नई दिल्ली, 31 मार्च (युआईटीवी)- भारतीय नौसेना लगातार आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़े कदम उठाते हुए अपनी समुद्री ताकत को मजबूत कर रही है। इसी क्रम में 30 मार्च का दिन भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक बन गया,जब एक ही दिन में नौसेना को तीन स्वदेशी जहाज सौंपे गए। यह उपलब्धि गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने हासिल की,जिसने देश की रक्षा निर्माण क्षमता को एक नई ऊँचाई पर पहुँचा दिया है। इन तीन जहाजों में एक गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट,एक एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्राफ्ट और एक सर्वे वेसल शामिल हैं,जो भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता को कई गुना बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएँगे।
इनमें सबसे प्रमुख नीलगिरी क्लास का एडवांस्ड गाइडेड स्टेल्थ फ्रिगेट ‘तारागिरी’ है,जिसे 3 अप्रैल को विशाखापत्तनम में औपचारिक रूप से नौसेना में शामिल किया जाएगा। इस अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इसे राष्ट्र को समर्पित करेंगे। यह युद्धपोत भारतीय नौसेना की आधुनिक क्षमताओं का प्रतीक है और इसे उन्नत तकनीकों के साथ तैयार किया गया है।
तारागिरी के अलावा,जीआरएसई ने प्रोजेक्ट 17ए के तहत पाँचवां गाइडेड स्टेल्थ फ्रिगेट ‘दूनागिरी’ भी नौसेना को सौंप दिया है। यह जहाज भारतीय नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है,क्योंकि यह आधुनिक तकनीक और तेज निर्माण प्रक्रिया का उत्कृष्ट उदाहरण है। ‘दूनागिरी’ अपने पूर्ववर्ती आईएनएस दुनागिरी का उन्नत संस्करण है,जो 1977 से 2010 तक नौसेना का हिस्सा रहा था। नए संस्करण में अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों और बेहतर डिजाइन का समावेश किया गया है।
प्रोजेक्ट 17ए के तहत कुल सात नीलगिरी क्लास फ्रिगेट तैयार किए जा रहे हैं। इनमें से पहला आईएनएस नीलगिरी जनवरी 2025 में नौसेना में शामिल हो चुका है,जबकि हिमगिरी और उदयगिरी भी सेवा में आ चुके हैं। अब तारागिरी और दूनागिरी के साथ यह श्रृंखला और मजबूत हो गई है। इन फ्रिगेट्स की खास बात यह है कि इनमें लगभग 75 प्रतिशत उपकरण स्वदेशी हैं,जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को मजबूती प्रदान करते हैं।
इन फ्रिगेट्स में ब्रह्मोस मिसाइल जैसी अत्याधुनिक हथियार प्रणाली लगी है,जो एंटी-शिप और एंटी-सर्फेस युद्ध में बेहद प्रभावी मानी जाती है। इसके अलावा इनमें ‘बराक-8’ लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल,आधुनिक एयर डिफेंस गन,स्वदेशी टॉरपीडो ‘वरुणास्त्र’, एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर, मल्टी-फंक्शन रडार और अत्याधुनिक सोनार सिस्टम लगाए गए हैं। इन सभी प्रणालियों के कारण ये युद्धपोत दुश्मन के हमलों का समय रहते पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने में सक्षम हैं।
तारागिरी और दूनागिरी जैसे फ्रिगेट्स लगभग 6700 टन वजनी हैं और 30 नॉटिकल मील प्रति घंटे की गति से चल सकते हैं। इनमें दो हेलिकॉप्टरों के लिए हैंगर भी मौजूद है,जिससे समुद्री निगरानी और युद्ध क्षमता और बढ़ जाती है। इनका डिजाइन भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा तैयार किया गया है,जो देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रमाण है।
इसी दिन नौसेना को एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट ‘अग्रे’ भी सौंपा गया। यह परियोजना विशेष रूप से दुश्मन की पनडुब्बियों से निपटने के लिए शुरू की गई थी। वर्ष 2019 में इस परियोजना के तहत 16 जहाजों के निर्माण का अनुबंध दिया गया था,जिनमें से 8 कोचिन शिपयार्ड और 8 जीआरएसई में बनाए जा रहे हैं। ‘अग्रे’ इस श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यह एंटी-सबमरीन क्राफ्ट अत्याधुनिक तकनीकों से लैस है,जिसमें एंटी-सबमरीन रॉकेट लॉन्चर,लाइटवेट टॉरपीडो, 30 मिमी नेवल गन, हल-माउंटेड सोनार और वैरिएबल डेप्थ सोनार शामिल हैं। इसकी गति लगभग 25 नॉटिकल मील प्रति घंटे है और यह करीब 3300 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकता है। यह जहाज तट से 100 से 150 नॉटिकल मील तक दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने में सक्षम है,जो समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
तीसरा जहाज ‘संशोधक’ एक अत्याधुनिक सर्वे वेसल है,जिसे समुद्र के भीतर की स्थिति को समझने और हाइड्रोग्राफिक सर्वे के लिए डिजाइन किया गया है। आधुनिक समय में समुद्री मानचित्रण और सुरक्षित नेविगेशन के लिए इस तरह के जहाजों की भूमिका बेहद अहम हो गई है। समुद्र की सतह भले ही शांत दिखाई दे,लेकिन उसके भीतर कई तरह के अदृश्य खतरे मौजूद होते हैं,जिनका पता केवल ऐसे उन्नत सर्वे जहाज ही लगा सकते हैं।
‘संशोधक’ इस श्रृंखला का चौथा और अंतिम जहाज है। इससे पहले आईएनएस संध्याक, आईएनएस निर्देशक और आईएनएस इक्षक को नौसेना में शामिल किया जा चुका है। यह जहाज समुद्र तल की स्कैनिंग करने,सुरक्षित नेविगेशन रूट तैयार करने और समुद्री चार्ट बनाने में सक्षम है। यह न केवल सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण है,बल्कि समुद्री व्यापार और नागरिक नौवहन के लिए भी अत्यंत उपयोगी है।
कोलकाता स्थित जीआरएसई में निर्मित इस जहाज में 80 प्रतिशत से अधिक सामग्री स्वदेशी है। इसकी लंबाई लगभग 110 मीटर और वजन करीब 3800 टन है। दो डीजल इंजनों से संचालित यह जहाज 25 दिनों से अधिक समय तक समुद्र में रह सकता है और 18 समुद्री मील प्रति घंटे की अधिकतम गति से चल सकता है। इसकी यह क्षमता इसे लंबे समय तक सर्वेक्षण मिशनों के लिए उपयुक्त बनाती है।
इन तीनों जहाजों का एक साथ नौसेना को सौंपा जाना भारत की रक्षा निर्माण क्षमता में आई तेजी और आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाए गए कदमों का स्पष्ट संकेत है। यह उपलब्धि न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण है,बल्कि रणनीतिक रूप से भी भारत की समुद्री शक्ति को मजबूत करती है।
भारतीय नौसेना आज जिस तेजी से आधुनिक हो रही है,उसमें स्वदेशी युद्धपोतों की भूमिका सबसे अहम है। इन जहाजों के शामिल होने से भारत न केवल अपनी समुद्री सीमाओं की बेहतर रक्षा कर पाएगा,बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति भी मजबूत करेगा। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में समुद्री सुरक्षा का महत्व लगातार बढ़ रहा है और ऐसे में इन अत्याधुनिक जहाजों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
30 मार्च का यह दिन भारतीय रक्षा इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया है। एक ही दिन में तीन अत्याधुनिक स्वदेशी जहाजों का नौसेना को मिलना इस बात का प्रमाण है कि भारत अब रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है और भविष्य में वैश्विक स्तर पर एक मजबूत समुद्री शक्ति के रूप में उभरने के लिए पूरी तरह तैयार है।
