झारखंड हाईकोर्ट (तस्वीर क्रेडिट@rashtra_press)

ईडी बनाम राज्य पुलिस: झारखंड हाईकोर्ट ने राँची पुलिस की जाँच पर लगाई रोक,केंद्रीय एजेंसी के कामकाज में बाधा पर जताई चिंता

राँची,16 जनवरी (युआईटीवी)- झारखंड हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपी संतोष कुमार के साथ ईडी कार्यालय में कथित मारपीट के मामले में राँची पुलिस की जाँच पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। यह महत्वपूर्ण आदेश जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से दायर क्रिमिनल रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जाँच के नाम पर किसी केंद्रीय एजेंसी के कामकाज में बाधा नहीं डाली जा सकती और मौजूदा परिस्थितियों में राज्य पुलिस की कार्रवाई से ईडी जैसी केंद्रीय जाँच एजेंसी की कार्यप्रणाली प्रभावित होने की आशंका है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में माना कि जिस तरह से राँची पुलिस ने ईडी कार्यालय से जुड़े मामले में कदम उठाए,उससे केंद्रीय एजेंसी के स्वतंत्र और निष्पक्ष कामकाज पर असर पड़ सकता है। इसी आधार पर अदालत ने राँची पुलिस की जाँच पर अंतरिम रोक लगा दी। साथ ही,अदालत ने राज्य सरकार को इस मामले में सात दिनों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। वहीं, ईडी अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने वाले प्रतिवादी संतोष कुमार को दस दिनों के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा गया है। मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी को तय की गई है।

अदालत ने केवल जाँच पर रोक लगाने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा,बल्कि ईडी कार्यालय की सुरक्षा को लेकर भी अहम निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि ईडी कार्यालय की सुरक्षा की जिम्मेदारी सीआईएसएफ,बीएसएफ या किसी अन्य उपयुक्त अर्धसैनिक बल को सौंपी जाए। इसके अतिरिक्त,एसएसपी राँची को भी ईडी कार्यालय की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है,ताकि भविष्य में किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके। कोर्ट ने ईडी को यह भी निर्देश दिया कि वह अपने कार्यालय से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखे,ताकि जरूरत पड़ने पर तथ्यों की निष्पक्ष जाँच की जा सके।

हाईकोर्ट के इस आदेश से ईडी के उन दो अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है,जिनके खिलाफ राँची के एयरपोर्ट थाना में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। अदालत ने प्रथम दृष्टया यह माना कि पुलिस की ओर से की जा रही कार्रवाई से केंद्रीय एजेंसी के अधिकारी दबाव में आ सकते हैं और इससे जाँच प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। कोर्ट की टिप्पणी को केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों के संतुलन के संदर्भ में भी अहम माना जा रहा है।

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में जाएँ तो मामला तब शुरू हुआ,जब प्रवर्तन निदेशालय ने गुरुवार को झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर कर रांची स्थित अपने कार्यालय में झारखंड पुलिस द्वारा की गई जाँच और कथित छापेमारी जैसी कार्रवाई को चुनौती दी। ईडी की ओर से दाखिल याचिका में माँग की गई कि पूरे मामले की जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई से कराई जाए। इसके साथ ही राँची के एयरपोर्ट थाना में दर्ज एफआईआर को निरस्त करने और राज्य पुलिस की जाँच पर रोक लगाने का भी आग्रह किया गया।

ईडी ने अपनी याचिका में यह तर्क दिया कि केंद्रीय जाँच एजेंसी के खिलाफ राज्य पुलिस की इस तरह की कार्रवाई न केवल अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है,बल्कि इससे संवेदनशील जाँचों पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। ईडी का कहना था कि यदि हर राज्य पुलिस केंद्रीय एजेंसियों के कामकाज में इस तरह हस्तक्षेप करेगी,तो जाँच की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े होंगे।

दरअसल,इस विवाद की जड़ में पेयजल स्वच्छता विभाग (पीएचईडी) के कर्मचारी और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपी संतोष कुमार द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर है। संतोष कुमार ने आरोप लगाया था कि 12 जनवरी को राँची स्थित ईडी कार्यालय में पूछताछ के दौरान उसके साथ मारपीट,दुर्व्यवहार और प्रताड़ना की गई। उसने दावा किया कि ईडी अधिकारियों ने उससे जबरन बयान दिलाने की कोशिश की और शारीरिक रूप से भी प्रताड़ित किया। इसी शिकायत के आधार पर रांची पुलिस ने एयरपोर्ट थाना में ईडी के दो अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी।

एफआईआर दर्ज होने के बाद राँची पुलिस की एक टीम ईडी कार्यालय पहुँची,ताकि मामले की जाँच की जा सके। इसी दौरान ईडी और राज्य पुलिस के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो गई। ईडी ने इसे अपने कामकाज में सीधा हस्तक्षेप बताया,जबकि राज्य पुलिस का कहना था कि वह शिकायत के आधार पर कानूनी प्रक्रिया का पालन कर रही है। इस टकराव ने केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी।

हाईकोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम पर गंभीरता से विचार करते हुए यह टिप्पणी की कि जाँच के नाम पर किसी केंद्रीय एजेंसी के कार्यालय में इस तरह की कार्रवाई स्वीकार्य नहीं है। अदालत का मानना है कि यदि राज्य पुलिस को बिना किसी संतुलन के केंद्रीय एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई की छूट दी गई,तो इससे संवैधानिक ढाँचे और संघीय व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक अंतरिम राहत नहीं है,बल्कि यह केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों की रेखा को स्पष्ट करने की दिशा में एक अहम कदम है। अदालत ने फिलहाल संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है,ताकि न तो शिकायतकर्ता के अधिकारों का हनन हो और न ही केंद्रीय एजेंसी के कामकाज में अनावश्यक बाधा आए।

अब इस मामले में सबकी नजरें 9 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। उस दिन राज्य सरकार और संतोष कुमार के जवाब के बाद अदालत आगे की दिशा तय करेगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अदालत सीबीआई जाँच की माँग पर विचार करती है या किसी अन्य स्वतंत्र तंत्र के जरिए मामले की सच्चाई सामने लाने का रास्ता चुनती है। फिलहाल,हाईकोर्ट के आदेश ने इस संवेदनशील मामले में स्थिति को स्थिर कर दिया है और केंद्रीय एजेंसी को राहत की सांस दी है।