वाशिंगटन,2 अप्रैल (युआईटीवी)- अमेरिका की राजनीति और संवैधानिक व्यवस्था के केंद्र में एक बार फिर बड़ा मुद्दा उभरकर सामने आया है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को उस याचिका पर सुनवाई हुई,जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत उन्होंने जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता को सीमित करने का निर्देश दिया है। इस सुनवाई के दौरान ट्रंप स्वयं अदालत में मौजूद रहे,जिससे इस मामले की संवेदनशीलता और राजनीतिक महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह मामला केवल अमेरिकी कानून तक सीमित नहीं है,बल्कि इसका असर दुनिया भर के प्रवासियों,खासकर भारतीय पेशेवरों पर पड़ सकता है। अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय एच-1बी वीजा पर काम कर रहे हैं और उनके परिवार वहीं बस चुके हैं। ऐसे में इस प्रस्तावित बदलाव ने उनके बीच अनिश्चितता और चिंता का माहौल पैदा कर दिया है।
दरअसल,ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी एजेंसियों को निर्देश दिया था कि वे उन बच्चों को नागरिकता न दें,जो अमेरिका में जन्मे हैं लेकिन जिनके माता-पिता न तो अमेरिकी नागरिक हैं और न ही ग्रीन कार्ड धारक। वर्तमान में लागू व्यवस्था के अनुसार,अमेरिका की धरती पर जन्म लेने वाले लगभग सभी बच्चों को स्वतः नागरिकता मिल जाती है,जिसे ‘बर्थराइट सिटिजनशिप’ कहा जाता है। यह प्रावधान अमेरिकी संविधान के 14वां संशोधन में निहित है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल जॉन सॉयर ने तर्क दिया कि 14वें संशोधन का नागरिकता प्रावधान कभी भी सार्वभौमिक रूप से लागू करने के लिए नहीं बनाया गया था। उनके अनुसार,यह संशोधन मुख्य रूप से अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद मुक्त दासों और उनके वंशजों को नागरिकता देने के उद्देश्य से लाया गया था,न कि अस्थायी वीजा धारकों या अवैध अप्रवासियों के बच्चों को नागरिकता देने के लिए।
सॉयर ने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि नागरिकता का आधार केवल जन्मस्थान नहीं,बल्कि अमेरिका के प्रति निष्ठा होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि अस्थायी वीजा पर रहने वाले लोगों के बच्चे इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते,क्योंकि उनके माता-पिता की अमेरिका के प्रति स्थायी निष्ठा नहीं होती। उनके मुताबिक,हर जन्म को स्वतः नागरिकता देना अमेरिकी नागरिकता के महत्व को कम करता है।
हालाँकि,इस तर्क पर अदालत के कई न्यायाधीशों ने सवाल उठाए। सैमुअल एलिटो ने पूछा कि क्या 1868 में बनाए गए संवैधानिक प्रावधानों को आधुनिक समय की जटिल परिस्थितियों,जैसे अवैध अप्रवासन,पर उसी तरह लागू किया जा सकता है। यह सवाल इस बात की ओर इशारा करता है कि अदालत इस मुद्दे को केवल कानूनी नहीं,बल्कि व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी देख रही है।
वहीं एलेना कागन ने सरकार के रुख को ‘संशोधनवादी’ करार देते हुए कहा कि एक सदी से अधिक समय से अदालतों और जनता ने जन्मजात नागरिकता को व्यापक रूप से स्वीकार किया है। उन्होंने 1898 के ऐतिहासिक मामले यूनाइटेड स्टेट्स बनाम वोंग किम आर्क का हवाला दिया,जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि अमेरिकी धरती पर जन्म लेने वाले व्यक्ति को नागरिकता प्राप्त होती है,चाहे उसके माता-पिता की स्थिति कुछ भी हो।
इसी तरह केतनजी ब्राउन जैक्सन ने भी सरकार के तर्कों पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या ‘निष्ठा’ की अवधारणा को नए तरीके से परिभाषित किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अस्थायी रूप से अमेरिका में रहने वाले लोग भी वहाँ के कानूनों और सुरक्षा व्यवस्था के अधीन होते हैं,इसलिए उन्हें पूरी तरह से अलग नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के दौरान कई न्यायाधीशों ने इस प्रस्तावित नीति के व्यावहारिक पहलुओं पर भी चिंता जताई। उन्होंने पूछा कि यदि यह नियम लागू होता है,तो जन्म के समय बच्चे की नागरिकता का निर्धारण कैसे किया जाएगा। क्या हर मामले में माता-पिता की आव्रजन स्थिति की जाँच करनी होगी? और यदि हाँ,तो इससे प्रशासनिक प्रक्रिया कितनी जटिल हो जाएगी?
सरकार की ओर से जवाब दिया गया कि यह प्रणाली वस्तुनिष्ठ आव्रजन आँकड़ों पर आधारित होगी,जिससे यह तय किया जा सकेगा कि कोई बच्चा नागरिकता का पात्र है या नहीं। हालाँकि,विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था को लागू करना बेहद जटिल और विवादास्पद हो सकता है।
ट्रंप प्रशासन के इस कदम का विरोध कर रहे वकीलों ने तर्क दिया कि यह स्थापित कानून और परंपरा को पलटने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि ‘वोंग किम आर्क’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से जन्मस्थान के आधार पर नागरिकता को मान्यता दी थी,जिसे अब बदलने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार,इस तरह का बदलाव न केवल कानूनी अनिश्चितता पैदा करेगा,बल्कि लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह नीति लागू होती है,तो इसका असर शिक्षा,रोजगार और सरकारी लाभों तक पहुँच पर पड़ सकता है। ऐसे बच्चे,जो अब तक स्वतः नागरिक माने जाते थे,उनकी स्थिति अनिश्चित हो जाएगी और उन्हें कई अधिकारों से वंचित होना पड़ सकता है।
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा प्रभाव भारतीय पेशेवरों पर पड़ने की संभावना है। अमेरिका में एच-1बी वीजा धारकों का सबसे बड़ा समूह भारतीयों का है,जो वहाँ वर्षों तक काम करते हैं और ग्रीन कार्ड का इंतजार करते हैं। इस दौरान उनके बच्चे अमेरिका में जन्म लेते हैं और मौजूदा कानून के तहत उन्हें नागरिकता मिल जाती है,लेकिन यदि यह नियम बदलता है,तो इन बच्चों की स्थिति भी प्रभावित हो सकती है।
यह मुद्दा केवल कानूनी नहीं,बल्कि मानवीय और सामाजिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है। कई परिवारों ने अमेरिका में अपने भविष्य की योजना इसी आधार पर बनाई है कि उनके बच्चों को नागरिकता मिलेगी। ऐसे में इस तरह के बदलाव से उनके जीवन में अस्थिरता आ सकती है।
इतिहास के संदर्भ में देखें तो 14वें संशोधन को 1868 में लागू किया गया था,जिसका उद्देश्य अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद अफ्रीकी-अमेरिकियों को नागरिकता देना था। इससे पहले ड्रेड स्कॉट फैसला में सुप्रीम कोर्ट ने अफ्रीकी मूल के लोगों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया था,जिसे इस संशोधन के जरिए पलटा गया। तब से लेकर अब तक यह संशोधन अमेरिकी नागरिकता का आधार बना हुआ है।
अब ट्रंप प्रशासन का तर्क इस ऐतिहासिक प्रावधान की नई व्याख्या करने की कोशिश करता है,जो एक बड़े संवैधानिक विवाद को जन्म दे सकता है। यह मामला इस बात को भी तय करेगा कि अमेरिकी संविधान की व्याख्या समय के साथ कैसे बदलती है और इसमें कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिका क्या होगी।
फिलहाल,सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर बहस जारी है और अंतिम फैसला आने में समय लग सकता है,लेकिन इतना तय है कि यह निर्णय न केवल अमेरिका की आव्रजन नीति को प्रभावित करेगा,बल्कि दुनिया भर के प्रवासियों,खासकर भारतीयों के जीवन पर भी गहरा असर डालेगा।
जन्मजात नागरिकता को लेकर छिड़ी यह कानूनी लड़ाई अमेरिकी लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों और संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा बन गई है। आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि अमेरिका अपने ऐतिहासिक मूल्यों को बनाए रखता है या बदलती परिस्थितियों के अनुसार उन्हें नए सिरे से परिभाषित करता है।
