नई दिल्ली,10 मार्च (युआईटीवी)- देश की प्रमुख शैक्षिक संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की एक पाठ्यपुस्तक को लेकर उठे विवाद के बाद सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी माँग ली है। इस पुस्तक में शामिल एक अध्याय की सामग्री को लेकर विभिन्न पक्षों से गंभीर आपत्तियाँ सामने आई थीं। बढ़ते विवाद और आलोचनाओं के बीच एनसीईआरटी ने न केवल माफी माँगी,बल्कि यह भी घोषणा की कि विवादित अध्याय वाली पूरी पुस्तक को ही वापस ले लिया गया है।
दरअसल,एनसीईआरटी ने हाल ही में कक्षा 8 के लिए सामाजिक विज्ञान की पुस्तक समाज की खोज: भारत और उससे परे (भाग-2) प्रकाशित की थी। इस पुस्तक में “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” शीर्षक से एक अध्याय शामिल था। इसी अध्याय की कुछ सामग्री को लेकर विवाद पैदा हो गया। आरोप लगाया गया कि अध्याय में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को जिस तरीके से प्रस्तुत किया गया है,वह संवेदनशील और संतुलित नहीं है।
यह मामला तब और गंभीर हो गया,जब देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस विषय पर आपत्ति जताई। सुप्रीम कोर्ट की ओर से उठाई गई आपत्तियों के बाद शिक्षा जगत और राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई। कई शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों ने भी कहा कि पाठ्यपुस्तकों में दी जाने वाली सामग्री बेहद सावधानी और जिम्मेदारी के साथ तैयार की जानी चाहिए,क्योंकि इन्हें देश भर के लाखों छात्र पढ़ते हैं।
विवाद बढ़ने के बाद एनसीईआरटी के निदेशक और परिषद के सदस्यों ने एक आधिकारिक बयान जारी किया। इस बयान में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विवादित अध्याय के कारण जो स्थिति उत्पन्न हुई है,उसके लिए परिषद सार्वजनिक रूप से बिना किसी शर्त के क्षमा चाहती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में किसी प्रकार का स्पष्टीकरण देने के बजाय संस्था पूरी जिम्मेदारी स्वीकार करती है और इससे उत्पन्न असुविधा के लिए खेद व्यक्त करती है।
𝐏𝐫𝐞𝐬𝐬 𝐑𝐞𝐥𝐞𝐚𝐬𝐞: 𝐏𝐮𝐛𝐥𝐢𝐜 𝐀𝐩𝐨𝐥𝐨𝐠𝐲
The National Council of Educational Research and Training [NCERT] has recently published a social science textbook, “Exploring Society: India and Beyond,” Grade 8 (Part II), which contained Chapter IV titled “The Role of… pic.twitter.com/mZY15aJTDo
— NCERT (@ncert) March 10, 2026
एनसीईआरटी ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि जिस पुस्तक में यह अध्याय शामिल था,उसे पूरी तरह से वापस ले लिया गया है। परिषद के अनुसार अब यह पुस्तक कहीं भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है और इसे पाठ्यक्रम से भी हटा दिया गया है। संस्था का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विवादित सामग्री छात्रों तक आगे न पहुँचे।
परिषद ने यह भी कहा कि शैक्षिक सामग्री तैयार करते समय वह सटीकता,संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के उच्चतम मानकों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है। एनसीईआरटी के मुताबिक पाठ्यपुस्तकों की सामग्री तैयार करते समय कई स्तरों पर समीक्षा की प्रक्रिया होती है,लेकिन इस मामले में जो स्थिति बनी है उससे यह स्पष्ट है कि भविष्य में समीक्षा प्रक्रिया को और अधिक सख्त और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है।
गौरतलब है कि एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित पुस्तकें देश के शिक्षा तंत्र में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड समेत कई शिक्षा बोर्ड और राज्य सरकारें इन पुस्तकों को अपने पाठ्यक्रम के आधार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। इसके अलावा देश के हजारों सरकारी और निजी विद्यालयों में एनसीईआरटी की किताबें पढ़ाई जाती हैं। ऐसे में किसी भी पाठ्यपुस्तक की सामग्री पर उठने वाले सवाल सीधे तौर पर शिक्षा व्यवस्था,पाठ्यक्रम निर्माण और संस्थागत जवाबदेही से जुड़ जाते हैं।
एनसीईआरटी द्वारा माफी मांगने से पहले इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई थी। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए खेद व्यक्त किया था। उन्होंने कहा था कि सरकार न्यायपालिका का पूरा सम्मान करती है और किसी भी तरह से उसका अपमान करने की मंशा नहीं हो सकती।
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि जब यह विषय उनके संज्ञान में आया तो उन्होंने तुरंत एनसीईआरटी को निर्देश दिया कि विवादित अध्याय वाली सभी किताबों को वापस लिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले की जाँच कराई जाएगी और यह पता लगाया जाएगा कि अध्याय की सामग्री किस प्रक्रिया से पुस्तक में शामिल हुई।
शिक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया था कि जिस व्यक्ति या टीम ने इस अध्याय को तैयार किया है,उनके खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। उनका कहना था कि पाठ्यपुस्तकें छात्रों के बौद्धिक विकास का आधार होती हैं,इसलिए उनमें दी जाने वाली जानकारी बेहद जिम्मेदारी और संतुलन के साथ प्रस्तुत की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा था, “हम न्यायपालिका का अत्यंत सम्मान करते हैं। न्यायपालिका ने जो कहा है उसका हम पूरा पालन करेंगे। इस विषय पर न्यायपालिका ने जो कहा है वह हमारे लिए सर्वोपरि है। जो भी हुआ उसके लिए मैं अत्यंत दुखी हूँ और खेद प्रकट करता हूँ।” शिक्षा मंत्री ने यह भी दोहराया कि न्यायपालिका का अपमान करना सरकार का उद्देश्य कभी नहीं था।
धर्मेंद्र प्रधान के अनुसार मंत्रालय की ओर से एनसीईआरटी को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि विवादित पुस्तक की सभी प्रतियों को तुरंत वापस लिया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि वे आगे छात्रों तक न पहुँचें। उन्होंने कहा कि यह घटना सरकार के लिए भी एक सीख है और भविष्य में पाठ्यपुस्तकों की सामग्री को लेकर और अधिक सतर्कता बरती जाएगी।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पाठ्यपुस्तकों की सामग्री की समीक्षा और स्वीकृति की प्रक्रिया कितनी मजबूत है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाठ्यपुस्तकें केवल जानकारी देने का माध्यम नहीं होतीं,बल्कि वे छात्रों की सोच,दृष्टिकोण और सामाजिक समझ को भी प्रभावित करती हैं। इसलिए उनमें दी गई सामग्री का संतुलित और तथ्यात्मक होना बेहद आवश्यक है।
कई शिक्षाविदों का कहना है कि पाठ्यपुस्तकों के निर्माण में विषय विशेषज्ञों,शिक्षकों और स्वतंत्र समीक्षकों की भूमिका को और अधिक मजबूत किया जाना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि किसी भी प्रकार की संवेदनशील या विवादास्पद सामग्री को पहले ही चरण में पहचानकर ठीक किया जा सके।
एनसीईआरटी द्वारा बिना शर्त माफी माँगने और पुस्तक को वापस लेने के फैसले को कई लोगों ने एक जिम्मेदार कदम बताया है। हालाँकि,विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि पाठ्यपुस्तकों के निर्माण और प्रकाशन की प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो।
फिलहाल यह मामला शिक्षा व्यवस्था,संस्थागत जवाबदेही और पाठ्यपुस्तक निर्माण की प्रक्रिया को लेकर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि एनसीईआरटी और शिक्षा मंत्रालय इस घटना से क्या सबक लेते हैं और पाठ्यपुस्तकों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को मजबूत करने के लिए किस तरह के सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं।
