अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन (तस्वीर क्रेडिट@mohsenreyhani01)

ग्रीनलैंड पर टकराव बरकरार: डेनमार्क और अमेरिका के बीच मतभेद गहरे,यूरोप और नाटो ने बढ़ाया सैन्य समर्थन

ओस्लो,16 जनवरी (युआईटीवी)- डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ़्रेडरिक्सन ने ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के साथ जारी तनाव पर खुलकर बात करते हुए कहा है कि दोनों देशों के बीच मतभेद अब भी बने हुए हैं और हालिया बातचीत के बावजूद कोई ठोस सहमति नहीं बन पाई है। गुरुवार को जारी एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वॉशिंगटन में हुई ताजा बैठक “आसान नहीं” थी और अमेरिका की ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में लेने की महत्वाकांक्षा,डेनमार्क के कड़े विरोध के बावजूद,अभी भी कायम है। उनके इस बयान से साफ हो गया है कि आर्कटिक क्षेत्र को लेकर भू-राजनीतिक खींचतान और तेज होती जा रही है।

प्रधानमंत्री फ़्रेडरिक्सन ने यह प्रतिक्रिया बुधवार को वॉशिंगटन में हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद पहली बार दी। उन्होंने कहा कि इस बातचीत में डेनमार्क साम्राज्य के रुख को मजबूती से सामने रखा गया और अमेरिकी दावों का सख्ती से प्रतिवाद किया गया। उन्होंने विदेश मंत्री लार्स लोक्के रासमुसेन और ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्ज़फेल्ट का धन्यवाद करते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के हितों की स्पष्ट और दृढ़ता से रक्षा की। फ़्रेडरिक्सन के अनुसार,इस तरह के संवेदनशील मुद्दे पर किसी भी तरह की नरमी दिखाना संभव नहीं था।

प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि ग्रीनलैंड से जुड़े इस विवाद पर एक संयुक्त कार्य समूह गठित किया जाएगा,जो भविष्य की रणनीति और संवाद के संभावित रास्तों पर विचार करेगा। हालाँकि,उन्होंने यह साफ कर दिया कि इस पहल से मूल समस्या का समाधान नहीं हुआ है। फ़्रेडरिक्सन ने कहा, “इससे यह सच्चाई नहीं बदलती कि बुनियादी असहमति बनी हुई है। ग्रीनलैंड को अपने अधीन लेने की अमेरिकी महत्वाकांक्षा अब भी मौजूद है। यह एक गंभीर मामला है और हम इसे वास्तविकता बनने से रोकने के लिए हरसंभव प्रयास करते रहेंगे।” उनके इस बयान से यह संकेत मिला कि डेनमार्क इस मुद्दे को केवल कूटनीतिक स्तर पर नहीं,बल्कि रणनीतिक और सुरक्षा के नजरिए से भी देख रहा है।

बुधवार को वॉशिंगटन में हुई बैठक में डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोक्के रासमुसेन और ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्ज़फेल्ट ने अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात की थी। इस मुलाकात का उद्देश्य ग्रीनलैंड की स्थिति,आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा और नाटो सहयोग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना था। फ़्रेडरिक्सन ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ग्रीनलैंड की रक्षा और सुरक्षा केवल डेनमार्क या ग्रीनलैंड का मुद्दा नहीं है,बल्कि यह पूरे नाटो गठबंधन की साझा चिंता है। उन्होंने यह भी दोहराया कि आर्कटिक क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर वैश्विक सुरक्षा पर पड़ सकता है।

ग्रीनलैंड को लेकर बढ़ते तनाव के बीच यूरोपीय संघ और नाटो सहयोगियों ने डेनमार्क को राजनीतिक और सैन्य समर्थन देना शुरू कर दिया है। यह समर्थन ऐसे समय में सामने आया है,जब आर्कटिक क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। बर्फ पिघलने के कारण नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं,प्राकृतिक संसाधनों की संभावनाएँ बढ़ रही हैं और वैश्विक शक्तियों की नजरें इस क्षेत्र पर टिक गई हैं। ऐसे में ग्रीनलैंड का भविष्य केवल एक द्वीप तक सीमित नहीं,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय शक्ति संतुलन से जुड़ा हुआ है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने गुरुवार को इस मुद्दे पर एक अहम घोषणा की। उन्होंने इस्त्रेस एयर बेस पर सशस्त्र बलों को नए साल के संबोधन के दौरान कहा कि फ्रांस आने वाले दिनों में ग्रीनलैंड में अतिरिक्त “थल, वायु और समुद्री संसाधन” भेजेगा। मैक्रों ने इससे पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह भी बताया था कि डेनमार्क के अनुरोध पर फ्रांस ने ग्रीनलैंड में डेनमार्क द्वारा आयोजित संयुक्त सैन्य अभ्यास में भाग लेने का फैसला किया है। उनके अनुसार,पहले फ्रांसीसी सैन्य दल रवाना हो चुके हैं और अन्य टुकड़ियाँ भी जल्द वहाँ पहुँचेंगी। फ्रांस का यह कदम यूरोप की ओर से डेनमार्क के समर्थन का एक मजबूत संकेत माना जा रहा है।

नीदरलैंड्स ने भी इस दिशा में सक्रियता दिखाई है। देश के रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को घोषणा की कि वह डेनमार्क के नेतृत्व वाले टोही मिशन में हिस्सा लेगा। इस मिशन का उद्देश्य ग्रीनलैंड और उसके आसपास के क्षेत्रों में स्थिति का आकलन करना और संभावित सुरक्षा चुनौतियों पर नजर रखना है। वहीं जर्मनी के रक्षा मंत्रालय ने बुधवार को जानकारी दी कि वह भी ग्रीनलैंड में बहुराष्ट्रीय टोही मिशन में भाग लेगा। मंत्रालय के अनुसार,डेनमार्क के निमंत्रण पर जर्मन सशस्त्र बलों के 13 सदस्य अन्य यूरोपीय देशों के साथ मिलकर इस मिशन में शामिल होंगे।

स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन ने भी बुधवार को कहा कि डेनमार्क के अनुरोध पर स्वीडन ने ग्रीनलैंड में अपने सैन्य कर्मियों को भेजा है। उन्होंने इसे नॉर्डिक देशों के बीच सहयोग का स्वाभाविक विस्तार बताया। इसी तरह नॉर्वे ने भी दो सैन्य अधिकारियों को ग्रीनलैंड भेजने की घोषणा की है,ताकि सहयोगी देशों के बीच आगे के सैन्य और रणनीतिक सहयोग की रूपरेखा तैयार की जा सके। इन सभी कदमों से यह साफ है कि ग्रीनलैंड को लेकर यूरोप एकजुट होकर डेनमार्क के साथ खड़ा है।

ग्रीनलैंड,डेनमार्क साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वशासी क्षेत्र है। हालांकि इसे आंतरिक मामलों में व्यापक स्वायत्तता प्राप्त है,लेकिन रक्षा और विदेश नीति पर नियंत्रण कोपेनहेगन के पास ही है। ग्रीनलैंड का भू-रणनीतिक महत्व लंबे समय से अमेरिका के लिए अहम रहा है और वहाँ अमेरिका का एक सैन्य अड्डा पहले से मौजूद है। इसी वजह से अमेरिका की दिलचस्पी इस द्वीप में नई नहीं है,लेकिन हाल के वर्षों में यह दिलचस्पी कहीं अधिक खुलकर सामने आई है।

वर्ष 2025 में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार ग्रीनलैंड को “हासिल करने” की इच्छा जता चुके हैं। उन्होंने अपने बयानों में ग्रीनलैंड के रणनीतिक स्थान, सुरक्षा महत्व और संसाधनों का उल्लेख करते हुए इसे अमेरिका के हितों के लिए अहम बताया है। हाल के दिनों में ट्रंप के बयान और तीखे हो गए हैं,जिससे डेनमार्क और उसके यूरोपीय सहयोगियों की चिंताएँ बढ़ गई हैं।

डेनमार्क की सरकार साफ कर चुकी है कि ग्रीनलैंड न तो बिक्री के लिए है और न ही किसी तरह के दबाव में उसके भविष्य पर समझौता किया जाएगा। फ़्रेडरिक्सन के ताजा बयान इसी सख्त रुख को दोहराते हैं। उनका कहना है कि ग्रीनलैंड के लोगों का आत्मनिर्णय सर्वोपरि है और किसी भी बाहरी शक्ति को वहाँ के भविष्य पर एकतरफा दावा करने का अधिकार नहीं है।

ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क और अमेरिका के बीच यह टकराव केवल द्विपक्षीय मतभेद नहीं है,बल्कि यह आर्कटिक क्षेत्र में उभरते नए वैश्विक शक्ति संघर्ष का प्रतीक बनता जा रहा है। यूरोपीय संघ और नाटो का बढ़ता सैन्य समर्थन यह संकेत देता है कि आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक अंतर्राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करेगा। अब यह देखना अहम होगा कि कूटनीतिक प्रयास इस गतिरोध को कम कर पाते हैं या फिर ग्रीनलैंड वैश्विक भू-राजनीति के सबसे संवेदनशील केंद्रों में से एक बनकर उभरता है।