वॉशिंगटन/लंदन,6 फरवरी (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया द्वीप पर अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को लेकर बेहद सख्त और स्पष्ट रुख अपनाया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि वह इस रणनीतिक रूप से अहम अमेरिकी सैन्य अड्डे को किसी भी सूरत में खतरे में नहीं पड़ने देंगे। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर भविष्य में किसी भी तरह का समझौता टूटता है या अमेरिकी सेना और उसके ऑपरेशन्स पर कोई खतरा पैदा होता है,तो वह डिएगो गार्सिया में अमेरिकी बेस को “मिलिट्री तरीके से सुरक्षित और मजबूत” करने का पूरा अधिकार अपने पास रखते हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप ने यह बयान अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक लंबी पोस्ट के जरिए दिया। इस पोस्ट में उन्होंने बताया कि डिएगो गार्सिया को लेकर उनकी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर से सीधी बातचीत हुई है। ट्रंप ने लिखा कि डिएगो गार्सिया एक बड़े अमेरिकी सैन्य बेस की जगह है,जो हिंद महासागर के बीचों-बीच रणनीतिक रूप से बेहद अहम स्थिति में स्थित है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह बेस संयुक्त राज्य अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ट्रंप ने विदेशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की रणनीतिक अहमियत को रेखांकित करते हुए कहा कि बीते एक साल में अमेरिका के सैन्य अभियान कई वजहों से सफल रहे हैं। उन्होंने लिखा कि इन सफलताओं के पीछे अमेरिकी सैनिकों की ताकत,आधुनिक सैन्य उपकरणों की क्षमता और सबसे बढ़कर उन सैन्य ठिकानों की रणनीतिक स्थिति है,जहाँ से ये ऑपरेशन्स संचालित किए गए। ट्रंप के मुताबिक,डिएगो गार्सिया जैसे बेस अमेरिकी सैन्य शक्ति के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह हैं,जो दुनिया के कई संवेदनशील क्षेत्रों में तेजी से कार्रवाई करने की क्षमता देते हैं।
डिएगो गार्सिया द्वीप को लेकर हाल के महीनों में यूनाइटेड किंगडम और मॉरीशस के बीच कथित लीज समझौते को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हुई है। इसी संदर्भ में ट्रंप ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की स्थिति को समझने की बात कही। उन्होंने लिखा कि वह यह समझते हैं कि प्रधानमंत्री स्टार्मर ने जो डील की है,कई लोगों के मुताबिक वह सबसे अच्छी डील हो सकती है जो मौजूदा हालात में की जा सकती थी। ट्रंप के इस बयान को लंदन के लिए एक तरह का राजनीतिक समर्थन माना जा रहा है,खासकर उस समय जब ब्रिटेन पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बना हुआ है।
हालाँकि,ट्रंप ने अमेरिकी हितों के साथ किसी भी तरह के समझौते को लेकर कोई नरमी नहीं दिखाई। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि अगर भविष्य में कभी भी लीज डील टूटती है या कोई भी अमेरिकी बेस पर चल रहे ऑपरेशन्स और वहाँ तैनात अमेरिकी सेना को धमकी देता है या खतरे में डालता है,तो वह बिना किसी हिचकिचाहट के डिएगो गार्सिया में अमेरिकी मौजूदगी को सैन्य तरीके से सुरक्षित और मजबूत करने का कदम उठाएँगे। उनके इस बयान को अमेरिका की आक्रामक और सुरक्षा-केंद्रित विदेश नीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
ट्रंप ने डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी मौजूदगी को लेकर उठाए जा रहे विरोधों और चुनौतियों को भी सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि वह इस तरह के महत्वपूर्ण सैन्य बेस पर अमेरिकी मौजूदगी को कभी भी “झूठे दावों” या “पर्यावरण के नाम पर बकवास” के चलते कमजोर या खतरे में नहीं पड़ने देंगे। ट्रंप का यह बयान उन समूहों और संगठनों की ओर इशारा करता है,जो डिएगो गार्सिया में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों को पर्यावरणीय और मानवाधिकार के मुद्दों से जोड़कर आलोचना करते रहे हैं।
व्हाइट हाउस ने भी राष्ट्रपति के इस सख्त संदेश को अपनी नियमित प्रेस ब्रीफिंग के दौरान दोहराया। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर से सीधे बात की थी और उनके फैसले का समर्थन किया था। लेविट ने कहा कि ट्रंप ब्रिटिश प्रधानमंत्री की स्थिति को समझते हैं और उसे समर्थन भी देते हैं,लेकिन इसके साथ ही अमेरिकी सुरक्षा अधिकार पूरी तरह से बरकरार हैं।
लेविट ने जोर देकर कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के पास अपनी संपत्ति और अपने सैन्य ठिकानों की रक्षा करने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा कि डिएगो गार्सिया द्वीप पर अमेरिका का एक सक्रिय सैन्य बेस मौजूद है और उसकी सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। लेविट के मुताबिक,राष्ट्रपति का रुख सिर्फ इस एक मामले तक सीमित नहीं है,बल्कि यह अमेरिकी विदेश और रक्षा नीति का व्यापक हिस्सा है।
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी ने आगे कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया में कहीं भी,डिएगो गार्सिया सहित,अपनी संपत्ति और हितों की रक्षा करने से कभी पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लीज समझौते या भविष्य में लिए जाने वाले किसी भी फैसले को लेकर फिलहाल कोई तय टाइमलाइन नहीं है। हालाँकि,उनकी टिप्पणियों से यह साफ हो गया कि अमेरिका इस मुद्दे पर किसी भी अनिश्चितता को अपने खिलाफ जाने नहीं देना चाहता।
डिएगो गार्सिया को लंबे समय से विदेशों में स्थित अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों में से एक माना जाता है। यह द्वीप हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन्स के लिए एक प्रमुख हब के रूप में काम करता रहा है। यहाँ से अमेरिका ने मध्य पूर्व,अफ्रीका और दक्षिण एशिया में कई बड़े सैन्य अभियानों को अंजाम दिया है। इस बेस की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह अमेरिका को तेजी से सैन्य ताकत तैनात करने और रणनीतिक निगरानी रखने में मदद करता है।
इतिहास के नजरिए से देखें तो डिएगो गार्सिया सिर्फ एक सैन्य अड्डा नहीं रहा है, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय कानूनी और राजनीतिक बहसों का भी केंद्र रहा है। द्वीप की संप्रभुता,वहाँ के मूल निवासियों के विस्थापन और शासन से जुड़े मुद्दों को लेकर दशकों से विवाद चलता आ रहा है। मॉरीशस लंबे समय से इस द्वीप पर अपना दावा करता रहा है,जबकि ब्रिटेन इसे अपने नियंत्रण में रखता आया है और अमेरिका को यहाँ सैन्य बेस संचालित करने की अनुमति देता रहा है।
ट्रंप के हालिया बयान ऐसे समय में आए हैं,जब वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और हिंद महासागर क्षेत्र की रणनीतिक अहमियत लगातार बढ़ रही है। चीन,रूस और अन्य वैश्विक शक्तियों की बढ़ती गतिविधियों के बीच अमेरिका डिएगो गार्सिया जैसे ठिकानों को अपनी सैन्य और रणनीतिक योजना का अहम हिस्सा मानता है। ऐसे में ट्रंप का यह सख्त संदेश न सिर्फ ब्रिटेन और मॉरीशस के लिए,बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक संकेत माना जा रहा है कि अमेरिका अपने रणनीतिक हितों को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान अमेरिका की उस नीति को फिर से रेखांकित करता है,जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य प्रभुत्व को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। डिएगो गार्सिया जैसे ठिकानों को लेकर उनकी आक्रामक भाषा यह साफ करती है कि भविष्य में भी अमेरिका अपने विदेशी सैन्य अड्डों की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाने को तैयार है,चाहे उसके लिए राजनीतिक विवादों या अंतर्राष्ट्रीय आलोचनाओं का सामना ही क्यों न करना पड़े।
