अनूप जलोटा और एआर रहमान (तस्वीर क्रेडिट@SAMTHEBESTEST_)

एआर रहमान के ‘कम्युनल’ बयान पर विवाद तेज,अनूप जलोटा की वापस हिंदू बन जाएँ एआर रहमान की सलाह ने बढ़ाई बहस

मुंबई,21 जनवरी (युआईटीवी)- बॉलीवुड और म्यूजिक इंडस्ट्री में एक बार फिर बयानबाज़ी ने माहौल गरमा दिया है। ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान के हालिया इंटरव्यू में दिए गए एक बयान ने न सिर्फ सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया पैदा की है,बल्कि फिल्म और म्यूजिक जगत में भी गहरी बहस छेड़ दी है। रहमान ने कहा था कि पिछले आठ वर्षों में इंडस्ट्री में उनके काम में कमी आई है और इसके पीछे उन्होंने “पावर शिफ्ट” के साथ-साथ एक संभावित “कम्युनल थिंग” की ओर भी इशारा किया। उनके इस बयान के बाद जहाँ कुछ लोग उनके अनुभव को गंभीरता से लेने की बात कर रहे हैं,वहीं कई लोग इसे अनावश्यक और भ्रामक करार दे रहे हैं।

एआर रहमान ने इंटरव्यू में यह भी कहा कि इंडस्ट्री में अब रचनात्मक लोगों के बजाय गैर-रचनात्मक लोग फैसले ले रहे हैं,जिससे संगीत की गुणवत्ता और कलाकारों के अवसरों पर असर पड़ा है। उन्होंने सीधे तौर पर किसी का नाम नहीं लिया,लेकिन उनके शब्दों से यह संकेत मिला कि माहौल में आए बदलाव का संबंध सांप्रदायिक सोच से भी हो सकता है। यही संकेत विवाद की मुख्य वजह बन गया और देखते ही देखते सोशल मीडिया पर रहमान के बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आने लगीं।

इस पूरे विवाद के बीच मशहूर भजन गायक और पद्मश्री सम्मानित अनूप जलोटा का बयान सामने आया,जिसने बहस को और भड़का दिया। अनूप जलोटा ने एआर रहमान को एक ऐसी सलाह दी,जिसे कई लोगों ने “चौंकाने वाली” और “उकसाने वाली” बताया। जलोटा ने रहमान के धार्मिक बैकग्राउंड का जिक्र करते हुए कहा कि एआर रहमान पहले हिंदू थे और बाद में उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाया। इसके बावजूद उन्होंने लंबे समय तक फिल्म इंडस्ट्री में काम किया,अपार सफलता हासिल की और लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई।

अनूप जलोटा ने अपने बयान में कहा कि अगर रहमान को यह विश्वास है कि मुसलमान होने की वजह से उन्हें फिल्मों में संगीत देने का काम नहीं मिल रहा,तो उन्हें फिर से हिंदू धर्म अपनाने के बारे में सोचना चाहिए। जलोटा के शब्दों में, “अगर उन्हें इस बात का विश्वास है कि हमारे देश में मुसलमान होने की वजह से उनको फिल्में नहीं मिल रही हैं,म्यूजिक देने के लिए,तो वो फिर से हिंदू हो जाएँ। फिर उन्हें यह देखना चाहिए कि क्या हिंदू होने से उन्हें दोबारा फिल्में मिलनी शुरू हो जाती हैं या नहीं।” उन्होंने आगे कहा कि यही रहमान के बयान का “सार” है और इसलिए उनका सुझाव है कि वे ऐसा करके खुद अनुभव करें।

जलोटा के इस बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया पर एक नया विवाद खड़ा हो गया। कई लोगों ने इसे निजी आस्था और धर्म को लेकर की गई अनुचित टिप्पणी बताया,जबकि कुछ यूज़र्स ने इसे रहमान के बयान पर एक व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया के तौर पर देखा। म्यूजिक इंडस्ट्री से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि इस तरह के बयानों से असल मुद्दे से ध्यान हट जाता है,जो कि रचनात्मक स्वतंत्रता और इंडस्ट्री में बदलते पावर स्ट्रक्चर से जुड़ा है।

वहीं,एआर रहमान के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने किसी समुदाय या धर्म को निशाना नहीं बनाया,बल्कि अपने अनुभव साझा किए। उनका तर्क है कि रहमान ने “कम्युनल” शब्द का इस्तेमाल एक व्यापक संदर्भ में किया था,जिसे गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। समर्थकों का यह भी कहना है कि रहमान का करियर अपने आप में इस बात का सबूत है कि प्रतिभा किसी धर्म की मोहताज नहीं होती।

दूसरी ओर,आलोचकों का मानना है कि इतने बड़े कलाकार को सार्वजनिक मंच पर बोलते समय ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए थी। उनका कहना है कि ऐसे बयान समाज में अनावश्यक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हैं और कला जैसे क्षेत्र को भी राजनीतिक या धार्मिक बहस में खींच लाते हैं। कुछ फिल्मी हस्तियों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि इंडस्ट्री में काम मिलना कई कारणों पर निर्भर करता है,जिनमें बाजार की माँग,प्रोजेक्ट्स की प्रकृति और नए टैलेंट की एंट्री जैसे फैक्टर शामिल हैं।

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है,जब बॉलीवुड और म्यूजिक इंडस्ट्री पहले ही कंटेंट,ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते प्रभाव और बदलते दर्शक स्वाद जैसे मुद्दों से जूझ रही है। ऐसे में धर्म और सांप्रदायिकता से जुड़े बयान स्थिति को और जटिल बना देते हैं। अनूप जलोटा की सलाह ने जहां कुछ लोगों को हैरान किया है,वहीं इसने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या किसी कलाकार के पेशेवर अवसरों को उसके धर्म से जोड़कर देखना सही है।

फिलहाल,एआर रहमान की ओर से अनूप जलोटा के बयान पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं आई है,लेकिन इतना साफ है कि यह विवाद अभी थमता नजर नहीं आ रहा। एक ओर रहमान के अनुभव और उनकी बातों की व्याख्या को लेकर बहस जारी है, तो दूसरी ओर जलोटा की टिप्पणी ने कला,धर्म और अभिव्यक्ति की सीमाओं पर एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर इंडस्ट्री के अन्य बड़े नाम क्या रुख अपनाते हैं और क्या यह बहस किसी सार्थक संवाद की ओर बढ़ पाती है या सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित रह जाती है।