लंदन, 8 नवंबर (युआईटीवी/आईएएनएस)| कोविड-19 टीकाकरण अभियान की सफलता के बावजूद महामारी की शुरुआत के बाद से लोगों का टीकों पर भरोसा काफी कम हो गया था। ब्रिटेन के पोर्ट्समाउथ विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने टीकाकरण के प्रति लोगों के दृष्टिकोण और हिचकिचाहट का कारण जानने के लिए दो सर्वेक्षण कर यह निष्कर्ष निकला। दो सर्वेक्षणों में कुल मिलाकर 1,000 से अधिक वयस्कों की प्रतिक्रियाओं की तुलना कर उन्होंने पाया कि महामारी के बाद के समूह को महामारी से पहले टीकों पर बहुत कम भरोसा था।
मेडिकल जर्नल वैक्सीन में प्रकाशित पेपर ने खुलासा किया कि चार प्रतिभागियों में से लगभग एक ने 2020 के बाद से आत्मविश्वास में गिरावट की सूचना दी और यह प्रतिभागियों की उम्र, लिंग, धार्मिक विश्वास, शिक्षा और जातीयता की परवाह किए बिना देखा गया।
पोर्ट्समाउथ विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज के एसोसिएट हेड डॉ. एलेसेंड्रो सियानी ने कहा, “वैक्सीन लेने में झिझक कोई नई घटना नहीं है, लेकिन कोविड-19 के टीकों को उनकी सुरक्षा और प्रभावशीलता के भारी वैज्ञानिक प्रमाण के बावजूद कम भरोसा देखा गया।”
दोनों सर्वेक्षणों में धार्मिक विश्वास रखने वाले प्रतिभागी नास्तिक और अ™ोयवादी लोगों की तुलना में काफी अधिक टीका-झिझक वाले थे और अश्वेत व एशियाई पृष्ठभूमि के व्यक्ति श्वेत जातीयता से संबंधित लोगों की तुलना में अधिक झिझक रहे थे।
टीके पर भरोसे का स्त्री-पुरुष भेद के साथ कोई संबंध नहीं देखा गया। ये समग्र रुझान दो सर्वेक्षणों के बीच काफी हद तक समान रहे, महामारी के बाद के सर्वेक्षण में हालांकि कुछ उल्लेखनीय बदलाव देखे गए।
उदाहरण के लिए, जबकि 2019 में मध्यम आयु वर्ग के प्रतिभागी युवा समूहों की तुलना में टीकाकरण के बारे में काफी अधिक आशंकित थे, 2022 के सर्वेक्षण में ऐसा नहीं था।
सियानी ने कहा, “ऐसा इसलिए हो सकता है, क्योंकि कोविड-19 का संक्रमण पुराने रोगियों में अधिक गंभीर परिणाम देता है।”
अध्ययन के क्रम में शोधकर्ताओं ने नोट किया कि लोगों में यह धारणा जरूर बनी कि वैक्सीन नहीं लेने से वे कोविड-19 महामारी का शिकार बन सकते हैं।
