नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी (तस्वीर क्रेडिट@CommonBS786OM)

बालेंद्र शाह के शपथ लेते ही बड़ा एक्शन,पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली गिरफ्तार

काठमांडू,28 मार्च (युआईटीवी)- नेपाल की राजनीति में एक बड़ा और अभूतपूर्व घटनाक्रम सामने आया है,जहाँ नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के शपथ ग्रहण के कुछ ही घंटों के भीतर पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को गिरफ्तार कर लिया गया। यह गिरफ्तारी पिछले साल हुए जेन-जी आंदोलन के दौरान हिंसा और उससे जुड़े मामलों में की गई है। इस कार्रवाई के साथ ही नेपाल में राजनीतिक और कानूनी हलकों में हलचल तेज हो गई है।

नेपाल पुलिस ने केपी शर्मा ओली के साथ-साथ पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को भी हिरासत में लिया है। दोनों नेताओं पर आरोप है कि उन्होंने सितंबर 2025 में हुए जेन-जी आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के मामलों में कथित रूप से भूमिका निभाई थी। इस आंदोलन के दौरान व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे,जो बाद में हिंसक हो गए और कई लोगों की जान चली गई।

गिरफ्तारी के बाद वर्तमान गृह मंत्री सुदान गुरुंग ने सोशल मीडिया के जरिए इसकी पुष्टि की। उन्होंने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा, “वादा तो वादा है: कोई भी कानून से ऊपर नहीं है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई किसी के खिलाफ बदले की भावना से नहीं,बल्कि न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई है। उनके इस बयान ने साफ संकेत दिया कि नई सरकार कानून के शासन को सख्ती से लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है।

जानकारी के अनुसार,नेपाली मीडिया द हिमालयन टाइम्स ने रिपोर्ट किया कि केपी शर्मा ओली को शनिवार सुबह उनके गुंडू स्थित आवास से गिरफ्तार किया गया। बताया जा रहा है कि पुलिस टीम पिछले कई घंटों से उनके घर के आसपास मौजूद थी और रात से ही गिरफ्तारी की तैयारी कर रही थी। वहीं,पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को भक्तपुर के कुटुंजे इलाके में उनके घर से हिरासत में लिया गया।

जेन-जी आंदोलन,जो 8 और 9 सितंबर 2025 को शुरू हुआ था,नेपाल में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ युवाओं का एक बड़ा विरोध प्रदर्शन था। शुरुआत में शांतिपूर्ण रहे इस आंदोलन ने जल्द ही हिंसक रूप ले लिया। 8 सितंबर को हुई झड़पों में 19 लोगों की मौत हो गई थी,जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इसी घटना को लेकर जाँच आयोग का गठन किया गया था,जिसकी रिपोर्ट हाल ही में सार्वजनिक हुई।

जाँच आयोग की इस रिपोर्ट के आधार पर ही यह कार्रवाई की गई है। रिपोर्ट में पूर्व प्रधानमंत्री ओली,तत्कालीन गृह मंत्री रमेश लेखक और अन्य अधिकारियों पर क्रिमिनल कोड 2017 की धारा 182 के उल्लंघन का संदेह जताया गया है। इसके तहत उन पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं,जिनकी जाँच के लिए उन्हें हिरासत में लिया गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार,नेपाल के इतिहास में यह पहली बार है जब किसी पूर्व प्रधानमंत्री को हत्या के शक या आपराधिक आरोपों के तहत हिरासत में लिया गया है। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ शिकायतें तो दर्ज होती रही हैं,लेकिन उन्हें इस तरह सीधे पुलिस हिरासत में नहीं लिया गया था। इस कदम को नेपाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

नई सरकार के गठन के तुरंत बाद इस तरह की कार्रवाई यह दर्शाती है कि प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह अपनी सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर स्पष्ट हैं। शपथ लेने के कुछ ही घंटों के भीतर कैबिनेट की बैठक बुलाई गई,जिसमें गौरी बहादुर कार्की के नेतृत्व वाले जाँच आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का निर्णय लिया गया। इस बैठक में यह तय किया गया कि रिपोर्ट के आधार पर जरूरी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

गृह मंत्री सुदान गुरुंग ने कैबिनेट के फैसले से पहले ही पुलिस को 8 सितंबर की घटना की जाँच तेज करने के निर्देश दे दिए थे। इसके बाद कानून मंत्रालय के सचिव परश्वोर धुंगाना ने पूरी रात इस रिपोर्ट को लागू करने और कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए दस्तावेज तैयार किए।

इस पूरे घटनाक्रम ने नेपाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर जहाँ सरकार इसे कानून के शासन की दिशा में उठाया गया जरूरी कदम बता रही है,वहीं विपक्षी दल इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दे सकते हैं। हालाँकि,गृह मंत्री ने साफ तौर पर कहा है कि यह कार्रवाई किसी भी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं,बल्कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए की गई है।

नेपाल में हाल के वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता और जन असंतोष बढ़ा है। जेन-जी आंदोलन उसी असंतोष का एक बड़ा उदाहरण था,जिसमें युवाओं ने भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ आवाज उठाई थी। अब उस आंदोलन से जुड़े मामलों में इतनी बड़ी कार्रवाई होना यह संकेत देता है कि सरकार इन मुद्दों को गंभीरता से ले रही है।

बालेंद्र शाह के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही नेपाल की राजनीति में एक नई दिशा और सख्ती देखने को मिल रही है। पूर्व प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नई सरकार कानून के मामलों में कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले की जाँच किस दिशा में आगे बढ़ती है और इसका नेपाल की राजनीति पर क्या असर पड़ता है।