कच्चे तेल

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल,100 डॉलर के पार पहुँचा भाव; होर्मुज संकट से वैश्विक बाजारों में हड़कंप

मुंबई,13 अप्रैल (युआईटीवी)- वैश्विक ऊर्जा बाजार में सोमवार को बड़ा उथल-पुथल देखने को मिला,जब कच्चे तेल की कीमतों में अचानक करीब 10 प्रतिशत की तेज बढ़त दर्ज की गई और दाम फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गए। इस उछाल की मुख्य वजह संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का विफल होना और उसके बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ता तनाव माना जा रहा है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि वैश्विक तेल आपूर्ति पर खतरे की आशंका ने निवेशकों और बाजारों को झकझोर कर रख दिया है।

सोमवार सुबह करीब 10:45 बजे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का दाम 7.41 प्रतिशत यानी 7.05 डॉलर बढ़कर 102.2 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया। वहीं डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमत 8.54 प्रतिशत या 8.25 डॉलर की तेजी के साथ 104.8 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में आई है,जब बाजार पहले से ही भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति संबंधी चिंताओं से जूझ रहा था।

घरेलू स्तर पर भी इस उछाल का असर साफ तौर पर देखने को मिला। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर क्रूड ऑयल फ्यूचर्स (20 अप्रैल कॉन्ट्रैक्ट) 7.61 प्रतिशत यानी 697 रुपए की बढ़त के साथ 9,850 रुपए प्रति बैरल के स्तर पर पहुँच गया। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम का सीधा असर भारतीय बाजार पर भी पड़ रहा है।

दरअसल,इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ा तनाव है। यह जलमार्ग वैश्विक कच्चे तेल के परिवहन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में यदि इस मार्ग में किसी प्रकार की रुकावट आती है,तो इसका सीधा असर वैश्विक आपूर्ति और कीमतों पर पड़ता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में बयान देते हुए कहा कि ईरान इस जलमार्ग को खुला रखने में विफल रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में प्रवेश करने या बाहर निकलने की कोशिश करने वाले सभी जहाजों को रोक सकता है। ट्रंप के इस बयान ने बाजार में अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है,जिससे निवेशकों में घबराहट फैल गई है।

गौरतलब है कि 8 अप्रैल को अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम पर सहमति बनी थी। इसका उद्देश्य तनाव को कम करना और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को सुरक्षित रूप से चालू रखना था। हालाँकि,हालिया वार्ता के विफल होने के बाद अब यह समझौता कमजोर पड़ता नजर आ रहा है और आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव लंबे समय तक जारी रहता है,तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से न केवल परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ेगी,बल्कि इससे महँगाई पर भी दबाव पड़ेगा। भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

इस बीच,कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का असर वैश्विक शेयर बाजारों पर भी देखने को मिला है। भारत में शुरुआती कारोबार के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी जैसे प्रमुख सूचकांकों में करीब 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों ने जोखिम से बचने के लिए बिकवाली का रुख अपनाया,जिससे बाजार दबाव में आ गया।

एशियाई बाजारों में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिली। जापान का निक्केई,हांगकांग का हांग सेंग और दक्षिण कोरिया का कोस्पी जैसे प्रमुख सूचकांक 1 प्रतिशत से अधिक की गिरावट के साथ लाल निशान में कारोबार करते नजर आए। इससे यह साफ हो गया है कि तेल कीमतों में उछाल ने वैश्विक वित्तीय बाजारों को भी प्रभावित किया है।

विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल बाजार की दिशा काफी हद तक अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। यदि दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है और कोई कूटनीतिक समाधान निकलता है,तो तेल की कीमतों में स्थिरता आ सकती है,लेकिन अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो कीमतों में और उछाल देखने को मिल सकता है।

कच्चे तेल की कीमतों में यह तेज उछाल केवल एक आर्थिक घटना नहीं है,बल्कि इसके पीछे गहरे भू-राजनीतिक कारण हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक मार्ग पर बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया को चिंतित कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस संकट का कोई समाधान निकलता है या फिर वैश्विक बाजारों में यह अस्थिरता और गहराती है।