नई दिल्ली/वाशिंगटन, 7 जुलाई (युआईटीवी)- भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर बातचीत अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है। भारत ने इस समझौते से जुड़े कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अपनी सीमाएँ स्पष्ट रूप से तय कर दी हैं। अब इस समझौते को अंतिम रूप देने की ज़िम्मेदारी अमेरिका के कंधों पर है। यदि अगले कुछ दिनों में समझौता हो जाता है,तो इसकी आधिकारिक घोषणा 9 जुलाई से पहले की जा सकती है। यही वह तारीख है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दिए गए 90-दिवसीय टैरिफ स्थगन की अवधि समाप्त हो रही है।
भारतीय सरकारी सूत्रों के अनुसार,भारत ने अपनी सीमाएँ स्पष्ट कर दी हैं,खासकर कृषि और डेयरी सेक्टर को लेकर और अब अमेरिका को तय करना है कि वह भारत की इन सीमाओं को स्वीकार करता है या नहीं। अमेरिका यदि लचीलापन दिखाता है, तो यह समझौता जल्द मूर्त रूप ले सकता है।
भारत और अमेरिका के बीच इस साल फरवरी में द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए ) को लेकर बातचीत की शुरुआत हुई थी। दोनों देशों ने बीटीए के पहले चरण को शरद ऋतु (सितंबर-अक्टूबर) तक पूरा करने का लक्ष्य रखा था। इससे पहले,दोनों पक्ष एक “अंतरिम व्यापार समझौते” पर काम कर रहे हैं,ताकि लंबी अवधि के व्यापार रिश्तों की बुनियाद मजबूत की जा सके।
2 अप्रैल को अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 26 प्रतिशत का अतिरिक्त जवाबी शुल्क लगाया था,लेकिन इसे 90 दिनों के लिए निलंबित कर दिया गया। यह छूट 9 जुलाई को समाप्त हो रही है। साथ ही,अमेरिका द्वारा लगाए गए 10 प्रतिशत मूल शुल्क अभी भी प्रभावी हैं।
भारत चाहता है कि इस समझौते के जरिए उसे 26 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क से स्थायी राहत मिले। एक सरकारी अधिकारी के मुताबिक,“अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका द्वारा लगाए गए ये जवाबी शुल्क फिर से प्रभाव में आ जाएँगे,जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।”
भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में कहा था कि भारत कभी भी किसी व्यापार समझौते को सिर्फ समयसीमा के दबाव में आकर नहीं करेगा। उन्होंने दोहराया कि भारत केवल उसी समझौते को स्वीकार करेगा,जो राष्ट्रीय हितों में हो और देश की आर्थिक सुरक्षा से समझौता न करता हो।
उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) तभी संभव है,जब यह दोनों पक्षों के लिए फायदे का सौदा हो।
भारत ने विशेष रूप से कृषि और डेयरी उत्पादों पर अमेरिका को किसी प्रकार की शुल्क रियायत देने से इनकार कर दिया है। ये दोनों क्षेत्र भारत के लिए अत्यंत संवेदनशील और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। भारत का यह भी कहना है कि उसने अब तक किसी भी व्यापार समझौते में अपने डेयरी सेक्टर को नहीं खोला है और यह परंपरा इस बार भी बनी रहेगी।
भारतीय किसानों और डेयरी उत्पादकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए,भारत ने अमेरिका को स्पष्ट संकेत दिया है कि वह इन क्षेत्रों में कोई छूट नहीं देगा। हालाँकि,अमेरिका चाहता है कि भारत इन क्षेत्रों में अमेरिकी उत्पादों को आसान पहुँच दे,लेकिन भारत का यह रुख इस समझौते में सबसे बड़ा अवरोधक बना हुआ है।
भारत और अमेरिका के बीच इस्पात और एल्युमीनियम पर लगने वाले 50 प्रतिशत तक के शुल्क और वाहनों पर 25 प्रतिशत टैक्स को लेकर भी मतभेद हैं। भारत चाहता है कि अमेरिका इन क्षेत्रों में भी रियायतें दे,जबकि अमेरिका का ध्यान भारत से कृषि और डेयरी उत्पादों पर शुल्क घटवाने पर है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि अमेरिका कुछ देशों को पत्र भेजने वाला है,जिनमें जवाबी टैरिफ दरों का विवरण दिया जाएगा। ये पत्र 10-12 देशों को भेजे जाएँगे और पूरी प्रक्रिया 9 जुलाई तक पूरी की जा सकती है। इसका स्पष्ट संकेत यह है कि अगर कोई समझौता नहीं हुआ,तो टैरिफ छूट वापस ली जा सकती है।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंध पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़े हैं, लेकिन इसके साथ ही व्यापार घाटा,बाजार पहुँच,बौद्धिक संपदा अधिकार और नीतिगत पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर मतभेद भी गहराए हैं।
भारत की “मेक इन इंडिया” नीति और अमेरिका की “अमेरिका फर्स्ट” रणनीति कभी-कभी टकराव की स्थिति भी पैदा करती है,लेकिन दोनों ही देश जानते हैं कि द्विपक्षीय व्यापार और निवेश सहयोग को मजबूत करना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी जरूरी है।
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौता अब एक नाजुक मोड़ पर है। भारत ने जहाँ अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए कृषि और डेयरी जैसे क्षेत्रों में अपनी सीमाएँ तय कर दी हैं,वहीं अब अमेरिका को यह तय करना है कि वह इस लचीलेपन को किस रूप में स्वीकार करता है।
9 जुलाई तक की समयसीमा बहुत महत्वपूर्ण है। यदि इस अवधि में समझौता हो जाता है तो यह भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक नई शुरुआत साबित हो सकता है। अन्यथा, टैरिफ की तलवार फिर से लटक सकती है और दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव और बढ़ सकता है।
