नई दिल्ली,21 जनवरी (युआईटीवी)- भारतीय मूल की दिग्गज अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स ने अपने असाधारण अंतरिक्ष सफर को औपचारिक विराम दे दिया है। 27 साल के लंबे,प्रेरणादायक और ऐतिहासिक करियर के बाद उन्होंने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा से रिटायरमेंट ले लिया है। उनका रिटायरमेंट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) पर नौ महीने के एक अभूतपूर्व मिशन के बाद हुआ,जिसने न सिर्फ तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टि से,बल्कि मानवीय सहनशक्ति और नेतृत्व क्षमता के लिहाज से भी नई मिसाल कायम की। नासा के आधिकारिक बयान के मुताबिक,सुनीता विलियम्स 27 दिसंबर 2025 को एजेंसी से सेवानिवृत्त हो गईं।
नासा ने उनके रिटायरमेंट की घोषणा करते हुए उन्हें ह्यूमन स्पेसफ्लाइट की “ट्रेलब्लेजर” बताया। नासा एडमिनिस्ट्रेटर जेरेड इसाकमैन ने कहा कि सुनीता विलियम्स ने स्पेस स्टेशन पर अपने नेतृत्व के जरिए अंतरिक्ष अन्वेषण के भविष्य को आकार दिया और लो अर्थ ऑर्बिट में कमर्शियल मिशनों के लिए रास्ता तैयार किया। उनके मुताबिक,विज्ञान और तकनीक को आगे बढ़ाने में सुनीता के योगदान ने चंद्रमा पर प्रस्तावित आर्टेमिस मिशन और भविष्य में मंगल ग्रह की ओर बढ़ने की मानव आकांक्षा की मजबूत नींव रखी है। नासा ने अपने संदेश में यह भी कहा कि उनकी असाधारण उपलब्धियाँ आने वाली पीढ़ियों को बड़े सपने देखने और असंभव की सीमाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करती रहेंगी।
सुनीता विलियम्स का जीवन और करियर वैश्विक नागरिकता और बहुसांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। उनका जन्म यूक्लिड,ओहायो में हुआ था,लेकिन वह नीडहम,मैसाचुसेट्स को अपना होमटाउन मानती हैं। उनके पिता दीपक पांड्या एक प्रतिष्ठित न्यूरोएनाटोमिस्ट हैं,जिनका जन्म गुजरात के मेहसाणा जिले के झूलासन गाँव में हुआ था। बाद में वे अमेरिका चले गए और वहाँ बोनी पांड्या से विवाह किया,जो स्लोवेनियाई मूल की हैं। इस तरह सुनीता विलियम्स की पहचान भारतीय,अमेरिकी और यूरोपीय संस्कृतियों के संगम के रूप में उभरी,जिसने उन्हें दुनिया भर में खास बना दिया।
अंतरिक्ष के बाहर भी सुनीता विलियम्स का जीवन उतना ही सक्रिय और जमीनी रहा है। अपने पति माइकल के साथ उन्हें कुत्तों के साथ समय बिताना,फिटनेस पर काम करना,घरों की मरम्मत और रेनोवेशन,कारों और हवाई जहाजों पर काम करना,साथ ही हाइकिंग और कैंपिंग जैसी आउटडोर गतिविधियाँ बेहद पसंद हैं। यह जीवनशैली उनकी उस मानसिक और शारीरिक मजबूती को दर्शाती है,जो अंतरिक्ष जैसे चुनौतीपूर्ण माहौल में काम करने के लिए जरूरी होती है।
सुनीता विलियम्स के अंतरिक्ष करियर की शुरुआत 9 दिसंबर 2006 को हुई,जब उन्होंने एसटीएस-116 मिशन के तहत स्पेस शटल डिस्कवरी से उड़ान भरी। यह मिशन उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसके बाद वह एसटीएस-117 क्रू के साथ स्पेस शटल अटलांटिस से पृथ्वी पर लौटीं। एक्सपीडिशन 14 और 15 के दौरान उन्होंने फ्लाइट इंजीनियर के रूप में काम किया और उस समय के रिकॉर्ड चार स्पेसवॉक पूरे किए। इन स्पेसवॉक के दौरान उन्होंने जटिल तकनीकी कार्यों को अंजाम दिया और अपने बेहतरीन तकनीकी कौशल,धैर्य और शारीरिक सहनशक्ति का परिचय दिया।
2012 में सुनीता विलियम्स ने एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की,जब वह एक्सपीडिशन 32 और 33 के तहत 127 दिनों के मिशन पर कजाकिस्तान के बैकोनूर कॉस्मोड्रोम से अंतरिक्ष के लिए रवाना हुईं। इस मिशन के दौरान उन्हें एक्सपीडिशन 33 की कमांडर नियुक्त किया गया,जिससे वह आईएसएस का नेतृत्व करने वाली चुनिंदा महिलाओं में शामिल हो गईं। कमांडर के रूप में उनकी भूमिका बेहद चुनौतीपूर्ण थी। इस दौरान उन्होंने एक लीक हो रहे स्टेशन रेडिएटर की मरम्मत और एक जरूरी पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपोनेंट को बदलने जैसे अहम कार्यों के लिए तीन स्पेसवॉक किए। यह मिशन उनके नेतृत्व और तकनीकी दक्षता का बड़ा प्रमाण बना।
उनका तीसरा और सबसे लंबा मिशन जून 2024 में शुरू हुआ,जिसने उन्हें एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में ला दिया। सुनीता विलियम्स और उनके साथी अंतरिक्ष यात्री बुच विल्मोर नासा के क्रू फ्लाइट टेस्ट मिशन के तहत बोइंग के स्टारलाइनर स्पेसक्राफ्ट से अंतरिक्ष गए। यह मिशन मूल रूप से कम समय के लिए निर्धारित था,लेकिन तकनीकी कारणों से इसे बढ़ाकर पूरे नौ महीने कर दिया गया। इस दौरान दोनों एक्सपीडिशन 71 और 72 का हिस्सा बने और मार्च 2025 में सुरक्षित पृथ्वी पर लौटे। इस मिशन पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं,क्योंकि स्टारलाइनर से जुड़ी तकनीकी चुनौतियों के कारण सुनीता और उनके साथी को अपेक्षा से कहीं ज्यादा समय तक स्पेस स्टेशन पर रहना पड़ा।
इस लंबे प्रवास ने न सिर्फ उनकी मानसिक मजबूती की परीक्षा ली,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग,संकट प्रबंधन और वैज्ञानिक अनुसंधान की दृष्टि से भी अहम अनुभव प्रदान किया। यह मिशन मानव अंतरिक्ष उड़ानों में कमर्शियल स्पेसक्राफ्ट की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।
अंतरिक्ष मिशनों के अलावा,सुनीता विलियम्स ने एस्ट्रोनॉट ट्रेनिंग और ऑपरेशंस के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। 2002 में उन्होंने नासा के एनईईएमओ प्रोग्राम में हिस्सा लिया,जिसके तहत वह नौ दिनों तक पानी के भीतर एक अंडरवॉटर हैबिटेट में रहीं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य अंतरिक्ष जैसे अलग-थलग और चुनौतीपूर्ण माहौल में मानव व्यवहार और टीमवर्क का अध्ययन करना था। इसके बाद उन्होंने नासा के एस्ट्रोनॉट ऑफिस की डिप्टी चीफ और रूस के स्टार सिटी में ऑपरेशन डायरेक्टर के तौर पर भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाईं।
हाल के वर्षों में सुनीता विलियम्स ने भविष्य में चंद्रमा पर लैंडिंग के लिए हेलीकॉप्टर ट्रेनिंग प्रोग्राम विकसित करने में भी अहम भूमिका निभाई। यह पहल नासा के दीर्घकालिक लक्ष्यों,खासकर आर्टेमिस मिशन के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
आँकड़ों के लिहाज से भी सुनीता विलियम्स का करियर असाधारण रहा है। वह अमेरिका की सबसे लंबी सिंगल स्पेसफ्लाइट की सूची में छठे स्थान पर हैं,जहाँ वह अपने साथी बुच विल्मोर के बराबर हैं। दोनों ने नासा के बोइंग स्टारलाइनर और स्पेसएक्स क्रू-9 मिशन के दौरान कुल 286 दिन अंतरिक्ष में बिताए। सुनीता ने कुल 62 घंटे और 6 मिनट के नौ स्पेसवॉक पूरे किए हैं,जो किसी भी महिला अंतरिक्ष यात्री के लिए सबसे ज्यादा हैं। इस उपलब्धि के साथ वह नासा की ऑल-टाइम स्पेसवॉक लिस्ट में चौथे स्थान पर हैं।
इसके अलावा,सुनीता विलियम्स एक और अनोखी उपलब्धि के लिए जानी जाती हैं—वह अंतरिक्ष में मैराथन दौड़ने वाली पहली इंसान थीं। यह उपलब्धि न सिर्फ शारीरिक फिटनेस,बल्कि मानव क्षमता की सीमाओं को चुनौती देने का प्रतीक बनी।
27 साल के इस शानदार सफर के बाद सुनीता विलियम्स की विदाई सिर्फ एक रिटायरमेंट नहीं,बल्कि अंतरिक्ष अन्वेषण के एक स्वर्णिम अध्याय का समापन है। उन्होंने विज्ञान,तकनीक,नेतृत्व और मानवीय साहस के जरिए जो विरासत छोड़ी है,वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। भारत और अमेरिका दोनों के लिए वह गर्व का विषय हैं और वैश्विक अंतरिक्ष इतिहास में उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा।
