कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (तस्वीर क्रेडिट@GunstPhilip)

भारत–कनाडा संबंधों को मिल सकता है नया आयाम,मार्क कार्नी का प्रस्तावित दौरा बनेगा संरचित विस्तार का आधार: रिपोर्ट

नई दिल्ली,13 फरवरी (युआईटीवी)- भारत और कनाडा भले ही भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से दूर हों और किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन का हिस्सा न हों,लेकिन दोनों देशों के बीच आर्थिक पूरकता,ऊर्जा सहयोग और वैश्विक शासन से जुड़े साझा हितों ने दशकों से संबंधों को मजबूती दी है। एक हालिया रिपोर्ट में यह आकलन किया गया है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहे तो आने वाले दशक में भारत–कनाडा संबंध राजनीतिक उतार-चढ़ाव से आगे बढ़कर निवेश, ऊर्जा, आपूर्ति श्रृंखला और लोगों के बीच संपर्कों पर अधिक केंद्रित होंगे। यह विश्लेषण पूर्व राजनयिक संजय कुमार वर्मा ने ‘इंडिया नैरेटिव’ में प्रकाशित अपने लेख में प्रस्तुत किया है।

वर्मा के अनुसार, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का आगामी हफ्तों में प्रस्तावित भारत दौरा द्विपक्षीय संबंधों को स्थिरता के मौजूदा चरण से आगे बढ़ाकर एक संरचित और संस्थागत विस्तार की दिशा में ले जा सकता है। उनके मुताबिक इस यात्रा के दौरान व्यापार ढाँचे,निवेश प्रवाह और दीर्घकालिक ऊर्जा एकीकरण जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान केंद्रित रहने की संभावना है। यह दौरा दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली और व्यावहारिक सहयोग को नया आधार प्रदान कर सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते के लिए ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ को अंतिम रूप देने की दिशा में प्रगति दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को संस्थागत रूप देने का महत्वपूर्ण कदम होगा। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है,तो व्यापार और निवेश के लिए स्पष्ट और पूर्वानुमेय ढाँचा तैयार किया जा सकेगा। वर्तमान में कनाडा में भारतीय फार्मास्यूटिकल्स,डिजिटल सेवाओं,इंजीनियरिंग उत्पादों और परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों की माँग बढ़ रही है। नियामकीय सहूलियतों में वृद्धि से भारतीय निर्यातकों को बड़ा बाजार मिल सकता है।

इसके बदले में भारत भी ऊर्जा संसाधन,पोटाश,दालें,लकड़ी और उन्नत कृषि प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में कनाडाई निर्यात के लिए अपने बाजार को और अधिक खोल सकता है। कनाडा की संस्थागत पूँजी पहले से ही भारतीय अवसंरचना और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में प्रमुख विदेशी निवेश स्रोतों में शामिल है। पेंशन फंड और दीर्घकालिक निवेशकों की भागीदारी ने भारत में हरित ऊर्जा और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को गति दी है। एक संगठित व्यापार ढाँचा अगले दशक में द्विपक्षीय व्यापार को मौजूदा स्तर से दोगुना तक बढ़ाने की क्षमता रखता है,बशर्ते शुल्क,नियामकीय और गतिशीलता संबंधी बाधाओं में क्रमिक कमी लाई जाए।

ऊर्जा सहयोग दोनों देशों के रिश्तों का एक प्रमुख स्तंभ बन सकता है। रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि संरचित हाइड्रोकार्बन आपूर्ति,भारत के असैनिक परमाणु कार्यक्रम के विस्तार के लिए दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति और स्वच्छ बेसलोड ऊर्जा की जरूरतों पर बातचीत आगे बढ़ सकती है। कनाडा के पास विशाल ऊर्जा संसाधन हैं,जबकि भारत को अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए स्थिर और विविधीकृत ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता है। ऐसे में ऊर्जा साझेदारी दोनों देशों के लिए रणनीतिक लाभ का क्षेत्र बन सकती है।

इसके अलावा कृषि,उन्नत विनिर्माण,महत्वपूर्ण खनिज प्रसंस्करण,एयरोस्पेस,डिजिटल तकनीक और अगली पीढ़ी के विनिर्माण तंत्र में सहयोग की संभावनाएँ भी मजबूत दिखाई देती हैं। स्वच्छ और हरित प्रौद्योगिकी,नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण,कार्बन प्रबंधन और हाइड्रोजन वैल्यू चेन जैसे क्षेत्र भविष्य के सहयोग के नए आयाम बन सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के वैश्विक एजेंडे के बीच यह साझेदारी पर्यावरणीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक हो सकती है।

रिपोर्ट में अनुसंधान सहयोग,स्टार्टअप साझेदारी और कुशल मानव संसाधन की गतिशीलता पर भी जोर दिया गया है। भारत के पास विशाल युवा कार्यबल और तकनीकी विशेषज्ञता है,जबकि कनाडा उच्च शिक्षा और नवाचार के क्षेत्र में अग्रणी है। यदि दोनों देश शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में समन्वित नीतियाँ अपनाते हैं तो इससे दीर्घकालिक आर्थिक संबंधों को मजबूती मिलेगी।

सुरक्षा के मोर्चे पर भी सहयोग बढ़ने की संभावना जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार,दोनों देश सीमा पार आतंकवाद,खालिस्तानी नेटवर्क और कनाडा में सक्रिय भारत-विरोधी तत्वों के खिलाफ समन्वय को मजबूत कर सकते हैं। कानून प्रवर्तन और सुरक्षा एजेंसियों के बीच खुफिया साझाकरण,अवैध वित्तीय प्रवाह पर रोक और संगठित अपराध व आतंक से जुड़े नेटवर्क पर संयुक्त कार्रवाई पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है। हाल के वर्षों में सुरक्षा संबंधी मुद्दों ने दोनों देशों के रिश्तों में तनाव भी पैदा किया है,लेकिन संरचित संवाद और सहयोग से इन चुनौतियों को दूर किया जा सकता है।

बहुपक्षीय मंचों पर भी भारत और कनाडा के बीच सहयोग की गुंजाइश है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संस्थानों में सुधार,आतंकवाद-रोधी प्रयासों को मजबूत करने और वैश्विक विकास एवं सुरक्षा ढाँचे को अधिक प्रभावी बनाने के मुद्दों पर दोनों देश समान दृष्टिकोण साझा कर सकते हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता दोनों देशों को वैश्विक मंचों पर साझेदारी का आधार प्रदान करती है।

विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री कार्नी का संभावित भारत दौरा केवल प्रतीकात्मक महत्व नहीं रखेगा,बल्कि यह द्विपक्षीय संबंधों को एक अधिक व्यवस्थित और दीर्घकालिक सहयोग के चरण में प्रवेश दिला सकता है। यदि इस यात्रा के दौरान ठोस समझौते और संस्थागत तंत्र स्थापित किए जाते हैं,तो आने वाले दशक में भारत–कनाडा संबंध नई ऊँचाइयों तक पहुँच सकते हैं।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि आर्थिक पूरकता,ऊर्जा सुरक्षा,तकनीकी सहयोग और वैश्विक शासन में साझा हित भारत और कनाडा को दीर्घकालिक साझेदार बना सकते हैं। राजनीतिक मतभेदों और अस्थायी तनावों के बावजूद यदि दोनों देश व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हैं,तो उनका संबंध एक स्थायी और व्यापक रणनीतिक साझेदारी में विकसित हो सकता है। आने वाले हफ्तों में प्रस्तावित उच्चस्तरीय यात्रा इस दिशा में निर्णायक कदम साबित हो सकती है।