नई दिल्ली,7 अप्रैल (युआईटीवी)- केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश को लेकर 2018 में दिए गए ऐतिहासिक फैसले पर अब एक बार फिर बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन करते हुए स्पष्ट किया है कि यह मामला केवल लैंगिक समानता का नहीं,बल्कि धार्मिक आस्था,परंपरा और संवैधानिक सीमाओं का भी है। सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से पहले केंद्र द्वारा दाखिल विस्तृत हलफनामे ने इस बहस को और व्यापक बना दिया है।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से प्रस्तुत दलीलों में कहा गया है कि धार्मिक प्रथाओं को आधुनिकता,वैज्ञानिकता या तर्कसंगतता के पैमानों पर परखना न्यायिक अतिक्रमण होगा। सरकार का तर्क है कि ऐसा करने से अदालतें अपने दार्शनिक विचारों को धर्म के आंतरिक सिद्धांतों पर थोप देंगी,जो संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है। केंद्र ने यह भी कहा कि अदालतें यह तय करने की स्थिति में नहीं हैं कि कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत है या नहीं,क्योंकि यह संवैधानिक समीक्षा का हिस्सा नहीं होना चाहिए।
दरअसल,2018 में सुप्रीम कोर्ट की पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। अदालत ने इसे लैंगिक भेदभाव के रूप में देखा था और कहा था कि महिलाओं को पूजा-अर्चना के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इस फैसले के बाद देशभर में व्यापक बहस छिड़ गई थी और बड़ी संख्या में पुनर्विचार याचिकाएँ दायर की गई थीं।
केंद्र सरकार ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि धार्मिक प्रथाओं की व्याख्या और उनकी अनिवार्यता तय करने का अधिकार अदालतों के बजाय संबंधित धार्मिक संप्रदाय के पास होना चाहिए। सरकार का मानना है कि किसी प्रथा की ‘आवश्यकता’ या ‘अनिवार्यता’ का निर्धारण उस धर्म के अनुयायियों द्वारा उनकी परंपरा,शास्त्र और आस्था के आधार पर किया जाना चाहिए। अदालत केवल तभी हस्तक्षेप कर सकती है,जब कोई प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था,स्वास्थ्य,नैतिकता या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हो।
अपने हलफनामे में केंद्र ने ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ के सिद्धांत पर भी सवाल उठाए हैं। यह सिद्धांत लंबे समय से न्यायिक समीक्षा का हिस्सा रहा है,जिसके तहत अदालतें यह तय करती हैं कि कौन-सी धार्मिक प्रथा आवश्यक है और कौन-सी नहीं। केंद्र का कहना है कि इस प्रक्रिया में अदालतें धार्मिक मामलों में ‘थियोलॉजिकल आर्बिटर’ की भूमिका निभाने लगती हैं,जो संविधान द्वारा प्रदत्त सीमाओं से बाहर है।
सरकार ने सबरीमाला मंदिर में भगवान भगवान अयप्पा की पूजा के स्वरूप का भी उल्लेख किया है। हलफनामे में कहा गया है कि अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ के रूप में पूजा जाता है और महिलाओं के प्रवेश पर लगाया गया प्रतिबंध इसी धार्मिक मान्यता से जुड़ा है। केंद्र का तर्क है कि यह प्रतिबंध किसी प्रकार का भेदभाव नहीं,बल्कि एक स्थापित धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। अदालतें किसी देवता के स्वरूप या उसकी विशेषताओं की न्यायिक समीक्षा नहीं कर सकतीं।
केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि भारतीय कानून में देवता को ‘न्यायिक व्यक्तित्व’ के रूप में मान्यता प्राप्त है। ऐसे में किसी धार्मिक संप्रदाय द्वारा देवता के स्वरूप और उससे जुड़ी परंपराओं की जो व्याख्या की जाती है,उसे ही अंतिम माना जाना चाहिए। यदि अदालतें इन परंपराओं को ‘अनिवार्य’ और ‘गैर-अनिवार्य’ श्रेणियों में बाँटती हैं,तो यह श्रद्धालुओं की आस्था को चुनौती देने जैसा होगा।
अपने हलफनामे में केंद्र ने ‘संवैधानिक नैतिकता’ की अवधारणा पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। सरकार का कहना है कि यह एक न्यायिक रूप से विकसित अवधारणा है,जिसका संविधान में स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इसके आधार पर धार्मिक प्रथाओं को खारिज करना खतरनाक हो सकता है,क्योंकि इससे न्यायाधीशों की व्यक्तिगत सोच और दृष्टिकोण हावी हो सकते हैं। केंद्र ने कहा कि धार्मिक परंपराओं को समय के साथ बदलने का अधिकार समाज और संबंधित संप्रदाय के पास होना चाहिए,न कि अदालत के पास।
केंद्र सरकार ने अपने जवाब में जोसेफ शाइन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) मामले का भी उल्लेख किया है,जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। सरकार ने इस फैसले की समीक्षा की माँग करते हुए कहा कि अदालतों को अपने निर्णयों में बाहरी सामग्री, जैसे लेख,व्याख्यान या व्यक्तिगत विचारों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। न्यायिक फैसले केवल संविधान,पूर्व निर्णयों और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आधार पर ही होने चाहिए।
इसके अलावा,केंद्र ने संविधान के अनुच्छेद 129 और 141 का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले संस्थागत और सिद्धांत आधारित होने चाहिए। व्यक्तिगत राय या अकादमिक दृष्टिकोण का प्रभाव न्यायिक निष्पक्षता को कमजोर कर सकता है। केंद्र का मानना है कि न्यायपालिका को अपनी सीमाओं में रहकर काम करना चाहिए और धार्मिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
सबरीमाला विवाद अब केवल मंदिर में प्रवेश का मुद्दा नहीं रह गया है,बल्कि यह एक व्यापक संवैधानिक बहस का रूप ले चुका है। 2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए रेफरेंस ऑर्डर में भी यही सवाल उठाया गया था कि धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा की सीमा क्या होनी चाहिए और अदालतों की भूमिका कहाँ तक सीमित होनी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का फैसला न केवल सबरीमाला मंदिर,बल्कि देशभर के अन्य धार्मिक स्थलों और परंपराओं पर भी असर डाल सकता है। यह तय करेगा कि भविष्य में अदालतें धार्मिक मामलों में किस हद तक हस्तक्षेप कर सकती हैं और ‘आस्था बनाम अधिकार’ के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाएगा।
केंद्र सरकार का यह रुख इस बहस को एक नई दिशा देता है। जहाँ एक ओर महिलाओं के अधिकार और समानता की बात की जा रही है,वहीं दूसरी ओर धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं की रक्षा का मुद्दा भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी है,जहाँ यह तय होगा कि 2018 का फैसला बरकरार रहेगा या उसमें कोई बदलाव किया जाएगा।
