वाशिंगटन,19 फरवरी (युआईटीवी)- अमेरिकी सरकार के कार्यदक्षता विभाग (डीओजीई) ने हाल ही में “भारत में मतदान” के लिए निर्धारित 21 मिलियन डॉलर की फंडिंग को रद्द करने का फैसला लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस फैसले का समर्थन किया और उन्होंने इसे पूरी तरह से सही ठहराया। डोनाल्ड ट्रंप ने फ्लोरिडा में अपने मार-ए-लागो निवास पर कहा कि भारत को ये 21 मिलियन डॉलर क्यों दिए गए,जबकि उसके पास पहले से ही बहुत अधिक पैसा है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत दुनिया के सबसे अधिक कर वसूल करने वाले देशों में से एक है और उसके पास वित्तीय संसाधनों की कोई कमी नहीं है। ट्रंप ने यह सवाल भी उठाया कि भारत को अपनी चुनावी प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए अमेरिकी मदद की आवश्यकता क्यों थी,जबकि भारत खुद एक प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक शक्ति बन चुका है।
यह विवाद तब शुरू हुआ,जब अमेरिकी कार्यदक्षता विभाग (डीओजीई) ने 16 फरवरी को घोषणा की कि वह 21 मिलियन डॉलर की निधि को रद्द कर रहा है,जो भारत में मतदान प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए निर्धारित की गई थी। इस फैसले को डीओजीई ने एक पोस्ट के जरिए एक्स पर साझा किया,जिसमें कहा गया कि कई विदेशी सहायता कार्यक्रमों को गैर-जरूरी और अत्यधिक खर्च वाला मानते हुए बंद किया जा रहा है। इस सूची में भारत का चुनावी सुधार कार्यक्रम सबसे ऊपर था। इसके अलावा,बांग्लादेश में राजनीतिक सुधारों के लिए 29 मिलियन डॉलर और नेपाल में राजकोषीय संघवाद व जैव विविधता संरक्षण के लिए 39 मिलियन डॉलर की फंडिंग भी रद्द कर दी गई थी।
अमेरिकी सरकार द्वारा भारत में मतदान प्रक्रिया के लिए निर्धारित निधि को रद्द किए जाने से भारत में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस फैसले की आलोचना की और इसे भारत की चुनावी प्रक्रिया में “विदेशी हस्तक्षेप” करार दिया। पार्टी के प्रवक्ता अमित मालवीय ने इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और सवाल किया कि आखिर इस धनराशि से किसे फायदा हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि इससे कोई शक नहीं कि सत्तारूढ़ भारतीय पार्टी को इसका कोई लाभ नहीं हुआ होगा। मालवीय ने इसे विदेशी संस्थाओं द्वारा भारतीय संस्थानों में “व्यवस्थित घुसपैठ” का हिस्सा बताया और कहा कि इससे भारत के लोकतंत्र पर खतरा बढ़ सकता है।
भाजपा ने इस फंडिंग को लेकर अमेरिकी अरबपति निवेशक जॉर्ज सोरोस की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि जॉर्ज सोरोस का प्रभाव पहले भी भारत की चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली विदेशी वित्तपोषित पहलों में देखा गया है। मालवीय ने 2012 में भारत के चुनाव आयोग और इंटरनेशनल फाउंडेशन फॉर इलेक्टोरल सिस्टम्स (आईएफईएस) के बीच हुए विवादास्पद समझौते का जिक्र किया,जो सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से जुड़ा हुआ था। इस समझौते के कारण विवाद खड़ा हो गया था क्योंकि भारतीय विरोधियों का मानना था कि यह विदेशी फंडिंग भारतीय चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से की जा रही थी।
ट्रंप का भारत के प्रति यह बयान और अमेरिकी कार्यदक्षता विभाग का कदम भारत और अमेरिका के संबंधों में एक नई राजनीतिक लहर पैदा कर रहा है। ट्रंप का मानना है कि भारत के पास अपनी चुनावी प्रक्रिया को सुधारने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं और उसे अमेरिकी मदद की आवश्यकता नहीं है। उनका यह भी कहना था कि अमेरिका को भारत के साथ व्यापार करने में समस्याएँ होती हैं,क्योंकि भारत के टैरिफ बहुत उच्च हैं। हालाँकि,उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के प्रति अपने सम्मान को भी व्यक्त किया,लेकिन यह सवाल जरूर उठाया कि भारत को चुनावी प्रक्रिया में सुधार के लिए अमेरिकी निधि की आवश्यकता क्यों पड़ी।
भारत में यह मुद्दा तब और गंभीर हो गया,जब कुछ राजनीतिक जानकारों और विशेषज्ञों ने इस फैसले को भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप के रूप में देखा। भारत के कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका इस कदम से भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दबाव डालने की कोशिश कर रहा है,जो स्वतंत्र और स्वायत्त रूप से चलने वाली है। इसके अलावा,भारतीय अधिकारियों का यह भी कहना है कि यदि अमेरिका भारत के चुनावी सुधारों में हस्तक्षेप करता है,तो यह अन्य देशों को भी प्रेरित करेगा कि वे भारत के आंतरिक मामलों में इसी तरह से दखल दें।
हालाँकि,अमेरिका द्वारा भारत की चुनावी प्रक्रिया में सुधार के लिए निर्धारित निधि को रद्द करने का यह फैसला कुछ लोगों के लिए आश्चर्यजनक है,लेकिन ट्रंप के प्रशासन की यह नीति स्पष्ट रूप से एक नई दिशा दिखाती है। यह कदम अमेरिका द्वारा अपनी अंतर्राष्ट्रीय रणनीति में स्पष्ट रूप से अधिक संकोच और कड़े नियंत्रण को दर्शाता है। भारत के राजनीतिक हलकों में इस फैसले पर बहस और चर्चा अब और भी तेज हो गई है और इसे एक सशक्त लोकतंत्र के तौर पर भारत की स्थायित्व और स्वायत्तता पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर माना जा सकता है।
इस मामले का आगे क्या परिणाम होगा,यह तो समय ही बताएगा,लेकिन यह स्पष्ट है कि इस फैसले ने भारत और अमेरिका के संबंधों में एक नया मोड़ ला दिया है।
