मास्को,13 फरवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के नेतृत्व में गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक से ठीक पहले रूस ने इससे दूरी बनाने का संकेत दिया है। रूसी विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को स्पष्ट कर दिया कि वह 19 फरवरी को प्रस्तावित इस अहम बैठक में हिस्सा नहीं लेगा। यह बयान ऐसे समय आया है,जब वॉशिंगटन इस मंच को वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए एक नए बहुपक्षीय तंत्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। रूस के इस फैसले ने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा, “रूस आगामी बोर्ड ऑफ पीस मीटिंग में हिस्सा नहीं लेगा।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस पहल को लेकर रूस की आधिकारिक स्थिति पर अभी अध्ययन किया जा रहा है। यानी मॉस्को फिलहाल इस मंच से पूरी तरह दूरी बनाने की घोषणा नहीं कर रहा,बल्कि उसके स्वरूप,उद्देश्यों और प्रभावों का मूल्यांकन कर रहा है। रूसी समाचार एजेंसी तास के अनुसार,जखारोवा ने संकेत दिया कि रूस इस मंच के दीर्घकालिक प्रभावों और वैश्विक संतुलन पर इसके असर को गंभीरता से परख रहा है।
इससे पहले रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी कहा था कि मॉस्को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के विचार का विश्लेषण कर रहा है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिलाया था कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों सहित पश्चिम और पूर्व के कई देशों ने इस पहल पर किस प्रकार की प्रतिक्रिया दी है। लावरोव के बयान से यह संकेत मिला था कि रूस इस मंच को संयुक्त राष्ट्र जैसी मौजूदा वैश्विक संस्थाओं के विकल्प या समानांतर संरचना के रूप में देख रहा है और इसीलिए वह सतर्क रुख अपना रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि 22 जनवरी को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने संकेत दिया था कि रूस अमेरिका में फ्रीज की गई अपनी संपत्तियों में से एक अरब डॉलर तक की राशि डोनाल्ड ट्रंप की प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पहल के लिए देने पर विचार कर सकता है। पुतिन का यह बयान उस समय आया था,जब ट्रंप ने दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से इस पहल की औपचारिक शुरुआत की थी। पुतिन की उस टिप्पणी को कुछ विश्लेषकों ने एक रणनीतिक संकेत के रूप में देखा था,जिसमें रूस संभावित रूप से इस मंच के जरिए अपनी भूमिका और प्रभाव को पुनर्परिभाषित करना चाहता था,लेकिन अब पहली बैठक से दूरी बनाना यह दर्शाता है कि मॉस्को अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले महीने दावोस में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के चार्टर पर हस्ताक्षर कर इसकी आधिकारिक शुरुआत की थी। उन्होंने इसे दुनिया में चल रहे युद्धों और टकरावों को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया था। ट्रंप के अनुसार,यह मंच वैश्विक नेताओं को एक साथ लाकर युद्धविराम,संघर्ष समाधान और पुनर्निर्माण की योजनाओं की निगरानी करेगा। शुरुआत में इसका मुख्य फोकस गाजा में जारी संघर्ष और संभावित युद्धविराम योजना की निगरानी पर था,लेकिन बाद में इसके दायरे को व्यापक बनाने के संकेत दिए गए।
ट्रंप ने गाजा के भविष्य को लेकर आर्थिक पुनर्विकास की बात भी खुलकर की है। उन्होंने एक बयान में कहा था, “मैं दिल से रियल एस्टेट का आदमी हूँ और यह सब लोकेशन के बारे में है।” उन्होंने गाजा की समुद्र तटीय स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि यह इलाका विकास और निवेश के लिहाज से अपार संभावनाएँ रखता है। उनके इस बयान ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ पैदा कीं। कुछ विशेषज्ञों ने इसे व्यावहारिक आर्थिक दृष्टिकोण बताया,जबकि अन्य ने इसे संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दे को व्यावसायिक नजरिए से देखने के रूप में आलोचना की।
रूस की अनुपस्थिति इस मंच की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े कर सकती है,खासकर तब जब मॉस्को वैश्विक राजनीति में एक प्रमुख शक्ति है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य भी है। यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में रूस पहले ही पश्चिमी देशों के साथ तीखे टकराव में है और ऐसे में अमेरिका-नेतृत्व वाले किसी भी नए बहुपक्षीय मंच को लेकर उसका सतर्क रहना स्वाभाविक माना जा रहा है।
हालाँकि,यह भी संभव है कि रूस भविष्य में इस मंच से जुड़ने या सहयोग के किसी सीमित प्रारूप पर विचार करे,यदि उसे अपने हितों की रक्षा और वैश्विक संतुलन बनाए रखने की गारंटी मिलती है। फिलहाल 19 फरवरी को होने वाली पहली बैठक पर दुनिया की नजरें टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि किन-किन देशों की भागीदारी होती है और क्या ‘बोर्ड ऑफ पीस’ वास्तव में एक प्रभावी वैश्विक मध्यस्थ मंच के रूप में उभर पाता है या यह भी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की जटिलताओं में उलझ कर रह जाता है।
