नई दिल्ली,11 अगस्त (युआईटीवी)- ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने ऐलान किया है कि उनका देश आगामी सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान फिलिस्तीनी राज्य को औपचारिक मान्यता देगा। यह घोषणा ऐसे समय में आई है,जब मात्र दो हफ्ते पहले ही उन्होंने संकेत दिया था कि निकट भविष्य में ऑस्ट्रेलिया इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाएगा। अल्बानीज के इस बदले हुए रुख ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर चर्चा तेज कर दी है,क्योंकि यह फैसला मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी संघर्ष और कूटनीतिक गतिरोध के बीच लिया गया है।
कैबिनेट बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में प्रधानमंत्री अल्बानीज ने कहा कि यह निर्णय फिलिस्तीनी प्राधिकरण (पीए) की हालिया प्रतिबद्धताओं पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऑस्ट्रेलिया फिलिस्तीनी लोगों के स्व-निर्णय और स्वतंत्र राज्य के अधिकार को स्वीकार करेगा और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर इस लक्ष्य को साकार करने की दिशा में काम करेगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह कदम एक व्यापक वैश्विक प्रयास का हिस्सा है,जिसका उद्देश्य मध्य पूर्व में स्थायी शांति की नींव रखना है।
अल्बानीज ने जोर देकर कहा कि हमास को किसी भी भावी फिलिस्तीनी राज्य में स्थान नहीं मिलेगा। उनके अनुसार,फिलिस्तीनी प्राधिकरण ने कई महत्वपूर्ण वादे किए हैं,जिनमें हमास को सरकार से बाहर रखना,गाजा का विसैन्यीकरण करना और 2006 के बाद से लंबित राष्ट्रीय चुनावों का आयोजन शामिल है। इसके साथ ही,पीए ने इजरायल के अस्तित्व और शांति के अधिकार को मान्यता देने,उकसावे और भड़काऊ बयानबाजी पर रोक लगाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय निगरानी तंत्र को स्वीकार करने और आतंकवादी हमलों में शामिल लोगों के परिवारों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता (जिसे आलोचक “पे फॉर स्ले” यानी हत्या के लिए भुगतान कहते हैं) को समाप्त करने का आश्वासन दिया है।
प्रधानमंत्री ने गाजा की मौजूदा स्थिति को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि गाजा इस समय दुनिया की सबसे भीषण मानवीय परिस्थितियों से भी बदतर दौर से गुजर रहा है। उन्होंने इजरायल पर आरोप लगाया कि वहाँ की सेना गाजा में मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रही है और अंतर्राष्ट्रीय कानून की अनदेखी कर रही है। उनके अनुसार,हिंसा के चक्र को तोड़ना,संघर्ष,पीड़ा और भुखमरी को समाप्त करना ही एकमात्र रास्ता है,जिससे क्षेत्र में स्थायी शांति लाई जा सकती है।
अल्बानीज ने खुलासा किया कि उन्होंने इस मुद्दे पर पिछले दो हफ्तों में कई अंतर्राष्ट्रीय नेताओं से चर्चा की है। इसमें ब्रिटेन,फ्रांस,न्यूजीलैंड और जापान के नेताओं के अलावा इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और फिलिस्तीनी प्राधिकरण के अध्यक्ष महमूद अब्बास भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि नेतन्याहू के साथ उनकी चर्चा लंबी और सभ्य रही,लेकिन उनका मानना है कि इजरायली प्रधानमंत्री के तर्क पुराने और बदलते हालात से मेल नहीं खाते।
इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू पहले ही यूरोपीय देशों की इस पहल की कड़ी आलोचना कर चुके हैं। रविवार को दिए एक बयान में उन्होंने फिलिस्तीन की मान्यता की कोशिश को “बेतुका और शर्मनाक” बताया था। नेतन्याहू का कहना है कि ऐसे कदम आतंकवाद को बढ़ावा देंगे और इजरायल की सुरक्षा को खतरे में डालेंगे। इसके विपरीत,अल्बानीज सरकार का तर्क है कि फिलिस्तीनी प्राधिकरण द्वारा किए गए सुधार और प्रतिबद्धताएँ एक शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने इजरायल की हाल ही में गाजा पर नए सैन्य हमले की योजनाओं की भी निंदा की है। उनका कहना है कि इस तरह की सैन्य कार्रवाई से न केवल मानवीय संकट गहराएगा,बल्कि क्षेत्र में शांति की संभावनाएँ और भी कम हो जाएँगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को मिलकर ऐसा ढाँचा तैयार करना चाहिए,जिसमें दोनों पक्षों की सुरक्षा सुनिश्चित हो और आर्थिक व सामाजिक विकास का रास्ता खुले।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया का यह फैसला केवल कूटनीतिक समर्थन से आगे बढ़कर एक राजनीतिक संदेश भी है। इससे यह संकेत मिलता है कि पश्चिमी देशों के भीतर भी इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दे पर दृष्टिकोण में बदलाव आ रहा है। ब्रिटेन,फ्रांस और कनाडा पहले ही फिलिस्तीन के समर्थन में अपनी राय दे चुके हैं और अब ऑस्ट्रेलिया का इस सूची में जुड़ना एक महत्वपूर्ण विकास है।
इस निर्णय के पीछे ऑस्ट्रेलियाई विदेश नीति की एक नई दिशा भी देखी जा रही है,जिसमें मानवीय मुद्दों और अंतर्राष्ट्रीय कानून को प्राथमिकता दी जा रही है। अल्बानीज सरकार का यह कदम घरेलू राजनीति में भी चर्चा का विषय बन सकता है,क्योंकि ऑस्ट्रेलिया में इजरायल समर्थक और फिलिस्तीन समर्थक दोनों ही बड़े समुदाय मौजूद हैं।
फिलहाल,अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की निगाहें सितंबर में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा पर टिकी होंगी,जहाँ ऑस्ट्रेलिया औपचारिक रूप से फिलिस्तीन की मान्यता की घोषणा करेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि इस घोषणा के बाद मध्य पूर्व की जटिल राजनीति और कूटनीतिक समीकरण किस दिशा में बदलते हैं। एक ओर यह निर्णय शांति प्रक्रिया को गति दे सकता है,तो दूसरी ओर यह इजरायल के साथ ऑस्ट्रेलिया के संबंधों में नई चुनौतियाँ भी खड़ी कर सकता है।
अल्बानीज का मानना है कि साहसिक और स्पष्ट कूटनीतिक कदम ही वह रास्ता है,जिससे हिंसा और अविश्वास की दीवारें तोड़ी जा सकती हैं। उनके अनुसार,यदि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय एकजुट होकर काम करे,तो फिलिस्तीनी और इजरायली जनता के लिए एक सुरक्षित,सम्मानजनक और स्थायी भविष्य सुनिश्चित किया जा सकता है।
