तेहरान,10 फरवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव, लगातार मिल रही धमकियों और परमाणु वार्ता की अनिश्चितता के बीच ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने देशवासियों से एकजुटता दिखाने की अपील की है। 1979 की इस्लामिक क्रांति की 47वीं वर्षगांठ से पहले राष्ट्र के नाम टेलीविजन पर प्रसारित अपने संबोधन में खामेनेई ने कहा कि किसी भी देश की असली ताकत मिसाइलों,लड़ाकू विमानों या अन्य सैन्य संसाधनों में नहीं,बल्कि उसके लोगों के दृढ़ संकल्प और दुश्मन को मुँहतोड़ जवाब देने की क्षमता में होती है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है,जब ईरान बुधवार को देशभर में इस्लामिक क्रांति की जीत के जश्न में बड़े पैमाने पर रैलियों और मार्च की तैयारी कर रहा है।
खामेनेई ने अपने भाषण में साफ शब्दों में कहा कि जब तक कोई राष्ट्र अपने दुश्मनों को निराश नहीं करता,तब तक वह उत्पीड़न और दबाव का शिकार बना रहता है। उन्होंने कहा, “जब तक दुश्मन निराश नहीं होता,एक राष्ट्र पर अत्याचार होता रहता है। दुश्मन को निराश होना ही होगा।” सिन्हुआ न्यूज एजेंसी के मुताबिक,ईरानी सुप्रीम लीडर ने इस वार्षिक मार्च को राष्ट्रीय सम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक बताया,जो विदेशी शक्तियों को ईरान के आंतरिक मामलों में दखल देने की उनकी महत्वाकांक्षाओं से पीछे हटने के लिए मजबूर करता है। खामेनेई के अनुसार,यह एकजुटता का प्रदर्शन दुनिया को यह संदेश देता है कि ईरानी राष्ट्र दबाव,धमकी या जबरदस्ती की भाषा से डरने वाला नहीं है।
मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य जमावड़े और तेहरान के खिलाफ लगातार सख्त बयानों के बीच खामेनेई का यह संबोधन अमेरिका के साथ बढ़े तनाव की गहराई को भी दर्शाता है। बीते शुक्रवार को ओमान की राजधानी मस्कट में ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधिमंडलों के बीच अप्रत्यक्ष परमाणु वार्ता जरूर हुई,लेकिन उसके बावजूद दोनों देशों के रिश्तों में तल्खी कम होती नहीं दिख रही है। इन बातचीतों को लेकर किसी ठोस घोषणा या समझौते के संकेत न मिलने से यह साफ है कि परमाणु मुद्दे पर सहमति की राह अभी भी मुश्किल बनी हुई है।
खामेनेई ने अपने भाषण में यह उम्मीद भी जताई कि इस साल इस्लामिक क्रांति की वर्षगांठ का उत्सव “अन्य राष्ट्रों,सरकारों और वैश्विक शक्तियों को ईरानी जनता के प्रति विनम्रता और सम्मान दिखाने” के लिए मजबूर करेगा। उन्होंने कहा कि यह दिन सिर्फ इतिहास को याद करने का नहीं,बल्कि ईरान की स्वतंत्र पहचान और आत्मनिर्भरता को दोहराने का अवसर है। उनके अनुसार,ईरान की क्रांति ने देश को विदेशी नियंत्रण से मुक्त किया और जनता को अपने भविष्य का फैसला खुद करने का अधिकार दिया।
1979 की इस्लामिक क्रांति ईरान के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ थी। इस क्रांति ने पश्चिम समर्थक शाह मोहम्मद रजा पहलवी की राजशाही का अंत कर ईरान को एक इस्लामी गणराज्य में बदल दिया। अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में मौलवियों,छात्रों और धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं के एक व्यापक गठबंधन ने शाह की सत्ता को उखाड़ फेंका। इस क्रांति के बाद ईरान की विदेश नीति और अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में भी आमूलचूल बदलाव आया। 1980 में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध पूरी तरह टूट गए,जब ईरानी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया था और दर्जनों अमेरिकी नागरिकों को बंधक बना लिया गया था।
आज,चार दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी ईरान और अमेरिका के बीच अविश्वास की खाई पाटी नहीं जा सकी है। हाल के वर्षों में यह तनाव ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर और गहरा गया है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का आरोप है कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु हथियार विकसित करने की कोशिश कर रहा है,जबकि तेहरान बार-बार यह दोहराता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।
इसी पृष्ठभूमि में ओमान की भूमिका एक अहम मध्यस्थ के रूप में उभर कर सामने आई है। सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल से जुड़े नूर न्यूज के अनुसार,एसएनएससी के सचिव अली लारीजानी मंगलवार को ओमान की राजधानी मस्कट का दौरा करेंगे,जहाँ वह एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। रिपोर्ट के मुताबिक,लारीजानी ओमान के शीर्ष अधिकारियों से क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के साथ-साथ द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा करेंगे। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है,जब ओमान ने हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच अप्रत्यक्ष परमाणु वार्ता के एक दौर की मेजबानी और मध्यस्थता की थी।
सिन्हुआ न्यूज एजेंसी के अनुसार,ओमान को भविष्य की बातचीत के लिए भी एक संभावित और भरोसेमंद स्थान माना जा रहा है। रविवार को तेहरान में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा कि परमाणु वार्ता के अगले दौर की तारीख और स्थान ओमान के साथ परामर्श के बाद तय किया जाएगा। इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों पक्ष बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं करना चाहते,भले ही मतभेद गहरे क्यों न हों।
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने भी अमेरिका के साथ हाल ही में हुई अप्रत्यक्ष परमाणु बातचीत को “एक कदम आगे” बताया है। हालाँकि,उन्होंने यह भी साफ किया कि वाशिंगटन की ओर से नए प्रतिबंधों और टैरिफ की धमकियों के जरिए तेहरान पर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिशें जारी हैं। पेजेशकियन के मुताबिक,ईरान ने हमेशा शांतिपूर्ण समाधान का रास्ता चुना है,लेकिन वह दबाव की राजनीति के आगे झुकने वाला नहीं है।
ओमान की मध्यस्थता से हुई यह बातचीत जून 2025 में इजरायल और ईरान के बीच हुए संघर्ष के बाद दोनों दुश्मन देशों के बीच पहली उच्चस्तरीय वार्ता थी। उस संघर्ष के दौरान अमेरिका ने ईरान के प्रमुख परमाणु ठिकानों पर हमला किया था,जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुँच गया था। राष्ट्रपति पेजेशकियन ने कहा कि मौजूदा बातचीत शांतिपूर्ण समाधान के लिए तेहरान की “लगातार रणनीति” का नतीजा है,लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि यह पहल किसी वास्तविक सुलह से ज्यादा सतर्क संकट प्रबंधन का संकेत देती है।
राष्ट्रपति पेजेशकियन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने लिखा कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएँ परमाणु अप्रसार संधि के तहत मिलने वाले “स्पष्ट अधिकारों” के दायरे में ही हैं। उन्होंने कहा, “ईरानी राष्ट्र ने हमेशा सम्मान का जवाब सम्मान से दिया है,लेकिन वह जोर-जबरदस्ती और धमकी की भाषा को कभी बर्दाश्त नहीं करता।” यह बयान साफ तौर पर अमेरिका और उसके सहयोगियों को संदेश देता है कि ईरान अपने राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच खामेनेई का संबोधन ईरान के अंदरूनी मोर्चे पर भी अहम माना जा रहा है। आर्थिक प्रतिबंधों,महँगाई और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद सरकार जनता से यह संदेश देना चाहती है कि राष्ट्रीय एकता ही देश की सबसे बड़ी ताकत है। इस्लामिक क्रांति की वर्षगांठ पर होने वाले मार्च और रैलियाँ सिर्फ उत्सव नहीं,बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश का भी माध्यम हैं। इन आयोजनों के जरिए ईरान दुनिया को यह दिखाने की कोशिश करेगा कि वह दबावों के बावजूद एकजुट है और अपने रास्ते पर अडिग है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव,बातचीत और टकराव की यह जटिल तस्वीर फिलहाल किसी स्पष्ट समाधान की ओर बढ़ती नहीं दिख रही है। एक ओर खामेनेई जैसे नेता दृढ़ संकल्प और प्रतिरोध की बात कर रहे हैं,तो दूसरी ओर कूटनीतिक चैनल भी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ओमान की मध्यस्थता और अप्रत्यक्ष वार्ताएँ तनाव कम करने में कितनी कारगर साबित होती हैं या फिर यह टकराव एक बार फिर किसी नए मोड़ पर पहुँचता है।
