ईडब्ल्यूएस कोटा मामला देश को जाति के आधार पर विभाजित कर रहा : याचिकाकर्ता

नई दिल्ली, 13 सितम्बर (युआईटीवी/आईएएनएस)- सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को सरकारी नौकरियों और दाखिले में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) को 10 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने के लिए 2019 में लागू किए गए 103वें संविधान संशोधन की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की।

कुछ याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले कानूनी विद्वान जी मोहन गोपाल ने प्रधान न्यायाधीश यू.यू. ललित और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी, एस. रवींद्र भट, बेला एम. त्रिवेदी, और जे.बी. पारदीवाला की पीठ से कहा कि 103 वां संशोधन संविधान पर एक धोखाधड़ी है और जमीनी सच्चाई यह है कि यह देश को जाति के आधार पर विभाजित कर रहा है।

संशोधन को सामाजिक न्याय की संवैधानिक ²ष्टि पर हमला करार देते हुए उन्होंने कहा कि उनके राज्य केरल में, उन्हें यह कहते हुए खुशी नहीं हो रही है कि सरकार ने ईडब्ल्यूएस के लिए एक आदेश जारी किया और शीर्षक ‘जाति’ था और वे सभी देश में सबसे विशेषाधिकार प्राप्त जातियां थीं।

गोपाल ने तर्क दिया कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन दो पंख हैं जिन पर आरक्षण निर्भर करता है और यदि इन्हें हटा दिया जाता है, तो यह समाप्त हो जाएगा। उन्होंने जोरदार तर्क दिया कि संशोधन लोगों के मन में संविधान की पहचान को कुछ इस तरह बदल देगा, जो कमजोरों के बजाय विशेषाधिकार प्राप्त की रक्षा करता है। उन्होंने कहा कि संरचनात्मक स्थितियां हैं, जो कुछ समुदायों को गरीब रखती हैं और शिक्षा और सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण की शुरूआत की गई थी।

संशोधन को सामाजिक न्याय की संवैधानिक ²ष्टि पर हमला बताते हुए उन्होंने कहा कि आरक्षण केवल प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है ताकि यह अवसर में समानता को न खाए, जो कि पिछड़े वर्गों की चिंता है।

गोपाल ने प्रस्तुत किया कि ईडब्ल्यूएस कोटा सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को बाहर करता है और केवल अगड़ी वर्गों को ही लाभ मिलता है, और इसके परिणामस्वरूप सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है, जो संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है।

उन्होंने कहा कि 103वां संशोधन असमान रूप से असमान व्यवहार करने के संविधान के विचार को निष्प्रभावी और बेअसर करने का प्रयास करता है, साथ ही सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के मानदंडों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग शामिल हैं। उन्होंने कहा कि आर्थिक कमजोरी के बिना सामाजिक पिछड़ापन नहीं हो सकता और वे साथ-साथ चलते हैं।

गोपाल ने तर्क दिया कि यदि यह वास्तव में एक आर्थिक आरक्षण था, तो यह गरीब लोगों को उनकी जाति के बावजूद दिया जाएगा, हालांकि, ऐसा नहीं किया गया।

उन्होंने कहा, “हमें आरक्षण में कोई दिलचस्पी नहीं है. प्रतिनिधित्व में दिलचस्पी है। अगर कोई आरक्षण से बेहतर प्रतिनिधित्व का तरीका लाता है, तो हम आरक्षण को खत्म कर देंगे ..।”

उन्होंने जोर दकर कहा कि समानता हमेशा पिछड़े वर्गों की मांग थी, न कि कुलीन वर्गों की, क्योंकि पिछड़े वर्गों को समानता की आवश्यकता थी और उन्होंने प्रतिनिधित्व मांगा है।

शीर्ष अदालत बुधवार को मामले की सुनवाई जारी रखेगी।

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