अमेरिकी हमलों की आशंकाओं के बीच ईरान-रूस की संयुक्त सैन्य कवायद (तस्वीर क्रेडिट@NoorAhmmadAFG)

अमेरिकी हमलों की आशंकाओं के बीच ईरान-रूस की संयुक्त सैन्य कवायद,मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव

वाशिंगटन,20 फरवरी (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच ईरान और रूस ने ओमान की खाड़ी और उत्तरी हिंद महासागर में संयुक्त नौसैनिक युद्धाभ्यास शुरू कर दिया है। यह कवायद ऐसे समय में हो रही है,जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनातनी चरम पर है और संभावित सैन्य टकराव की अटकलें तेज हो गई हैं। क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों की बढ़ती रफ्तार ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

ईरानी सेना की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के हवाले से चीन की समाचार एजेंसी ने बताया कि ईरान की नियमित सेना,इस्लामिक रिवोल्यूशन गार्ड्स कॉर्प्स और रूस की विशेष अभियान इकाइयों ने इस अभ्यास में हिस्सा लिया। इस दौरान एक काल्पनिक परिदृश्य के तहत हाईजैक किए गए जहाज को छुड़ाने का ऑपरेशन अंजाम दिया गया। इस अभ्यास का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा,आतंकवाद-रोधी अभियानों और रणनीतिक जलमार्गों की रक्षा में समन्वय को मजबूत करना बताया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार इस ड्रिल में ईरान का अलवंद विध्वंसक पोत,मिसाइल दागने में सक्षम युद्धपोत,हेलीकॉप्टर,लैंडिंग क्राफ्ट,विशेष ऑपरेशन टीमें और तेज गति वाली युद्ध नौकाएँ शामिल थीं। इन युद्धाभ्यासों ने संकेत दिया है कि ईरान अपनी समुद्री क्षमताओं को प्रदर्शित करने और सहयोगी देशों के साथ सामरिक तालमेल बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यह अभ्यास होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास हाल ही में हुए एक अन्य सैन्य अभ्यास के बाद आयोजित किया गया है,जिसमें रणनीतिक जलमार्ग को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया था। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग है और यहाँ किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर अंतर्राष्ट्रीय बाजारों पर पड़ सकता है।

दूसरी ओर,अमेरिका की ओर से भी सख्त संदेश सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को कहा कि ईरान के पास अपने परमाणु कार्यक्रम पर समझौता करने के लिए 10 से 15 दिन का समय है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस समयसीमा के भीतर प्रगति नहीं होती तो “बहुत बुरी चीजें” हो सकती हैं। राष्ट्रपति ने एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान यह बयान दिया और कहा कि उन्हें लगता है कि यह पर्याप्त समय है।

पिछले सप्ताह अमेरिकी प्रशासन ने दुनिया के सबसे बड़े विमानवाहक पोतों में से एक यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड को मध्य पूर्व में तैनात करने का आदेश दिया। यह पोत पहले से तैनात यूएसएस अब्राहम लिंकन और उसके साथ मौजूद गाइडेड मिसाइल विध्वंसकों को अतिरिक्त समर्थन प्रदान करेगा। इस कदम को क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य शक्ति के प्रदर्शन और संभावित कार्रवाई की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।

अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार,हाल के दिनों में मध्य पूर्व में अमेरिकी वायु और नौसैनिक शक्ति में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। कुछ समाचार माध्यमों ने सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि अमेरिकी सेना ईरान पर हमले की तैयारी कर चुकी है और यदि परमाणु वार्ता विफल होती है,तो कुछ ही हफ्तों में कार्रवाई की संभावना काफी अधिक है। एक रिपोर्ट में तो यह तक कहा गया कि हमले की संभावना 90 प्रतिशत तक हो सकती है,यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते।

सूत्रों के अनुसार संभावित सैन्य अभियान बड़े पैमाने पर और कई हफ्तों तक चल सकता है। इसे अमेरिका इजरायल के साथ मिलकर संचालित कर सकता है। इस अभियान का लक्ष्य ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाना हो सकता है। साथ ही तेहरान की नेतृत्व संरचना पर भी दबाव बनाने की रणनीति अपनाई जा सकती है। हालाँकि,अभी तक आधिकारिक रूप से किसी सैन्य कार्रवाई की पुष्टि नहीं की गई है।

इसी बीच एक प्रमुख अमेरिकी अखबार ने रिपोर्ट दी है कि राष्ट्रपति ट्रंप सीमित सैन्य हमलों के विकल्प पर विचार कर रहे हैं,ताकि ईरान को परमाणु समझौते से संबंधित माँगों को मानने के लिए मजबूर किया जा सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि शुरुआती हमले की मंजूरी दी जाती है तो यह कुछ ही दिनों में हो सकता है और इसमें चुनिंदा सैन्य तथा सरकारी ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता है। इस तरह की सीमित कार्रवाई को चेतावनी और दबाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि ईरान और रूस का संयुक्त युद्धाभ्यास केवल सैन्य अभ्यास भर नहीं है,बल्कि यह एक राजनीतिक संदेश भी है। यह संकेत देता है कि ईरान अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग नहीं है और उसके पास रणनीतिक सहयोगी मौजूद हैं। वहीं रूस के लिए भी यह पश्चिमी दबाव के खिलाफ अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का अवसर है। ओमान की खाड़ी और हिंद महासागर में इस तरह की गतिविधियाँ वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील मानी जाती हैं।

क्षेत्र में बढ़ते सैन्य जमावड़े और सख्त बयानों के बीच कूटनीतिक समाधान की संभावना पर भी नजरें टिकी हैं। यदि वार्ता सफल होती है तो तनाव कम हो सकता है,लेकिन यदि बातचीत विफल रहती है,तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सैन्य टकराव का असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर भी पड़ेगा।

इस समय मध्य पूर्व एक बार फिर वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र बना हुआ है। ईरान और रूस की संयुक्त कवायद तथा अमेरिका की बढ़ती सैन्य तैयारी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि कूटनीति आगे बढ़ती है या सैन्य विकल्प हावी होते हैं। फिलहाल,समुद्री जलमार्गों पर बढ़ती गतिविधियां और तीखे राजनीतिक बयान दुनिया की निगाहें इस क्षेत्र पर टिकाए हुए हैं।