नई दिल्ली,23 जनवरी (युआईटीवी)- ग्रीनलैंड को लेकर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में इन दिनों जबरदस्त हलचल देखने को मिल रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि वह ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनते देखना चाहते हैं। ट्रंप के इस बयान के बाद जहां डेनमार्क ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है,वहीं अब इस पूरे मामले में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की एंट्री ने भू-राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। पुतिन ने ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच चल रहे विवाद पर टिप्पणी करते हुए डेनमार्क के औपनिवेशिक इतिहास पर सवाल खड़े किए हैं और इस द्वीप की संभावित कीमत तक का जिक्र कर दिया है।
बुधवार को क्रेमलिन में रूस की नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की बैठक के दौरान राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि डेनमार्क ने हमेशा ग्रीनलैंड के साथ एक कॉलोनी जैसा व्यवहार किया है। पुतिन के शब्दों में, “अगर बहुत नरमी से न कहें तो डेनमार्क का रवैया ग्रीनलैंड के प्रति काफी सख्त और औपनिवेशिक रहा है।” पुतिन का यह बयान ऐसे समय पर आया है,जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुले तौर पर ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की बात कह रहे हैं और इस मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाएँ तेज हो गई हैं।
हालाँकि,पुतिन ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड को लेकर चल रहे इस पूरे विवाद से रूस का कोई सीधा सरोकार नहीं है। उन्होंने कहा कि यह अमेरिका और डेनमार्क के बीच का मामला है और रूस इसमें दखल देने का इच्छुक नहीं है। पुतिन ने कहा, “यह निश्चित रूप से हमारी चिंता का विषय नहीं है। मुझे लगता है कि वे इसे आपस में सुलझा लेंगे।” इसके बावजूद,पुतिन की टिप्पणी को केवल तटस्थ बयान के तौर पर नहीं देखा जा रहा है,क्योंकि उन्होंने डेनमार्क के इतिहास और अमेरिका की खरीद-फरोख्त की नीति का उदाहरण देकर इस बहस को एक नया आयाम दे दिया है।
रूसी राष्ट्रपति ने इतिहास का हवाला देते हुए याद दिलाया कि अमेरिका इससे पहले भी बड़े भूभाग खरीद चुका है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने 1867 में रूस से अलास्का खरीदा था और 1916 में डेनमार्क से कैरिबियन क्षेत्र खरीदा,जिसे आज यूएस वर्जिन आइलैंड्स के नाम से जाना जाता है। पुतिन का इशारा साफ था कि अमेरिका के लिए किसी दूसरे देश से क्षेत्र खरीदना कोई नई बात नहीं है। इसी क्रम में उन्होंने यह भी कहा कि ग्रीनलैंड की कीमत लगभग 1 बिलियन डॉलर तक हो सकती है और अमेरिका के पास इसे खरीदने की आर्थिक क्षमता है। पुतिन की इस टिप्पणी के बाद ग्रीनलैंड की संभावित ‘कीमत’ को लेकर भी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में बहस शुरू हो गई है।
पुतिन के बयान से पहले तक रूस और चीन ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर खुलकर कोई टिप्पणी नहीं की थी। यही वजह थी कि यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि कहीं महाशक्तियों के बीच इस रणनीतिक द्वीप को लेकर कोई बड़ा टकराव न हो जाए। ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति इसे आर्कटिक क्षेत्र में बेहद अहम बनाती है। यहाँ से उत्तरी अमेरिका और यूरोप दोनों पर नजर रखी जा सकती है,साथ ही आर्कटिक में उभरते नए समुद्री रास्तों और प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से भी इसका महत्व तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में पुतिन की यह पहली सार्वजनिक टिप्पणी कई मायनों में अहम मानी जा रही है।
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी इस मुद्दे पर मीडिया से बातचीत करते हुए साफ किया कि मॉस्को की ग्रीनलैंड के मामलों में हस्तक्षेप करने की कोई योजना नहीं है। लावरोव ने कहा कि रूस इस विवाद को दूर से देख रहा है और इसे अमेरिका व डेनमार्क का आंतरिक मामला मानता है। इसके बावजूद,रूस की ओर से ग्रीनलैंड की कीमत तय करने जैसी टिप्पणी को कूटनीतिक हलकों में हल्के में नहीं लिया जा रहा है।
दूसरी ओर,डेनमार्क ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के रुख पर सख्त प्रतिक्रिया दी है। दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन ने दो टूक शब्दों में कहा कि कोपेनहेगन अमेरिका को ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की इजाजत नहीं देगा। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड डेनमार्क के किंगडम का हिस्सा है और इसकी संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। डेनमार्क का यह बयान ट्रंप के उस दावे के जवाब में आया है,जिसमें उन्होंने कहा था कि ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद जरूरी है।
इतिहास की बात करें तो डेनमार्क ने 18वीं सदी में ग्रीनलैंड को अपनी कॉलोनी बनाया था। लंबे समय तक औपनिवेशिक शासन के बाद 1979 में ग्रीनलैंड को सेल्फ-गवर्नमेंट का दर्जा दिया गया,जिससे उसे आंतरिक मामलों में काफी हद तक स्वायत्तता मिल गई। हालाँकि,रक्षा और विदेश नीति जैसे अहम मसले अब भी डेनमार्क के नियंत्रण में हैं। ग्रीनलैंड की आबादी भले ही कम हो,लेकिन इसके विशाल क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों के कारण यह दुनिया की बड़ी ताकतों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
अमेरिका की ग्रीनलैंड में मौजूदगी भी कोई नई बात नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड में अपने सैनिक तैनात किए थे और उत्तर-पश्चिमी तट पर एक अहम एयरबेस स्थापित किया था,जो आज भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती सैन्य और आर्थिक गतिविधियों के बीच अमेरिका की नजर ग्रीनलैंड पर और ज्यादा टिक गई है।
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका,डेनमार्क और अब रूस के बयानों ने इस मुद्दे को वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। जहाँ ट्रंप इसे अमेरिका का हिस्सा बनाने की बात कर रहे हैं,वहीं डेनमार्क अपनी संप्रभुता पर अड़ा हुआ है। रूस भले ही खुद को इस विवाद से अलग बता रहा हो,लेकिन पुतिन की टिप्पणी ने यह साफ कर दिया है कि ग्रीनलैंड का भविष्य केवल एक द्विपक्षीय मुद्दा नहीं रह गया है,बल्कि यह आर्कटिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन और वैश्विक रणनीति से जुड़ा सवाल बन चुका है।
