अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (तस्वीर क्रेडिट@mdzishan0786)

ईरान पर दोबारा हमले की तैयारी में अमेरिका और इजरायल? ट्रंप-नेतन्याहू की बातचीत से बढ़ीं अटकलें, प्रशासन में मतभेद

वाशिंगटन,14 अक्टूबर (युआईटीवी)- अमेरिका और इजरायल के बीच ईरान को लेकर कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर हलचल तेज होने की खबरें सामने आ रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हुई बातचीत को लेकर ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि दोनों नेताओं ने ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं पर चर्चा की है। हालाँकि,अब तक किसी नए हमले को लेकर अंतिम निर्णय की पुष्टि नहीं हुई है। इस घटनाक्रम ने पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति और अमेरिका-इजरायल की रणनीति को लेकर चर्चाएँ बढ़ा दी हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल को ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी खुफिया जानकारियों को लेकर चिंता है। इजरायली नेतृत्व को आशंका है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकता है। इसी पृष्ठभूमि में नेतन्याहू की ओर से ईरान के खिलाफ सैन्य विकल्पों पर विचार करने की बात कही जा रही है। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन के भीतर इस मुद्दे पर अलग-अलग विचार सामने आने की खबरें हैं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि वाशिंगटन किसी नए सैन्य अभियान के पक्ष में अंतिम सहमति बनाएगा या दबाव बनाने के दूसरे तरीकों को प्राथमिकता देगा।

अमेरिकी समाचार वेबसाइट एक्सिओस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप और नेतन्याहू के बीच ईरान से जुड़े घटनाक्रम पर बातचीत हुई। रिपोर्ट के मुताबिक,इस जानकारी के लिए दो अमेरिकी अधिकारियों,एक इजरायली अधिकारी और मामले से परिचित एक अन्य सूत्र का हवाला दिया गया है। हालाँकि,बातचीत में क्या-क्या तय हुआ, इसे लेकर सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि नेतन्याहू ईरान की परमाणु गतिविधियों से जुड़ी खुफिया सूचनाओं को लेकर चिंतित हैं। इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर मुद्दा बताता रहा है। इजरायली नेतृत्व की आशंका है कि यदि ईरान की परमाणु क्षमताओं में फिर विस्तार होता है,तो भविष्य में उसके सामने सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं। इसी वजह से इजरायल की ओर से सैन्य विकल्पों पर विचार किए जाने की चर्चा हो रही है।

हालाँकि,किसी सैन्य विकल्प पर चर्चा होना और उस पर अमल करने का निर्णय लेना दो अलग-अलग बातें हैं। रिपोर्ट में भी यह संकेत दिया गया है कि संभावित कार्रवाई की तैयारियों और हमले की वास्तविक समयसीमा के बीच स्पष्ट अंतर है। अभी यह तय नहीं माना जा सकता कि अमेरिका या इजरायल निकट भविष्य में ईरान पर हमला करने जा रहे हैं।

रिपोर्ट में एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि नेतन्याहू ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान फिर शुरू करने के पक्ष में हैं और इस विषय पर ट्रंप के साथ कई बार चर्चा कर चुके हैं। सूत्र के अनुसार,ट्रंप ने नेतन्याहू को संभावित परिस्थितियों के लिए तैयारियाँ शुरू करने के लिए कहा था। हालाँकि,बातचीत में किसी निश्चित तारीख या समयसीमा पर सहमति बनने की बात सामने नहीं आई।

इस जानकारी के अनुसार,तैयारी शुरू करने का निर्देश तत्काल हमले का आदेश नहीं माना जाना चाहिए। सैन्य तैयारियाँ कई संभावित परिस्थितियों से निपटने के लिए की जा सकती हैं। किसी अभियान को शुरू करने से पहले राजनीतिक नेतृत्व को सुरक्षा स्थिति,संभावित जवाबी कार्रवाई,क्षेत्रीय स्थिरता और उसके आर्थिक प्रभावों जैसे कई पहलुओं पर विचार करना पड़ता है।

रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि संभावित सैन्य कार्रवाई बाद में हो सकती है, लेकिन यह भी संभव है कि अंततः ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाए। इसलिए मौजूदा स्थिति को किसी निश्चित सैन्य फैसले के बजाय विकल्पों पर विचार और तैयारियों से जुड़ी खबरों के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

इस पूरे घटनाक्रम पर अमेरिकी प्रशासन की ओर से अलग प्रतिक्रिया सामने आई है। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने ट्रंप और नेतन्याहू के बीच ईरान के साथ युद्ध दोबारा शुरू करने पर चर्चा होने के दावे से इनकार किया। इस बयान के बाद रिपोर्ट में किए गए दावों और आधिकारिक प्रतिक्रिया के बीच अंतर स्पष्ट हो गया है।

वहीं,नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा कि इजरायली प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति और अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ नियमित संपर्क में रहते हैं। हालाँकि,इस प्रतिक्रिया में कथित बातचीत के दौरान ईरान पर हमले को लेकर किसी विशेष निर्णय की पुष्टि नहीं की गई।

ऐसे में फिलहाल उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है कि दोनों नेताओं ने नए सैन्य अभियान पर सहमति बना ली है। एक ओर मीडिया रिपोर्ट में बातचीत और तैयारियों का उल्लेख है,जबकि दूसरी ओर अमेरिकी प्रशासन ने युद्ध दोबारा शुरू करने पर चर्चा होने के दावे को खारिज किया है। इस विरोधाभास के कारण घटनाक्रम पर नजर बनाए रखना जरूरी हो गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान पर दोबारा सैन्य कार्रवाई के प्रस्ताव को लेकर ट्रंप का रुख पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। एक इजरायली अधिकारी ने दावा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति शुरुआत में इस विचार के प्रति सकारात्मक दिखाई दिए थे,लेकिन बाद में उनकी ओर से हिचकिचाहट भी देखने को मिली। एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार,इस मुद्दे पर ट्रंप की स्थिति समय-समय पर बदलती रही है।

ट्रंप की ओर से पहले यह संकेत दिए जाने की बात भी सामने आई थी कि नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई नहीं की जाएगी। यदि प्रशासन इस रुख पर कायम रहता है,तो निकट भविष्य में किसी नए अभियान की संभावना सीमित हो सकती है। हालाँकि,केवल इन संकेतों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि सैन्य विकल्प पूरी तरह समाप्त हो गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने एक तरफ इजरायल की सुरक्षा संबंधी चिंताएँ हैं,तो दूसरी तरफ किसी नए युद्ध के संभावित परिणामों पर विचार करने की जरूरत है। ईरान के खिलाफ कार्रवाई से क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है और अमेरिकी हितों,सैन्य ठिकानों तथा सहयोगी देशों की सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है। इसी कारण किसी भी संभावित निर्णय के राजनीतिक और रणनीतिक पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ और अमेरिकी सेंट्रल कमांड से जुड़े कुछ अधिकारी सैन्य विकल्पों का समर्थन करते हैं। दूसरी ओर,ट्रंप के कुछ सलाहकारों का मानना है कि ईरान के खिलाफ युद्ध दोबारा शुरू करने के बजाय आर्थिक प्रतिबंधों और अन्य दबाव के उपायों को जारी रखना बेहतर हो सकता है।

यह मतभेद अमेरिकी प्रशासन के सामने मौजूद रणनीतिक चुनौती को दर्शाता है। सैन्य कार्रवाई से ईरान की कुछ क्षमताओं को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन इसके साथ जवाबी हमलों और संघर्ष के व्यापक होने का जोखिम भी जुड़ा रहता है। इसके विपरीत,प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव के माध्यम से ईरान की नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास किया जा सकता है,हालाँकि ऐसे उपायों का असर तत्काल या निश्चित नहीं होता।

अमेरिकी प्रशासन के भीतर अलग-अलग विचार होने की खबरों के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राष्ट्रपति किस रणनीति को प्राथमिकता देते हैं। किसी सैन्य अभियान का फैसला केवल सैन्य तैयारियों पर निर्भर नहीं करता,बल्कि उसके संभावित उद्देश्य, लागत,जोखिम और आगे की परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।

ईरान को लेकर बढ़ती चर्चा ऐसे समय हो रही है,जब अमेरिका और इजरायल दोनों में चुनावी राजनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अमेरिका में नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं,इजरायल में भी सुरक्षा से जुड़े सवाल राजनीतिक नेतृत्व के लिए अहम बने हुए हैं।

रिपोर्ट में एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि नेतन्याहू के लिए चुनाव से पहले सुरक्षा का मुद्दा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। उनके अनुसार,नेतन्याहू संकट की स्थिति में देश की सुरक्षा सँभालने वाले नेता के रूप में अपनी भूमिका पेश कर सकते हैं। हालाँकि,यह अधिकारी का आकलन है,न कि नेतन्याहू की मंशा के बारे में प्रमाणित तथ्य।

चुनावी परिस्थितियों में किसी सैन्य कार्रवाई का घरेलू राजनीति पर असर पड़ सकता है, लेकिन उसके परिणामों का अनुमान लगाना आसान नहीं होता। किसी अभियान को लेकर जनता की प्रतिक्रिया,सुरक्षा स्थिति में बदलाव और संघर्ष की अवधि जैसे कारक राजनीतिक बहस को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए ईरान के संबंध में संभावित सैन्य निर्णय को केवल चुनावी रणनीति से जोड़कर देखना भी पर्याप्त नहीं होगा।

यदि अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ नया सैन्य अभियान शुरू करते हैं, तो उसका प्रभाव केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रह सकता। पश्चिम एशिया में पहले से मौजूद तनाव और विभिन्न पक्षों के बीच टकराव की आशंकाओं के कारण किसी भी सैन्य कार्रवाई से क्षेत्रीय सुरक्षा की स्थिति प्रभावित हो सकती है। ऊर्जा बाजार,समुद्री व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता बढ़ सकती है।

हालाँकि,अभी तक किसी नए हमले की पुष्टि नहीं हुई है और अमेरिकी प्रशासन की ओर से सामने आया बयान भी रिपोर्ट के दावों से अलग है। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ युद्ध दोबारा शुरू करने जा रहे हैं।

मौजूदा घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या दोनों देश सैन्य विकल्पों को केवल संभावित परिस्थितियों के लिए तैयार रख रहे हैं या आगे चलकर उन पर अमल करने का निर्णय भी लिया जाएगा। जब तक इस संबंध में स्पष्ट आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आती,तब तक ट्रंप और नेतन्याहू की बातचीत,प्रशासन के भीतर मतभेद और चुनावी परिस्थितियाँ इस पूरे मामले के महत्वपूर्ण पहलू बने रहेंगे।