चीन ने ताइवान के आसपास बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास शुरू किया (तस्वीर क्रेडिट@Weisslbj333Leah)

ताइवान के आसपास चीन के सबसे बड़े सैन्य अभ्यास पर अमेरिका की चिंता,बढ़ते तनाव पर वैश्विक समुदाय की नजर

वाशिंगटन,2 जनवरी (युआईटीवी)- संयुक्त राज्य अमेरिका ने ताइवान के आसपास चीन द्वारा किए गए अब तक के सबसे बड़े सैन्य अभ्यासों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। वॉशिंगटन का कहना है कि बीजिंग की आक्रामक गतिविधियाँ और तीखी बयानबाज़ी क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बन सकती हैं और इससे अनावश्यक तनाव पैदा होता है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ उप प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने 1 जनवरी को जारी एक बयान में स्पष्ट शब्दों में कहा कि चीन को ताइवान पर सैन्य दबाव कम करना चाहिए और संवाद के रास्ते तलाशने चाहिए। उनके अनुसार,ऐसे अभ्यास न केवल ताइवान के लिए,बल्कि पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के शांतिपूर्ण माहौल के लिए चुनौती हैं।

चीन ने हाल ही में “जस्टिस मिशन 2025” नाम से बड़े पैमाने के समन्वित सैन्य अभ्यासों का आयोजन किया। 29 से 31 दिसंबर के बीच चले इन अभ्यासों में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की सेना,नौसेना,वायु सेना और रॉकेट बलों ने एक साथ भाग लिया। यह अभ्यास केवल सैन्य कौशल का प्रदर्शन भर नहीं था,बल्कि इसमें ऐसे दृश्य बनाए गए,जो संभावित संघर्ष स्थितियों की झलक पेश करते थे—जैसे ताइवान के चारों ओर समुद्री नाकेबंदी,प्रमुख बंदरगाहों को बंद करना,सटीक मिसाइल हमले और आपूर्ति मार्गों को बाधित करना। इन संकेतों को देखकर विश्लेषकों ने कहा कि बीजिंग अपने पड़ोसियों और विरोधियों दोनों को यह संदेश देना चाहता है कि वह ताइवान के मुद्दे पर किसी भी हद तक जाने को तैयार है।

ताइवान प्रशासन ने बताया कि अभ्यास के दिनों में उसने 77 चीनी सैन्य विमानों और 17 नौसैनिक जहाजों की गतिविधियाँ दर्ज कीं। कई विमान ताइवान के एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन ज़ोन की सीमा के आसपास मंडराते रहे। जवाब में ताइपे ने अपने लड़ाकू विमान उड़ाए,निगरानी बढ़ाई और समुद्री सुरक्षा उपायों को कड़ा किया। संवेदनशील इलाकों,खासकर नदियों के मुहानों पर विस्फोटक बैरल जैसी बाधाएँ लगाई गईं,ताकि किसी संभावित घुसपैठ को रोका जा सके। यह तैयारी इस बात का संकेत थी कि ताइवान इन अभ्यासों को केवल सामान्य सैन्य कवायद नहीं मान रहा,बल्कि इसे संभावित खतरे के तौर पर देख रहा है।

अमेरिका का कहना है कि इस तरह की गतिविधियों से गलतफहमी और दुर्घटनावश टकराव का जोखिम बढ़ जाता है। उच्च समुद्री यातायात और घनी सैन्य मौजूदगी वाले क्षेत्र में एक छोटी सी चूक बड़े संकट में बदल सकती है। अमेरिकी प्रवक्ता ने दोहराया कि वॉशिंगटन ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता का समर्थक है और वह मौजूदा स्थिति को बलपूर्वक बदलने के किसी भी प्रयास का विरोध करता है। अमेरिका के अनुसार,ताइवान का मुद्दा केवल दो पक्षों के बीच का विवाद नहीं है,यह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार,आपूर्ति श्रृंखला और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। ताइवान से होकर गुजरने वाली समुद्री लाइनों पर वैश्विक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा निर्भर है,इसलिए यहाँ तनाव का असर दुनिया भर में महसूस किया जा सकता है।

अमेरिकी प्रतिक्रिया के साथ-साथ कई सहयोगी देशों ने भी चिंता जताई। यूरोपीय संघ,ब्रिटेन,जापान और ऑस्ट्रेलिया ने संयुक्त रूप से कहा कि ताइवान जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ चिंताजनक हैं और इससे गलत आकलन या अनचाही टक्कर की आशंका बढ़ जाती है। इन देशों ने बीजिंग से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ने की अपील की। विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्र पहले से ही सामरिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बना हुआ है,ऐसे में बड़े सैन्य अभ्यास तनाव के ग्राफ को और ऊपर ले जाते हैं।

दूसरी तरफ,चीन ने अपने अभ्यासों को “अलगाववादी ताकतों के लिए चेतावनी” बताया है। बीजिंग का कहना है कि ताइवान को “मुख्य भूमि” से अलग रखने की किसी भी कोशिश को वह स्वीकार नहीं करेगा। चीन ने हालिया अमेरिकी हथियार सौदों और ताइपे के साथ बढ़ते रक्षा सहयोग को इस कदम के पीछे की प्रमुख वजह बताया। बीजिंग के अनुसार,उसके सैन्य अभ्यास बाहरी दखलंदाज़ी और “ताइवान की स्वतंत्रता” को बढ़ावा देने वाली ताकतों के लिए जवाब हैं। चीन का यह भी कहना है कि वह शांतिपूर्ण एकीकरण को प्राथमिकता देता है,लेकिन यदि ज़रूरत पड़ी तो अन्य विकल्पों से भी पीछे नहीं हटेगा।

नए साल के संदेश में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने ताइवान के साथ “राष्ट्रीय एकीकरण” के लक्ष्य को फिर से दोहराया। उन्होंने कहा कि यह ऐतिहासिक मिशन पूरा होकर रहेगा। वहीं ताइवान सरकार ने बीजिंग के दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि द्वीप का भविष्य केवल वहां के लोग ही तय करेंगे। ताइवान खुद को एक लोकतांत्रिक,स्वशासित इकाई के रूप में पेश करता है,जिसका अपना संविधान,सेना और आर्थिक ढाँचा है। 1949 से वह मुख्य भूमि चीन से अलग तरीके से शासित है,लेकिन बीजिंग अभी भी उसे अपना प्रांत मानता है और समय-समय पर “पुनर्मिलन” का एजेंडा सामने लाता है।

अमेरिका अपने “वन-चाइना पॉलिसी” के ढाँचे के भीतर रहते हुए ताइवान का समर्थन करता है। इसका मतलब यह है कि वॉशिंगटन औपचारिक रूप से बीजिंग को चीन की एकमात्र वैध सरकार के तौर पर स्वीकार करता है,लेकिन साथ ही वह ताइवान की आत्मरक्षा क्षमता को मजबूत करने में मदद भी करता है। यही दोहरी स्थिति अक्सर चीन को खटकती है। बीजिंग का आरोप है कि हथियार बिक्री और राजनीतिक संबंध बढ़ाकर अमेरिका ताइवान को “गलत संदेश” दे रहा है। दूसरी ओर,वॉशिंगटन का तर्क है कि वह केवल ताइवान को आत्मरक्षा का अधिकार सुनिश्चित कर रहा है,ताकि क्षेत्र में संतुलन बना रहे और कोई पक्ष एकतरफा तरीके से स्थिति न बदले।

हालिया अभ्यासों के समय और पैमाने को देखते हुए विश्लेषकों को लगता है कि चीन ने एक रणनीतिक परीक्षण किया है—दुनिया की प्रतिक्रिया को परखने के लिए। कई विशेषज्ञों ने कहा कि बीजिंग न केवल ताइवान बल्कि अपने पड़ोसी देशों को भी संकेत दे रहा है कि दक्षिण चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य में वह अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। एक स्वतंत्र रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ये कदम समुद्री इलाकों में दबाव बनाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं,ताकि भविष्य के किसी भी विवाद में चीन के पास “व्यावहारिक बढ़त” रहे।

ताइवान के भीतर भी इन घटनाओं ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। सत्तारूढ़ दल सुरक्षा तैयारियों पर जोर दे रहा है और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने की बात कह रहा है। विपक्षी दलों का मत है कि अत्यधिक बयानबाज़ी तनाव को और बढ़ा सकती है,इसलिए संवाद और संतुलित कूटनीति की आवश्यकता है। आम नागरिकों के बीच चिंता और सतर्कता,दोनों दिखाई दे रही हैं। लोग यह समझते हैं कि सैन्य अभ्यास रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर नहीं डालते,लेकिन लंबी अवधि में उनका मनोवैज्ञानिक और आर्थिक प्रभाव हो सकता है।

अमेरिका का कहना है कि क्षेत्रीय विवादों का समाधान अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत और शांतिपूर्ण तरीकों से होना चाहिए। वॉशिंगटन लगातार समुद्री और हवाई आवाजाही की स्वतंत्रता पर जोर देता रहा है। इसी कारण अमेरिकी नौसेना समय-समय पर ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर में संचालन करती है,जिन्हें “फ्रीडम ऑफ नेविगेशन” ऑपरेशन कहा जाता है। चीन इन्हें उकसावे की कार्रवाई मानता है,जबकि अमेरिका इसे अंतर्राष्ट्रीय नियमों की रक्षा बताता है। यह रस्साकशी बताती है कि विवाद केवल भू-राजनीतिक नहीं,बल्कि नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के सवाल से भी जुड़ा है।

अगले कुछ महीनों में इस मुद्दे पर और भी घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं। संभावित चुनाव,कूटनीतिक यात्राएँ और रक्षा सहयोग के नए समझौते इस समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सभी पक्ष संयम नहीं बरतते,तो छोटे-छोटे घटनाक्रम भी बड़े टकराव का रूप ले सकते हैं। यही वजह है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने बार-बार संवाद और विश्वास-निर्माण के उपायों पर जोर दिया है।

फिलहाल दुनिया की निगाहें ताइवान जलडमरूमध्य पर टिकी हैं। एक तरफ चीन अपनी शक्ति का प्रदर्शन जारी रखे हुए है,तो दूसरी ओर अमेरिका शांति और स्थिरता की जरूरत पर जोर दे रहा है। ताइवान इस बीच अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को व्यापक बनाने की कोशिश कर रहा है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि क्या कूटनीति इन बढ़ते तनावों को कम कर पाएगी या फिर शक्ति-प्रदर्शन की यह होड़ क्षेत्र को और अधिक अस्थिरता की ओर धकेलेगी,लेकिन इतना तय है कि ताइवान के आसपास का यह समुद्री इलाका केवल दो पक्षों की प्रतिद्वंद्विता का मंच नहीं,बल्कि वैश्विक शांति और सुरक्षा की परीक्षा का मैदान बन चुका है।