यूनाइटेड नेशंस,10 मार्च (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अफगानिस्तान की स्थिति को लेकर हुई हालिया बैठक कूटनीतिक रूप से बेहद दिलचस्प और तीखी बहस का मंच बन गई। इस बैठक के दौरान भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच तीखा शब्दों का आदान-प्रदान देखने को मिला। भारत ने अफगानिस्तान में हुए हवाई हमलों और सीमा पार आतंकवाद पर गंभीर चिंता जताई,जबकि पाकिस्तान के प्रतिनिधि ने भारत के बयान का जवाब देते हुए कई आरोप लगाए। हालाँकि,इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प स्थिति तब बनी जब पाकिस्तान के प्रतिनिधि ने प्रतिक्रिया देते हुए ऐसी बातें स्वीकार कर लीं,जिनका भारत ने अपने बयान में सीधे तौर पर उल्लेख भी नहीं किया था।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने अफगानिस्तान में हाल के हमलों और सीमा पार हिंसा पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने अपने बयान में किसी देश का नाम लिए बिना कहा कि अंतर्राष्ट्रीय कानून और इस्लामी एकता के सिद्धांतों की बात करना और दूसरी ओर रमजान के पवित्र महीने में निर्दोष नागरिकों पर हवाई हमले करना दोहरे मानदंड को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्रवाई न केवल अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है,बल्कि यह मानवता के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है।
भारत के प्रतिनिधि ने यह भी बताया कि हाल के हमलों में बड़ी संख्या में नागरिकों की जान गई है। उन्होंने कहा कि 6 मार्च 2026 तक कम-से-कम 185 निर्दोष नागरिक मारे गए हैं और इनमें लगभग 55 प्रतिशत महिलाएँ और बच्चे शामिल हैं। उनके अनुसार किसी भी सैन्य कार्रवाई में आम नागरिकों की इतनी बड़ी संख्या में मौत होना गंभीर चिंता का विषय है और इसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाँच और जवाबदेही जरूरी है।
हालाँकि,भारत ने अपने बयान में किसी देश का नाम नहीं लिया,लेकिन कूटनीतिक हलकों में यह साफ माना जा रहा था कि यह टिप्पणी पाकिस्तान के हालिया हवाई हमलों की ओर इशारा कर रही थी। आमतौर पर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में यह परंपरा होती है कि अगर किसी बयान में किसी देश का नाम नहीं लिया गया हो,तो उस देश के प्रतिनिधि उसे नजरअंदाज कर सकते हैं और प्रतिक्रिया देने से बच सकते हैं। इससे उन्हें सीधे आरोपों से बचने का अवसर मिल जाता है।
लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि आसिम इफ्तिखार अहमद ने भारत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए यह मान लिया कि यह टिप्पणियाँ उनके देश को लेकर की गई थीं। उन्होंने अपने लंबे बयान में भारत पर कई आरोप लगाए और कहा कि भारत पाकिस्तान के खिलाफ दुश्मनी भरा रवैया रखता है।
अपने जवाब में अहमद ने यह भी कहा कि भारत अफगानिस्तान में अपने निवेश और गतिविधियों के कमजोर पड़ने से परेशान है। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ “सटीक और प्रभावी कार्रवाई” की है,जिसकी वजह से भारत के कथित हित प्रभावित हुए हैं। उनके इस बयान को कई विश्लेषकों ने अप्रत्यक्ष रूप से इस बात की स्वीकारोक्ति के रूप में देखा कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में सैन्य कार्रवाई की है।
कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान के प्रतिनिधि की यह प्रतिक्रिया असामान्य थी,क्योंकि भारत ने अपने बयान में सीधे तौर पर पाकिस्तान का नाम नहीं लिया था। ऐसे में प्रतिक्रिया देकर पाकिस्तान ने खुद को उस आरोप के साथ जोड़ लिया,जिससे सामान्य कूटनीतिक परंपरा के अनुसार बचा जा सकता था।
भारत के प्रतिनिधि पी. हरीश ने पाकिस्तान के लंबे बयान का संक्षिप्त लेकिन तीखा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि सुरक्षा परिषद की हर बैठक में बार-बार वही बातें दोहराई जाती हैं और इस प्रतिष्ठित संस्था का समय बर्बाद किया जाता है,यह बात सभी को पता है। उनके इस बयान को पाकिस्तान की आलोचना के रूप में देखा गया।
हरीश ने यह भी कहा कि पाकिस्तान को अपने आरोपों से पहले आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को आईने में देखकर अपनी समस्याओं को समझना चाहिए,बजाय इसके कि वह अपने देश की परेशानियों के लिए भारत को दोषी ठहराए। उनका यह बयान कूटनीतिक भाषा में पाकिस्तान को सीधा संदेश माना गया।
भारत ने इस दौरान आतंकवाद के मुद्दे को भी जोरदार तरीके से उठाया। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि आतंकवाद आज पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर खतरा बन चुका है और इससे मानवता प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि केवल अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की संयुक्त कार्रवाई के जरिए ही इस खतरे का प्रभावी तरीके से मुकाबला किया जा सकता है।
भारत ने अपने बयान में कई प्रमुख आतंकवादी संगठनों का उल्लेख भी किया। इनमें इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड द लेवांत,अल-कायदा,लश्कर-ए-तैबा और जैश-ए-मोहम्मद शामिल हैं। भारत ने कहा कि इन संगठनों और उनके सहयोगियों को सीमा पार आतंकवाद के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और उनके खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
भारतीय प्रतिनिधि ने विशेष रूप से प्रतिरोध मोर्चा का भी उल्लेख किया,जिसे लश्कर-ए-तैयबा का प्रॉक्सी संगठन माना जाता है। भारत ने कहा कि इस तरह के संगठन क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा हैं और इनके खिलाफ वैश्विक स्तर पर समन्वित कार्रवाई जरूरी है।
भारत ने इस बैठक में अफगानिस्तान के लिए अपनी मानवीय सहायता का भी विस्तार से उल्लेख किया। पी. हरीश ने कहा कि भारत पिछले कई वर्षों से अफगानिस्तान के लोगों की मदद के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। उन्होंने बताया कि पिछले साढ़े चार वर्षों में भारत ने अफगानिस्तान को 50,000 टन से अधिक गेंहूँ भेजा है। इसके अलावा लगभग 380 टन दवाइयां और वैक्सीन तथा 40,000 लीटर कीटनाशक भी भेजे गए हैं।
उन्होंने कहा कि भारत की सहायता केवल आपातकालीन राहत तक सीमित नहीं है,बल्कि शिक्षा और महिलाओं के सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी भारत सक्रिय रूप से काम कर रहा है। उनके अनुसार 2023 से अब तक लगभग 3,000 अफगान छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान की गई है,जिनमें लगभग 1,000 महिलाएँ शामिल हैं। उन्होंने यह भी बताया कि भारत अफगानिस्तान में महिलाओं के नेतृत्व वाले स्व-सहायता समूहों को आर्थिक और लॉजिस्टिक सहायता प्रदान कर रहा है।
भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी सहायता का उद्देश्य अफगानिस्तान के लोगों की मदद करना है,न कि किसी राजनीतिक या रणनीतिक लाभ के लिए काम करना। हरीश ने कहा कि भारत की मदद अफगानिस्तान के लोगों के लिए है और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस बात से भली-भांति परिचित है कि भारत ने वहाँ किस तरह का सहयोग किया है।
अपने बयान में उन्होंने खेल के क्षेत्र का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम ने हाल के वर्षों में शानदार प्रदर्शन किया है और दुनिया भर में अपने खेल से लोगों का दिल जीता है। उन्होंने कहा कि हाल ही में हुए क्रिकेट विश्व कप में टीम का जोश और जुनून देखने लायक था।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत को गर्व है कि वह अफगानिस्तान की इस यात्रा का हिस्सा रहा है। भारत ने अफगानिस्तान में खेल ढाँचे और प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी सहयोग किया है। हरीश ने कहा कि अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम की सफलता वहाँ के लोगों के लिए खुशी और उम्मीद का प्रतीक है,खासकर ऐसे समय में जब देश लंबे समय से संघर्ष और अस्थिरता का सामना कर रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र में हुई यह बहस केवल दो देशों के बीच कूटनीतिक टकराव नहीं थी,बल्कि यह दक्षिण एशिया और मध्य एशिया की व्यापक सुरक्षा स्थिति को भी दर्शाती है। अफगानिस्तान की स्थिरता,सीमा पार आतंकवाद और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन जैसे मुद्दे इस बहस के केंद्र में रहे।
इस बैठक ने यह भी दिखाया कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक भाषा और रणनीति कितनी महत्वपूर्ण होती है। भारत ने बिना किसी देश का नाम लिए अपनी चिंता और आरोपों को सामने रखा,जबकि पाकिस्तान की प्रतिक्रिया ने इस बहस को और तेज कर दिया।
फिलहाल संयुक्त राष्ट्र में यह मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के ध्यान में आ चुका है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अफगानिस्तान में जारी तनाव,सीमा पार हमलों और आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक स्तर पर क्या कदम उठाए जाते हैं और क्या इस क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के लिए कोई ठोस पहल सामने आती है।
