दिल्ली हाईकोर्ट

अगस्ता वेस्टलैंड मामले में क्रिश्चियन मिशेल को राहत नहीं,दिल्ली हाईकोर्ट ने रिहाई याचिका खारिज की

नई दिल्ली,8 अप्रैल (युआईटीवी)- दिल्ली हाईकोर्ट ने अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी चॉपर घोटाला मामले में कथित बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल जेम्स को बड़ा झटका देते हुए उनकी रिहाई से जुड़ी याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत का यह फैसला ऐसे समय आया है,जब मिशेल ने यह दावा किया था कि जिन आरोपों के आधार पर उन्हें भारत लाया गया था,उनकी अधिकतम सजा की अवधि वह पहले ही जेल में काट चुके हैं और इसलिए उन्हें रिहा किया जाना चाहिए।

मिशेल की इस दलील का केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई),प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्र सरकार ने जोरदार विरोध किया। एजेंसियों का कहना था कि मामले में लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं और जाँच के दौरान नए आरोप भी जोड़े गए हैं,जिनकी सजा अधिक कठोर हो सकती है। अदालत ने इन दलीलों को ध्यान में रखते हुए मिशेल की याचिका को खारिज कर दिया।

इस मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो क्रिश्चियन मिशेल को दिसंबर 2018 में संयुक्त अरब अमीरात से भारत लाया गया था। यह प्रत्यर्पण लंबे कानूनी और कूटनीतिक प्रयासों के बाद संभव हुआ था। वर्ष 2017 में दाखिल चार्जशीट में उनके खिलाफ धोखाधड़ी,आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत रिश्वत देने जैसे आरोप लगाए गए थे।

बाद में सितंबर 2020 में दाखिल सप्लीमेंट्री चार्जशीट में उनके खिलाफ जालसाजी का आरोप भी जोड़ा गया,जो इस मामले को और गंभीर बना देता है। जालसाजी के आरोप में अधिकतम सजा उम्रकैद तक हो सकती है और यही पहलू अदालत के फैसले में महत्वपूर्ण साबित हुआ। अदालत ने माना कि जब आरोपों में ऐसा अपराध शामिल है जिसकी सजा उम्रकैद तक हो सकती है,तो यह कहना उचित नहीं है कि आरोपी ने अपनी अधिकतम सजा पूरी कर ली है।

मिशेल ने अपनी याचिका में भारत-यूएई प्रत्यर्पण संधि के आर्टिकल 17 को भी चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि प्रत्यर्पण के समय जिन आरोपों का उल्लेख किया गया था,केवल उन्हीं के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। हालाँकि,केंद्र सरकार ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि इस संधि का आर्टिकल 17 भारत को उन अपराधों के साथ-साथ उनसे जुड़े अन्य अपराधों में भी मुकदमा चलाने की अनुमति देता है। इसी प्रावधान के तहत जालसाजी जैसे अतिरिक्त आरोप शामिल किए गए हैं।

सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि मिशेल के खिलाफ दर्ज मामलों की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए उन्हें राहत देना न्याय के हित में नहीं होगा। जाँच एजेंसियों ने भी अदालत को बताया कि मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और इसमें कई महत्वपूर्ण पहलुओं की जाँच जारी है।

मिशेल के वकील अल्जो के. जोसेफ ने अदालत में यह तर्क रखा था कि उनके मुवक्किल ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े आरोपों के तहत पाँच साल से अधिक समय जेल में बिताया है,जो अधिकतम सजा के बराबर है। उन्होंने कहा कि इस आधार पर उन्हें रिहाई मिलनी चाहिए। हालाँकि,अदालत ने इस तर्क को पर्याप्त नहीं माना,क्योंकि बाद में जोड़े गए आरोप मामले की गंभीरता को बढ़ाते हैं।

यह भी उल्लेखनीय है कि क्रिश्चियन मिशेल को सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट से अलग-अलग मामलों में जमानत मिल चुकी है,लेकिन इसके बावजूद वह अभी भी जेल में हैं। इसका कारण यह है कि उनके खिलाफ कई मामलों में अलग-अलग धाराएँ और आरोप लगे हुए हैं,जिनके चलते उनकी रिहाई संभव नहीं हो पा रही है।

इससे पहले मार्च में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था। वहीं अगस्त 2025 में ट्रायल कोर्ट ने भी मिशेल की रिहाई की माँग को खारिज कर दिया था। उस समय अदालत ने कहा था कि आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोप हैं,जिनमें उम्रकैद तक की सजा हो सकती है, इसलिए उन्हें रिहा नहीं किया जा सकता।

अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी चॉपर घोटाला भारत के चर्चित मामलों में से एक रहा है,जिसमें उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। इस मामले की जाँच कई वर्षों से जारी है और इसमें कई अंतर्राष्ट्रीय पहलू भी जुड़े हुए हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट के इस ताजा फैसले से यह साफ हो गया है कि अदालत इस मामले को गंभीरता से देख रही है और किसी भी प्रकार की राहत देने से पहले सभी कानूनी पहलुओं पर गहन विचार कर रही है। फिलहाल,क्रिश्चियन मिशेल को जेल में ही रहना होगा और आने वाले समय में इस मामले की सुनवाई और आगे बढ़ेगी।