नई दिल्ली,13 अक्टूबर (युआईटीवी)- मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर केंद्र की राजनीति में जारी विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया तक पहुँच गया है। राहुल गांधी और विपक्षी गठबंधन के नेताओं ने 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने के बाद मतदाता सूची की इस प्रक्रिया को चुनौती देते हुए याचिका दायर की। हालाँकि,याचिका दाखिल होने के बाद सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने इसमें 14 तकनीकी खामियाँ बताई हैं। इनमें निर्धारित कोर्ट फीस से 220 रुपये कम जमा होना,कुछ दस्तावेजों का अधूरा होना और याचिकाकर्ताओं के वकालतनामे से जुड़ी कमियाँ शामिल हैं। इन आपत्तियों के कारण याचिका तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हो सकी। हालाँकि, यह स्थिति याचिका की कानूनी दलीलों पर अदालत के किसी फैसले का संकेत नहीं है।
राहुल गांधी और विपक्षी दलों के नेताओं की कानूनी टीम ने सोमवार,12 अक्टूबर की शाम संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर की। इस याचिका में कुल 11 नेताओं को याचिकाकर्ता बनाया गया है। निर्वाचन आयोग,मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू को प्रतिवादी बनाया गया है। विपक्ष ने एसआईआर की प्रक्रिया,मतदाता सूची से नाम हटाने के तरीकों और निर्वाचन आयोग के कामकाज से जुड़े कई सवाल उठाए हैं। याचिका में इस प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने सहित कई राहतों की माँग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट में कोई याचिका दाखिल होने के बाद उसकी सुनवाई से पहले रजिस्ट्री यह जाँच करती है कि जरूरी दस्तावेज,निर्धारित शुल्क और अन्य औपचारिकताएँ पूरी की गई हैं या नहीं। विपक्ष की ओर से दाखिल याचिका में भी इसी प्रक्रिया के दौरान कई आपत्तियाँ दर्ज की गईं।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक,याचिका के साथ निर्धारित कोर्ट फीस से 220 रुपये कम जमा किए गए थे। इसके अलावा,कुछ याचिकाकर्ताओं के वकालतनामे पर हस्ताक्षर नहीं होने या जरूरी प्राधिकरण संबंधी दस्तावेजों की कमी की बात सामने आई। वकालतनामा वह दस्तावेज होता है,जिसके जरिए कोई पक्षकार अपने मामले की पैरवी के लिए वकील को अधिकृत करता है।
याचिका के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पहचान पत्र की प्रति भी स्पष्ट और पढ़ने योग्य नहीं बताई गई। इसके अलावा, कुछ आवश्यक दस्तावेज या पन्ने गायब होने की आपत्ति भी दर्ज की गई। इन कमियों को दूर करने के बाद याचिका को सुनवाई के लिए आगे बढ़ाने की प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।
यह समझना जरूरी है कि रजिस्ट्री की आपत्तियाँ मुख्य रूप से दाखिले की औपचारिकताओं से जुड़ी होती हैं। इनका अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष की मांगों को खारिज कर दिया है या एसआईआर को लेकर उसकी दलीलों पर कोई निष्कर्ष निकाल लिया है। आम तौर पर याचिकाकर्ताओं को बताई गई कमियों को दूर करने का अवसर मिलता है। इसके बाद याचिका की आगे की प्रक्रिया पूरी की जा सकती है। अब इस मामले में सुनवाई का रास्ता तकनीकी आपत्तियों के निस्तारण और अदालत की सूचीबद्धता पर निर्भर करेगा।
विशेष गहन पुनरीक्षण निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूची की व्यापक जाँच के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया है। इसके तहत मतदाताओं की जानकारी का सत्यापन किया जाता है। घर-घर जाकर जाँच के दौरान मृत व्यक्तियों के नाम,स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लोगों की प्रविष्टियाँ और मतदाता सूची में दर्ज दोहरे नामों की पहचान करने का प्रयास किया जाता है। इसके साथ ही पात्र नए मतदाताओं को सूची में शामिल करने की प्रक्रिया भी होती है।
निर्वाचन आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को अद्यतन और अधिक सटीक बनाए रखने के लिए ऐसी समीक्षा जरूरी है। वहीं,विपक्ष ने इस प्रक्रिया के क्रियान्वयन पर सवाल उठाए हैं। उसका तर्क है कि यदि नाम हटाने या जानकारी में बदलाव करने की प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं होगी,तो पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
दी गई जानकारी के अनुसार,आयोग ने 24 जून 2025 को बिहार में एसआईआर का पहला आदेश जारी किया था। इसके बाद 27 अक्टूबर 2025 को 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कार्यक्रम घोषित किया गया। फिर 14 मई 2026 को 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए अगले चरण का कार्यक्रम सामने आया। दिल्ली में दावे और आपत्तियाँ दर्ज कराने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर बताई गई है।
एसआईआर को लेकर विवाद के बीच बिहार की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट का पहले दिया गया फैसला भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 27 मई 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण को वैध ठहराया था।
उस फैसले में अदालत ने कहा था कि निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 21(3) के तहत मतदाता सूची की विशेष समीक्षा करने का अधिकार है। इस निर्णय को आयोग की शक्तियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया।
हालाँकि,बिहार की प्रक्रिया पर दिए गए फैसले और अब दाखिल की गई नई याचिका के सवालों में अंतर हो सकता है। विपक्ष की मौजूदा याचिका में केवल एसआईआर कराने के अधिकार को चुनौती देने तक मामला सीमित नहीं है। इसमें प्रक्रिया लागू करने के तरीके, मतदाता सूची से नाम हटाने की कार्रवाई और आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं।
इसी वजह से बिहार संबंधी पुराने फैसले को मौजूदा याचिका के हर सवाल का स्वतः उत्तर नहीं माना जा सकता। अदालत को यदि मामला सुनवाई के लिए स्वीकार होता है,तो उसे याचिका में उठाए गए विशिष्ट मुद्दों और संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर विचार करना होगा।
विपक्षी नेताओं ने याचिका में करीब 10 राहतों की माँग की है। इनमें एसआईआर की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने और इससे जुड़े फैसलों की कानूनी जाँच कराने की माँग प्रमुख है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र जाँच जरूरी है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति गठित करने की माँग भी शामिल है। प्रस्तावित समिति से मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया और चुनावी डेटाबेस में हुए बदलावों का ऑडिट कराने की बात कही गई है।
विपक्ष चाहता है कि मतदाता सूची से हटाए गए सभी नाम बूथवार सार्वजनिक किए जाएँ और प्रत्येक नाम हटाने का कारण स्पष्ट रूप से बताया जाए। इसके अलावा,फॉर्म-6 में किए गए बदलावों और निर्वाचन आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता की जाँच की माँग भी उठाई गई है। फॉर्म-6 का इस्तेमाल पात्र व्यक्तियों के नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए किया जाता है।
इन मांगों के जरिए विपक्ष ने मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने और पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने पर जोर दिया है। हालाँकि,इन आरोपों और मांगों पर अंतिम निष्कर्ष अदालत की सुनवाई तथा संबंधित पक्षों के जवाब के बाद ही सामने आ सकता है।
एसआईआर को लेकर विपक्ष का विरोध केवल न्यायिक चुनौती तक सीमित नहीं है। विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि मतदाता सूची की समीक्षा और उससे जुड़े फैसलों पर उठे सवालों का जवाब दिया जाना चाहिए।
दूसरी ओर,निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को जारी अपने बयान में कहा था कि बिहार, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में एसआईआर से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। इस बयान के जरिए आयोग ने निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर अपना पक्ष रखा था।
इस प्रकार,एसआईआर को लेकर राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर विवाद जारी है। एक ओर निर्वाचन आयोग मतदाता सूची को अद्यतन करने की प्रक्रिया को जरूरी बता रहा है,वहीं विपक्ष इसके क्रियान्वयन और पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है।
फिलहाल,विपक्ष की याचिका पर तत्काल सुनवाई न हो पाने की वजह रजिस्ट्री की ओर से बताई गई तकनीकी खामियाँ हैं। याचिकाकर्ताओं को इन कमियों को दूर करना होगा, जिसके बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। यह अलग बात है कि याचिका पर सुनवाई कब होगी और अदालत अंतरिम राहत देने के अनुरोध पर क्या रुख अपनाएगी।
मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि मतदाता सूची चुनावी प्रक्रिया का बुनियादी हिस्सा है। सूची में नाम शामिल करने,हटाने और विवरण में बदलाव से जुड़े फैसलों का सीधा संबंध मतदान के अधिकार से है। इसलिए इस प्रक्रिया में पारदर्शिता, पात्र मतदाताओं के हितों की सुरक्षा और निर्वाचन आयोग की कानूनी शक्तियों के बीच संतुलन अहम रहेगा।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तकनीकी आपत्तियाँ दूर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट विपक्ष की याचिका पर सुनवाई करता है या नहीं। यदि मामला सुनवाई के लिए आता है,तो अदालत के सामने एसआईआर की वैधता के साथ-साथ उसके क्रियान्वयन, नाम हटाने की प्रक्रिया और पारदर्शिता से जुड़े सवाल भी विचार के लिए आ सकते हैं। फिलहाल,रजिस्ट्री की आपत्तियों को याचिका के गुण-दोष पर अदालत के फैसले से अलग समझना जरूरी है।
