अंजेल चकमा (तस्वीर क्रेडिट@TribalArmy)

देहरादून में त्रिपुरा के छात्र की हत्या पर एनएचआरसी सख्त,राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट तलब

नई दिल्ली,30 दिसंबर (युआईटीवी)- देहरादून में त्रिपुरा के एक छात्र की हत्या के मामले ने अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। मानवाधिकार आयोग ने इस घटना को गंभीर मानते हुए उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी किया है और अब तक की गई कार्रवाई पर विस्तृत रिपोर्ट माँगी है। आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक आपराधिक मामला नहीं,बल्कि मानवाधिकार और सामाजिक सौहार्द से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है। इसलिए राज्य प्रशासन से अपेक्षा की गई है कि जाँच न केवल निष्पक्ष हो,बल्कि तेजी से पूरी भी की जाए। आयोग ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिए कि पूरे राज्य में पूर्वोत्तर के छात्रों तथा अन्य बाहरी विद्यार्थियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर सुनिश्चित किया जाए।

नोटिस में आयोग ने यह भी कहा है कि रिपोर्ट में जाँच की प्रगति,आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए उठाए गए कदम और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए किए जा रहे उपायों का विस्तृत ब्योरा शामिल होना चाहिए। आयोग की इस सक्रियता को पीड़ित परिवार और पूर्वोत्तर के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है,क्योंकि लंबे समय से ऐसे मामलों में नस्लीय टिप्पणियों और भेदभाव के आरोप सामने आते रहे हैं।

उधर,राज्य सरकार ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता प्रदान की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा के पिता तरुण प्रसाद चकमा को पहली किस्त के रूप में 4 लाख 12 हजार 500 रुपये की सहायता राशि स्वीकृत कर दी गई। यह मदद अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम,1989 और नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम,1955 के तहत दी गई है। इस सहायता का उद्देश्य न केवल आर्थिक सहारा प्रदान करना है,बल्कि यह संदेश देना भी है कि सरकार पीड़ितों के साथ खड़ी है।

बताया जाता है कि एंजेल चकमा उत्तराखंड के एक विश्वविद्यालय में एमबीए के अंतिम वर्ष का छात्र था। उसका परिवार लंबे समय से सीमा सुरक्षा बल से जुड़ा रहा है और उसके पिता बीएसएफ में कांस्टेबल के रूप में तैनात हैं। 9 दिसंबर को एंजेल पर कुछ बदमाशों के समूह ने हमला कर दिया। हमलावरों ने कथित रूप से नस्लीय टिप्पणियाँ करते हुए उस पर गंभीर वार किए। इस हमले के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया,जहाँ लगभग दो सप्ताह तक डॉक्टरों की निगरानी में उसका इलाज चलता रहा,लेकिन 26 दिसंबर को उसने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों के अनुसार,उसकी चोटें इतनी गंभीर थीं कि सभी प्रयासों के बावजूद उसकी जान नहीं बचाई जा सकी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने घटना के बाद पीड़ित परिवार से फोन पर बातचीत की और गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने परिवार को भरोसा दिलाया कि न्याय दिलाने के लिए हर संभव कदम उठाए जाएँगे। मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि मामले में अब तक पाँच आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है और बाकी की तलाश जारी है। पुलिस का कहना है कि घटना में शामिल सभी लोगों की पहचान कर ली गई है और उनके खिलाफ सख्त धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।

इस घटना ने न केवल उत्तराखंड,बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में आक्रोश की लहर पैदा कर दी। कई सामाजिक संगठनों,छात्र संघों और सार्वजनिक प्रतिनिधियों ने इसे नफरत से प्रेरित अपराध बताते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी,कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद गौरव गोगोई,मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा और मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के संगमा सहित कई राजनीतिक नेताओं ने घटना की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि देश के किसी भी हिस्से में रहने वाले नागरिकों के साथ क्षेत्र,रूप-रंग या भाषा के आधार पर भेदभाव अस्वीकार्य है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

मानवाधिकार से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला केवल एक छात्र की मौत तक सीमित नहीं है,बल्कि इससे जुड़ा है वह मनोवैज्ञानिक भय,जिसका सामना पूर्वोत्तर राज्यों से आने वाले छात्र अक्सर करते हैं। बड़े शहरों और शिक्षा केंद्रों में पढ़ने के लिए आने वाले इन युवाओं को कभी-कभी नस्लीय टिप्पणियों,तानों और मज़ाक का सामना करना पड़ता है,जो धीरे-धीरे सामाजिक दूरी और अविश्वास को जन्म देता है। इसलिए आयोग द्वारा इस मामले में संज्ञान लेना एक ऐसी पहल मानी जा रही है,जो पूरे देश के लिए सशक्त संदेश देती है कि किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है।

इस बीच,विश्वविद्यालय प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों ने भी आश्वासन दिया है कि परिसर और छात्रावासों में सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी की जाएगी। छात्रों के बीच जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने और सांस्कृतिक संवाद बढ़ाने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है,ताकि विभिन्न क्षेत्रों से आए छात्रों के बीच बेहतर समझ और सहयोग का माहौल बन सके।

पीड़ित परिवार के लिए यह क्षति अपूरणीय है। एंजेल के माता-पिता ने कहा कि उनका बेटा ऊँचे सपने लेकर पढ़ाई करने बाहर निकला था,लेकिन नफरत ने उसकी जान ले ली। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार और न्यायपालिका दोषियों को सख्त सजा दिलाएगी,ताकि भविष्य में कोई और परिवार ऐसी पीड़ा से न गुजरे।

देहरादून जैसी शांत मानी जाने वाली शैक्षणिक नगरी में घटी इस घटना ने कानून व्यवस्था और सामाजिक व्यवहार दोनों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यदि ऐसी घटनाओं को समय रहते न रोका गया,तो यह देश की ‘एक भारत,श्रेष्ठ भारत’ की भावना को आहत कर सकती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि जाँच निष्पक्ष,त्वरित और पारदर्शी हो और इसके साथ-साथ समाज में संवेदनशीलता और सहिष्णुता के मूल्यों को मजबूत किया जाए।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सख्ती,राज्य सरकार की सक्रियता और देशभर से उठी आवाजें इस बात का संकेत हैं कि अब ऐसी घटनाओं को केवल एक आपराधिक केस के तौर पर नहीं देखा जाएगा। यह एक व्यापक सामाजिक चुनौती है,जिसका समाधान कानून के साथ-साथ जागरूकता,शिक्षा और आपसी सम्मान से ही संभव है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस मामले में जाँच किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या यह न्याय प्रणाली तथा समाज दोनों के लिए सीख का सबक बन पाता है।