तेहरान,13 अप्रैल (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने संयुक्त राज्य अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि उसने एक संभावित समझौते को अंतिम चरण में आकर पटरी से उतार दिया। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के अनुसार,दोनों देशों के बीच बातचीत लगभग सफल होने के करीब थी,लेकिन अमेरिका द्वारा लगातार शर्तें बदलने और दबाव की रणनीति अपनाने से पूरी प्रक्रिया विफल हो गई।
अराघची ने दावा किया कि प्रस्तावित “इस्लामाबाद समझौता” (एमओयू) लगभग तैयार था और दोनों पक्ष अंतिम सहमति के बेहद करीब पहुँच चुके थे। उनके मुताबिक,करीब 21 घंटे तक चली गहन और कठिन बातचीत के बाद भी कोई निष्कर्ष नहीं निकल सका,क्योंकि अमेरिका ने अंतिम समय में अपने रुख में बदलाव कर दिया। उन्होंने इसे एक बड़ा झटका बताते हुए कहा कि यदि बातचीत के दौरान शर्तों में इस तरह का बदलाव नहीं किया जाता,तो समझौता संभव हो सकता था।
ईरानी विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने बयान में कहा कि पिछले 47 वर्षों में यह अमेरिका के साथ सबसे उच्च स्तर की सीधी बातचीत थी,जिसमें तेहरान ने पूरी ईमानदारी और युद्ध को समाप्त करने की मंशा के साथ हिस्सा लिया था। उन्होंने निराशा जताते हुए कहा कि जब दोनों देश समझौते से “बस कुछ इंच दूर” थे,तभी अमेरिका ने “गोलपोस्ट बदलने” और नाकाबंदी जैसे कदमों का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि इस तरह की रणनीति से स्पष्ट होता है कि अमेरिका ने बातचीत से कोई सबक नहीं सीखा है।
अराघची ने अपने बयान में यह भी कहा कि “अच्छी नीयत से अच्छी नीयत पैदा होती है,जबकि दुश्मनी से केवल दुश्मनी ही जन्म लेती है।” उनका यह बयान दोनों देशों के बीच गहराते अविश्वास को दर्शाता है,जो पिछले कई दशकों से चला आ रहा है। हालाँकि,हालिया वार्ता से उम्मीद जगी थी कि शायद दोनों देश किसी साझा समाधान तक पहुँच सकते हैं,लेकिन अब स्थिति फिर से तनावपूर्ण हो गई है।
इस बीच,ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ कूटनीतिक सफलता की संभावना अभी भी खत्म नहीं हुई है,लेकिन इसके लिए वॉशिंगटन को अपने दृष्टिकोण में बदलाव करना होगा। उन्होंने अमेरिका से “सर्वाधिकारवाद” की नीति छोड़ने और ईरान के अधिकारों का सम्मान करने की अपील की। उनके अनुसार,यदि ऐसा होता है तो समझौते का रास्ता फिर से खुल सकता है।
राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने बातचीत में शामिल ईरानी प्रतिनिधिमंडल की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ देश के हितों की रक्षा की। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अमेरिका अपनी नीतियों में लचीलापन दिखाता है,तो भविष्य में फिर से वार्ता शुरू हो सकती है और किसी समाधान तक पहुँचा जा सकता है।
हालाँकि,इन बयानों के बीच अमेरिका की ओर से एक बड़ा कदम उठाया गया है,जिसने तनाव को और बढ़ा दिया है। अमेरिका ने घोषणा की है कि वह 13 अप्रैल से ईरानी बंदरगाहों में आने-जाने वाले जहाजों पर पूरी तरह से समुद्री नाकाबंदी लागू करेगा। इस फैसले को ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्री नाकाबंदी जैसे कदम न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी असर डाल सकते हैं। खासकर होर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर इसका प्रभाव वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापार पर पड़ सकता है। ऐसे में इस फैसले को केवल एक राजनीतिक कदम नहीं,बल्कि एक रणनीतिक और आर्थिक दबाव के रूप में भी देखा जा रहा है।
ईरान ने इस नाकाबंदी का कड़ा विरोध किया है और इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया है। तेहरान का कहना है कि इस तरह के कदम वार्ता प्रक्रिया को कमजोर करते हैं और क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ाते हैं। वहीं,अमेरिका का तर्क है कि यह कदम ईरान को उसकी नीतियों में बदलाव के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास अभी भी गहरा है और किसी स्थायी समाधान तक पहुँचने के लिए दोनों पक्षों को काफी प्रयास करने होंगे। हालाँकि,यह भी स्पष्ट है कि हालिया बातचीत ने एक संभावित समझौते की झलक जरूर दिखाई थी,जिससे उम्मीदें जगी थीं।
अब सवाल यह है कि क्या दोनों देश फिर से बातचीत की मेज पर लौटेंगे या यह तनाव और बढ़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास जारी रहते हैं और दोनों पक्ष कुछ समझौते की भावना दिखाते हैं,तो भविष्य में फिर से वार्ता संभव हो सकती है,लेकिन यदि मौजूदा स्थिति बनी रहती है,तो यह टकराव और गहरा सकता है।
“इस्लामाबाद समझौता” के अंतिम चरण में विफल होने से यह स्पष्ट हो गया है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में अंतिम क्षणों में भी समीकरण बदल सकते हैं। ईरान और अमेरिका के बीच यह टकराव केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है,बल्कि इसका असर वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों देश अपने मतभेदों को सुलझाने के लिए फिर से प्रयास करते हैं या यह तनाव किसी बड़े संकट का रूप ले लेता है।
