वॉशिंगटन,7 मार्च (युआईटीवी)- अमेरिका की अर्थव्यवस्था को लेकर एक नई चिंता सामने आई है। ताजा आँकड़ों के अनुसार फरवरी महीने में देश में रोजगार के अवसरों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। यह आँकड़ें अमेरिकी सरकार की प्रमुख एजेंसी अमेरिकी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो द्वारा जारी किए गए हैं,जिनसे संकेत मिलता है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का श्रम बाजार धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक फरवरी में अमेरिका में कुल 92,000 नौकरियाँ कम हो गईं,जो हाल के महीनों में रोजगार बाजार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि फरवरी में नॉनफार्म पेरोल यानी गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार के आंकड़ों में 92,000 की गिरावट दर्ज की गई। यह पिछले पाँच महीनों में तीसरी बार है,जब रोजगार के स्तर में गिरावट देखने को मिली है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार बार-बार रोजगार में कमी दर्ज होना इस बात का संकेत है कि अमेरिकी श्रम बाजार पर दबाव बढ़ रहा है। इसका असर आने वाले महीनों में व्यापक आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।
रोजगार में गिरावट के साथ ही देश में बेरोजगारी दर भी बढ़ी है। फरवरी में बेरोजगारी दर बढ़कर 4.4 प्रतिशत तक पहुँच गई है। यह आँकड़ा पिछले महीनों की तुलना में ज्यादा है और इस बात की ओर इशारा करता है कि कई प्रमुख क्षेत्रों में कंपनियाँ कर्मचारियों की संख्या घटा रही हैं। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो इससे उपभोक्ता खर्च,निवेश और उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य क्षेत्र में रोजगार में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। हेल्थकेयर सेक्टर में लगभग 28,000 नौकरियाँ कम हुईं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका एक प्रमुख कारण एक बड़े स्वास्थ्य बीमा प्रदाता कंपनी में हुई लंबी हड़ताल रही,जिसके कारण कई संस्थानों को अपने कर्मचारियों की संख्या कम करनी पड़ी।
वैश्विक अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञों का मानना है कि श्रम बाजार में यह गिरावट अचानक नहीं आई है,बल्कि पिछले कुछ समय से इसके संकेत मिल रहे थे। अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थान पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में नॉनरेजिडेंट सीनियर फेलो गैरी क्लाइड ने कहा कि वह लंबे समय से अमेरिकी श्रम बाजार में कमजोरी की आशंका जता रहे थे। उनके अनुसार अब वह स्थिति धीरे-धीरे स्पष्ट होती दिखाई दे रही है। हालाँकि,उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल किसी बड़े आर्थिक संकट की आशंका नहीं है,लेकिन आने वाले महीनों में रोजगार वृद्धि की रफ्तार धीमी रह सकती है।
गैरी क्लाइड के मुताबिक अमेरिकी अर्थव्यवस्था के सामने सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की परिस्थितियाँ मौजूद हैं। एक तरफ टैक्स और टैरिफ से जुड़े रिफंड आर्थिक गतिविधियों को सहारा दे सकते हैं,वहीं दूसरी ओर ऊर्जा की बढ़ती कीमतें उद्योगों और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं। यदि ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहती है तो इससे उत्पादन लागत और महंगाई दोनों पर असर पड़ सकता है।
इस बीच कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि फरवरी के कमजोर रोजगार आँकड़ों के पीछे मौसम का भी बड़ा योगदान हो सकता है। आर्थिक एवं नीति अनुसंधान केंद्र के सह-संस्थापक डीन बेकर का कहना है कि फरवरी में अमेरिका के कई हिस्सों में रिकॉर्ड स्तर की बर्फबारी और बेहद ठंडे मौसम ने आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया। खराब मौसम के कारण कई उद्योगों में कामकाज प्रभावित हुआ, जिसका असर रोजगार के आँकड़ों पर पड़ा।
डीन बेकर के अनुसार रेस्टोरेंट उद्योग में लगभग 30,000 नौकरियाँ कम हुईं। खराब मौसम की वजह से कई शहरों में रेस्तरां और आतिथ्य से जुड़े कारोबार प्रभावित हुए,जिससे कर्मचारियों की संख्या घटानी पड़ी। इसी तरह निर्माण क्षेत्र यानी कंस्ट्रक्शन सेक्टर में भी लगभग 11,000 नौकरियाँ कम हो गईं। कंस्ट्रक्शन उद्योग मौसम पर काफी हद तक निर्भर करता है,इसलिए भारी बर्फबारी और ठंड के कारण कई परियोजनाएँ अस्थायी रूप से रोक दी गईं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फिलहाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था का कोई भी क्षेत्र मजबूत रोजगार वृद्धि का संकेत नहीं दे रहा है। सूचना सेवाओं यानी इन्फॉर्मेशन सर्विसेज सेक्टर में भी लगभग 11,000 नौकरियाँ कम हुई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका एक कारण तकनीकी कंपनियों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी संरचनात्मक बदलाव की प्रक्रिया भी हो सकती है। कई कंपनियाँ एआई आधारित तकनीकों को अपनाने के बाद अपने पारंपरिक कर्मचारियों की संख्या घटा रही हैं।
इसी तरह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी लगभग 12,000 नौकरियाँ कम हो गईं। उद्योग जगत का मानना है कि वैश्विक माँग में उतार-चढ़ाव और उत्पादन लागत में वृद्धि के कारण कई कंपनियाँ फिलहाल सावधानी बरत रही हैं। इसका असर भर्ती पर पड़ा है।
हालाँकि,इन नकारात्मक संकेतों के बीच एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार कर्मचारियों की औसत आय में अपेक्षा से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। औसत प्रति घंटे की कमाई महीने-दर-महीने 0.4 प्रतिशत बढ़ी है,जबकि सालाना आधार पर इसमें 3.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इससे संकेत मिलता है कि कंपनियाँ सीमित भर्ती के बावजूद मौजूदा कर्मचारियों को बनाए रखने के लिए बेहतर वेतन दे रही हैं।
अमेरिकी केंद्रीय बैंक यानी फेडरल रिजर्व प्रणाली भी इन आँकड़ों पर करीबी नजर बनाए हुए है। फेडरल रिजर्व की नीति-निर्माण प्रक्रिया में श्रम बाजार की स्थिति बेहद अहम मानी जाती है। मैरी डेली ने एक इंटरव्यू में कहा कि ताजा आँकड़ें यह दिखाते हैं कि श्रम बाजार के स्थिर होने की उम्मीद शायद कुछ ज्यादा ही आशावादी थी। उन्होंने यह भी कहा कि महँगाई अभी भी केंद्रीय बैंक के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी अतिरिक्त चिंता पैदा कर रही है।
आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा स्थिति में फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कटौती को लेकर बेहद सतर्क रुख अपनाएगा। केंद्रीय बैंक यह देखना चाहता है कि श्रम बाजार में कमजोरी अस्थायी है या फिर यह लंबी अवधि की प्रवृत्ति बन सकती है।
इसी बीच वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियाँ भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती हैं। कई विशेषज्ञ इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव का आर्थिक प्रभाव क्या हो सकता है। यदि यह संघर्ष और बढ़ता है तो वैश्विक तेल बाजार में कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन, उद्योग और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है,जिससे महँगाई और आर्थिक दबाव दोनों बढ़ सकते हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि फिलहाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह संकट में नहीं है,लेकिन रोजगार बाजार के ताजा संकेतों ने नीति-निर्माताओं और निवेशकों को सतर्क जरूर कर दिया है। आने वाले महीनों में रोजगार,महँगाई और ऊर्जा कीमतों से जुड़े आँकड़ें यह तय करेंगे कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था स्थिर रहती है या फिर धीमी गति की ओर बढ़ती है।
