतृत्व भावना को अपनी नई भूमिका में इस्तेमाल करना चाहती हैं। उनका लक्ष्य अपने खेल को बेहतर करना,टीम की जरूरत के अनुसार योगदान देना और क्रिकेट के हर पल का आनंद लेना है।

एक दशक से ज्यादा लंबे कप्तानी के सफर को पीछे छोड़ते हुए हरमनप्रीत के पास उपलब्धियों की एक लंबी सूची है,लेकिन उनकी बातों से यह स्पष्ट होता है कि वह अपने करियर को केवल ट्रॉफियों और आँकड़ों के जरिए नहीं देखतीं। उनके लिए टीम के साथ खड़े रहना, आलोचना और सफलता दोनों की जिम्मेदारी स्वीकार करना,खिलाड़ियों में नेतृत्व की भावना पैदा करना और लगातार सीखते रहना ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है। अब उनके करियर का अगला चरण एक खिलाड़ी के रूप में होगा,लेकिन कप्तानी से मिली सीख उनके साथ आगे भी बनी रहेगी।