वाशिंगटन,5 जनवरी (युआईटीवी)- वेनेज़ुएला की सियासत इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है,जहाँ सवाल अधिक हैं और उत्तर कम। राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक पहचान भले सामने से हट गई हो,लेकिन इस कदम ने सत्ता के भविष्य को लेकर एक जटिल और अनिश्चित बहस को जन्म दे दिया है। अमेरिकी अधिकारियों तक का कहना है कि आगे की राजनीतिक दिशा को लेकर फिलहाल स्पष्टता नहीं है। यह स्थिति न केवल वेनेज़ुएला के भीतर अस्थिरता का जोखिम बढ़ाती है,बल्कि क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी नई चुनौतियाँ खड़ी करती है।
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हालिया बयानों में साफ कर दिया कि वाशिंगटन मादुरो या उनके किसी नामित उत्तराधिकारी को वैध शासनकर्ता के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। फिर भी उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जमीन पर जो शक्ति-संरचना मौजूद है,उसे नज़रअंदाज़ करना असंभव है। एनबीसी के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ पर दिए इंटरव्यू में रुबियो का कथन—“हमें उन लोगों से निपटना होगा,जिनके पास बंदूकें हैं”—इस वास्तविकता की ओर सीधे संकेत करता है। उनका इशारा वेनेज़ुएला की सुरक्षा एजेंसियों और राज्यीय ढाँचे की ओर था,जो मादुरो की गिरफ्तारी के बावजूद सक्रिय और प्रभावशाली बने हुए हैं।
मादुरो की हिरासत के बाद अंतरिम नेतृत्व की बागडोर उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने सँभाली है। रुबियो ने एबीसी न्यूज और सीबीएस न्यूज़ के साथ बातचीत में पुष्टि की कि उनकी रोड्रिग्ज से चर्चा हुई,हालाँकि उन्होंने यह बताने से परहेज़ किया कि दोनों के बीच किन मुद्दों पर सहमति बनी। उनके मुताबिक,असली कसौटी यह होगी कि रोड्रिग्ज और उनका प्रशासन आने वाले दिनों में कौन-से ठोस कदम उठाते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी से बातचीत करने का अर्थ यह नहीं कि अमेरिका उसे वैध नेतृत्व मान ले—यह एक व्यवहारिक प्रक्रिया है,जिसमें प्राथमिकता स्थिरता और संक्रमणकालीन प्रबंधन को दी जा रही है।
डेल्सी रोड्रिग्ज की भूमिका पर कई विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। उन पर पहले से ही अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रतिबंध लागू हैं और वे वर्षों से मादुरो सरकार का प्रमुख चेहरा रही हैं। ऐसे में आलोचकों का तर्क है कि सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया यदि उन्हीं हाथों में रहेगी,तो लोकतांत्रिक सुधारों की उम्मीद कैसे की जा सकती है। इस संदर्भ में न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार डेविड सेंगर ने सीएनएन पर कहा कि मौजूदा अमेरिकी नीति पहले की अपेक्षा अधिक “व्यावहारिक” हो गई है—जहाँ लोकतांत्रिक आदर्शों से ज्यादा प्राथमिकता उन लोगों के साथ काम करने को दी जा रही है,जो तुरंत सहयोग कर सकें और स्थिति को नियंत्रण में रख सकें।
इधर विपक्षी खेमे में भी भ्रम की स्थिति है। 2024 के विवादास्पद चुनाव के बाद विपक्षी नेताओं—मारिया कोरीना मचाडो और एडमोंडो गोंजालेज ने जीत का दावा किया था,लेकिन वर्तमान संक्रमणकालीन परिदृश्य में वे लगभग हाशिये पर दिख रहे हैं। रुबियो ने विपक्ष के प्रति सम्मान जताते हुए भी स्पष्ट किया कि लंबे समय से चले आ रहे तानाशाही शासन के बाद तत्काल चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं होगा। एबीसी न्यूज से बातचीत में उनका बयान—“हर कोई कल चुनाव चाहता है। यह बेतुका है”—इस बात का संकेत है कि अमेरिका धीरे-धीरे,चरणबद्ध प्रक्रिया के पक्ष में है,न कि त्वरित परिवर्तन के।
सैन्य पहलू इस पूरे समीकरण का सबसे संवेदनशील और निर्णायक हिस्सा है। विश्लेषकों का मानना है कि वेनेज़ुएला के सशस्त्र बल अभी भी संगठित,सशक्त और प्रभावी हैं। पूर्व अमेरिकी दक्षिणी कमान प्रमुख एडमिरल जेम्स स्टावरिडिस ने चेतावनी दी कि अमेरिका के सामने दो ही रास्ते हैं या तो मौजूदा ढाँचे के साथ काम करके नियंत्रित परिवर्तन की कोशिश की जाए या फिर अराजकता के जोखिम को स्वीकार किया जाए। उनका कहना है कि यदि सैन्य नेतृत्व को प्रक्रिया से बाहर रखा गया,तो सत्ता शून्य पैदा हो सकता है,जो हिंसा,अस्थिरता और मानवीय संकट को जन्म दे सकता है।
अमेरिका फिलहाल दबाव और बातचीत—दोनों रणनीतियाँ साथ-साथ अपनाता दिख रहा है। तेल से जुड़े प्रतिबंधों को एक प्रभावी हथियार के रूप में बनाए रखते हुए समुद्री निगरानी भी बढ़ाई जा रही है। उद्देश्य यह देखना है कि अंतरिम नेतृत्व किस दिशा में कदम बढ़ाता है—क्या वह सत्ता में टिके रहने के लिए कठोरता अपनाता है या देश को किसी तरह के समावेशी राजनीतिक समाधान की ओर ले जाता है। दूसरी ओर,वाशिंगटन इस बात से भी वाकिफ है कि अत्यधिक आर्थिक दबाव से आम नागरिकों की समस्याएँ बढ़ सकती हैं,जो पहले से ही महँगाई,बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं।
मादुरो की गिरफ्तारी के बाद वेनेज़ुएला के नागरिकों के बीच भी मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं। एक वर्ग इसे नई शुरुआत के अवसर के तौर पर देख रहा है, जबकि दूसरा वर्ग संदेह से भरा हुआ है कि कहीं यह सिर्फ चेहरा बदलने भर तक सीमित न रह जाए। वर्षों से चली आ रही आर्थिक गिरावट,अंतर्राष्ट्रीय अलगाव और राजनीतिक दमन ने लोगों के भरोसे को गहरा आघात पहुँचाया है। ऐसे में केवल नेतृत्व परिवर्तन से हालात सुधरेंगे,यह मान लेना जल्दबाज़ी होगी।
प्रशासनिक स्तर पर भी कई सवाल सामने हैं—क्या अंतरिम नेतृत्व स्वतंत्र और पारदर्शी संस्थागत सुधारों के लिए तैयार है? क्या न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग जैसे संवैधानिक निकायों को वास्तविक स्वायत्तता मिल पाएगी? और सबसे अहम, क्या विपक्ष को राजनीतिक प्रक्रिया में बराबरी का अवसर दिया जाएगा? इन सभी प्रश्नों के उत्तर अभी अनिश्चित हैं और यही अनिश्चितता वेनेज़ुएला के भविष्य को लेकर चिंताओं को और गहरा करती है।
इस बीच,अंतर्राष्ट्रीय समुदाय बारीकी से घटनाक्रम पर नज़र रखे हुए है। कई लैटिन अमेरिकी देशों के लिए वेनेज़ुएला की स्थिरता क्षेत्रीय शांति से सीधे जुड़ी है। प्रवासन संकट,सीमा पार अपराध और ऊर्जा आपूर्ति जैसे मुद्दे तुरंत प्रभावित हो सकते हैं। यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र जैसे प्लेटफॉर्म भी संवाद और मानवाधिकारों की सुरक्षा पर जोर दे रहे हैं,लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि निर्णायक कदम अंततः कराकस के भीतर ही उठाए जाने होंगे।
फिलहाल निकोलस मादुरो अमेरिका की हिरासत में हैं और उन पर मुकदमा चल रहा है,लेकिन यह तथ्य विशेषज्ञों को आश्वस्त नहीं करता,क्योंकि शासन से जुड़ा मूल प्रश्न—देश को आगे कौन और कैसे चलाएगा—अब भी अनुत्तरित है। यदि संक्रमणकालीन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही,तो सत्ता संघर्ष फिर से हिंसक रूप ले सकता है। वहीं, यदि सैन्य और नागरिक नेतृत्व के बीच संतुलन साधते हुए धीरे-धीरे सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाया गया,तो यह वेनेज़ुएला के लिए एक शांतिपूर्ण राजनीतिक पुनर्निर्माण का अवसर भी बन सकता है।
आखिरकार,यह दौर वेनेज़ुएला के लिए एक निर्णायक परीक्षा जैसा है। एक ओर दशकों पुराने सत्तावादी ढाँचे के टूटने की संभावना है,तो दूसरी ओर अस्थिरता का खतरा भी मंडरा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों का सामान्य निष्कर्ष यही है—एक नेता की गिरफ्तारी से समस्या का समाधान नहीं हो जाता। वास्तविक चुनौती सत्ता के शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक हस्तांतरण को सुनिश्चित करने में है। आने वाले सप्ताह और महीने तय करेंगे कि यह देश अराजकता के रास्ते पर बढ़ता है या फिर कठिन,लेकिन उम्मीद-भरी राजनीतिक पुनर्बहाली की ओर कदम बढ़ाता है।
