वाशिंगटन,13 फरवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अप्रैल 2026 में चीन यात्रा की पुष्टि कर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। व्हाइट हाउस में मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि वह चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से समिट के लिए अप्रैल में चीन जाएँगे। इसके साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रपति शी इस वर्ष के अंत में अमेरिका का दौरा करेंगे। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के शीर्ष नेताओं के बीच प्रस्तावित ये पारस्परिक दौरे ऐसे समय में हो रहे हैं,जब अमेरिका-चीन संबंध सहयोग और प्रतिस्पर्धा के जटिल दौर से गुजर रहे हैं।
मीडिया से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि वह इस यात्रा को लेकर उत्साहित हैं और शी जिनपिंग से मुलाकात का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष के अंत में जब शी अमेरिका आएँगे,तब उस मुलाकात को लेकर भी वह उत्सुक हैं। ट्रंप ने दोनों देशों के संबंधों को “स्थिर और सकारात्मक” बताते हुए कहा कि उनके और शी के बीच व्यक्तिगत संबंध बेहद अच्छे हैं। हालाँकि,उन्होंने अपने अप्रैल दौरे के स्थान या विस्तृत एजेंडे पर अधिक जानकारी साझा नहीं की। शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे की तारीख भी उन्होंने स्पष्ट नहीं की,केवल इतना कहा कि यह इस साल के आखिर में होगा।
हाल ही में दोनों नेताओं के बीच फोन पर लंबी और विस्तारपूर्ण बातचीत हुई थी। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर इस बातचीत का जिक्र करते हुए लिखा कि चर्चा कई महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित रही। उनके अनुसार बातचीत में व्यापार,सैन्य सहयोग,उनकी प्रस्तावित अप्रैल यात्रा,ताइवान का मुद्दा,रूस-यूक्रेन युद्ध,ईरान की स्थिति और ऊर्जा सहयोग जैसे विषय शामिल थे। ट्रंप ने विशेष रूप से आर्थिक मुद्दों पर जोर देते हुए बताया कि चीन द्वारा अमेरिका से ऊर्जा और कृषि उत्पादों की खरीद पर विस्तार से चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं ने चीन द्वारा अमेरिकी तेल और गैस के आयात के साथ-साथ कृषि उत्पादों की अतिरिक्त खरीद के विकल्पों पर विचार किया।
यह बयान ऐसे समय में आया है,जब अमेरिका और चीन के बीच व्यापार और तकनीक को लेकर प्रतिस्पर्धा चरम पर है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच टैरिफ,सेमीकंडक्टर निर्यात नियंत्रण और उच्च तकनीकी उपकरणों की आपूर्ति पर कड़े प्रतिबंधों को लेकर तनाव बढ़ा है। ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान आरंभ हुआ ट्रेड वॉर अब भी वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित कर रहा है। अमेरिका का चीन के साथ बड़ा ट्रेड डेफिसिट लगातार राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। ट्रंप के आलोचकों का आरोप है कि जब आयात पर टैरिफ लगाने की बात आती है,तो वह चीन के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाते हैं, जबकि समर्थकों का तर्क है कि वह व्यावहारिक कूटनीति के जरिए अमेरिकी आर्थिक हितों को साधने की कोशिश कर रहे हैं।
रणनीतिक दृष्टि से भी दोनों देशों के संबंध जटिल हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ,ताइवान को लेकर तनाव,दक्षिण चीन सागर में दावे और क्षेत्रीय गठबंधनों की सक्रियता ने प्रतिस्पर्धा को और तीखा बना दिया है। इसके बावजूद,उच्च स्तरीय राजनयिक संवाद की प्रक्रिया जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि समिट डिप्लोमेसी दोनों पक्षों के लिए जोखिम कम करने और संचार के खुले चैनल बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में ट्रंप की चीन यात्रा और शी का संभावित अमेरिका दौरा आपसी अविश्वास के माहौल में स्थिरता लाने का प्रयास माना जा रहा है।
ऊर्जा और कृषि व्यापार पर संभावित समझौते की चर्चा भी अहम है। अमेरिका लंबे समय से चीन को ऊर्जा निर्यात बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यदि चीन अमेरिकी तेल और गैस की खरीद बढ़ाता है,तो इससे अमेरिका के ऊर्जा क्षेत्र को लाभ मिल सकता है। साथ ही,कृषि उत्पादों के निर्यात में वृद्धि से अमेरिकी किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है,जो पहले ट्रेड वॉर के दौरान टैरिफ से प्रभावित हुए थे। हालाँकि,यह स्पष्ट नहीं है कि इन चर्चाओं का ठोस परिणाम क्या निकलेगा,लेकिन दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व द्वारा इस विषय पर सीधी बातचीत को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
भारत के दृष्टिकोण से भी अमेरिका-चीन संबंधों का विशेष महत्व है। गलवान घाटी की घटना के बाद भारत और चीन के बीच संबंधों में तनाव बढ़ गया था,हालाँकि,हाल के वर्षों में स्थिति में कुछ सुधार देखा गया है। दूसरी ओर,भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है,विशेषकर रक्षा,तकनीक और इंडो-पैसिफिक सहयोग के क्षेत्र में। ऐसे में यदि अमेरिका और चीन के बीच संबंधों में स्थिरता आती है,तो इसका असर पूरे एशिया,खासकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीतिक समीकरणों पर पड़ेगा।
पिछले दशक में अमेरिका-चीन संबंध सहयोग और टकराव के बीच झूलते रहे हैं। आर्थिक रूप से दोनों देश एक-दूसरे पर निर्भर हैं,लेकिन रणनीतिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धा ने रिश्तों को जटिल बना दिया है। सेमीकंडक्टर,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और 5जी तकनीक जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से वैश्विक सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा है। अमेरिका ने उन्नत चिप तकनीक के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए हैं,जबकि चीन ने आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम तेज किए हैं। ऐसे माहौल में शीर्ष स्तर पर बातचीत को तनाव कम करने का एक प्रयास माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की चीन यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगी,बल्कि इसका असर वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी पड़ेगा। रूस-यूक्रेन युद्ध,ईरान का परमाणु कार्यक्रम और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य संतुलन जैसे मुद्दों पर अमेरिका और चीन की भूमिका निर्णायक है। यदि दोनों देश कुछ साझा समझ विकसित करते हैं,तो इससे वैश्विक स्थिरता को बल मिल सकता है।
हालाँकि,यह भी सच है कि प्रतिस्पर्धा के मूल कारण अभी समाप्त नहीं हुए हैं। व्यापार असंतुलन,तकनीकी श्रेष्ठता की दौड़ और रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र को लेकर मतभेद बरकरार हैं। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तावित समिट में किन मुद्दों पर ठोस प्रगति होती है और किन पर मतभेद बने रहते हैं। फिलहाल इतना तय है कि अप्रैल 2026 की यह यात्रा वैश्विक कूटनीति की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक होगी,जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी रहेंगी।
