संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी ) (तस्वीर क्रेडिट@Quantum_akr)

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान की अध्यक्षता पर आतंकवाद को लेकर जताई कड़ी आपत्ति

संयुक्त राष्ट्र,1 जुलाई (युआईटीवी)- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में इस बार पाकिस्तान की अध्यक्षता ने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। जैसे ही पाकिस्तान ने परिषद की मासिक अध्यक्षता संभाली,भारत ने एक स्पष्ट और साहसिक रुख अपनाते हुए संयुक्त राष्ट्र में सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को पूरी शक्ति से उठाया। भारत ने न सिर्फ कड़े शब्दों में पाकिस्तान की भूमिका को उजागर किया,बल्कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे सैन्य अभियान से यह भी संदेश दिया कि वह अब किसी भी हमले का जवाब सख्ती से देगा।

भारत की यह प्रतिक्रिया हाल में हुए पहलगाम नरसंहार के बाद आई है,जिसमें पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया। भारत का मानना है कि इस हमले की जड़ें इस्लामाबाद में मौजूद हैं और यह आतंकवाद के लंबे इतिहास की एक कड़ी भर है।

इस हमले के जवाब में भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया,जो आतंकियों के ठिकानों को नष्ट करने के उद्देश्य से चलाया गया एक सीमित लेकिन प्रभावशाली सैन्य ऑपरेशन था। यह नाम “सिंदूर” प्रतीक रूप में मातृभूमि की रक्षा और शहीदों की श्रद्धांजलि को दर्शाता है।

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के अध्यक्ष बनने से ठीक एक दिन पहले,भारत ने न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के प्रवेश द्वार पर एक प्रभावशाली प्रदर्शनी ‘आतंकवाद की मानवीय कीमत’ (‘द ह्यूमन कॉस्ट ऑफ़ टेररिज्म’) आयोजित की। इस प्रदर्शनी का उद्देश्य न केवल भारत में हुए आतंकी हमलों को दिखाना था,बल्कि 9/11 जैसे वैश्विक हमलों में भी पाकिस्तान की भूमिका को रेखांकित करना था।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस प्रदर्शनी के उद्घाटन के समय कहा, “यह समय है कि दुनिया उन ताकतों के खिलाफ एकजुट हो जो आतंकवाद को बढ़ावा देती हैं। आतंकवाद कोई स्थानीय मुद्दा नहीं,बल्कि वैश्विक खतरा है।”

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मासिक अध्यक्षता एक औपचारिक पद है,जिसमें अध्यक्ष प्रक्रिया के नियमों का पालन सुनिश्चित करता है। इसमें प्रस्तावों को पेश करना,बहसों का संचालन करना और वक्ताओं को बोलने की अनुमति देना शामिल है।

इस महीने परिषद की अध्यक्षता पाकिस्तान के पास है और उसका स्थायी प्रतिनिधि असीम इफ्तिखार अहमद अधिकतर बैठकों की अध्यक्षता करेंगे। साथ ही उप-प्रधानमंत्री मोहम्मद इशाक डार जैसे वरिष्ठ नेता भी प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।

हालाँकि,अध्यक्ष पद का मतलब यह नहीं होता कि देश अपनी राजनीतिक इच्छा थोप सकता है। पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रिया,परंपराओं और सभी 15 सदस्य देशों की सहमति का पालन करना होता है।

पाकिस्तान ने परिषद की अध्यक्षता के मौके को भुनाने की कोशिश की है। वह अपने पारंपरिक मित्र चीन के साथ मिलकर परिषद में अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य चीन और रूस के साथ मिलकर पाकिस्तान ने हाल ही में एक प्रस्ताव पेश किया था,जिसमें ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों की निंदा की गई थी। हालाँकि,अमेरिका के वीटो की वजह से यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।

साथ ही,पाकिस्तान ने इजरायल-हमास संघर्ष के मुद्दे पर फिलिस्तीन का समर्थन किया और इसमें कश्मीर को जोड़ने का भी प्रयास किया,लेकिन उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।

एक और चौंकाने वाली रणनीति के तहत पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करने की मंशा जाहिर की है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम अमेरिका के साथ संबंध सुधारने और वहाँ की लॉबी को प्रभावित करने की कोशिश हो सकती है। हालाँकि,यह प्रयास कितना सफल होगा,यह कहना अभी मुश्किल है।

भारत ने पाकिस्तान की अध्यक्षता को केवल औपचारिक रूप से स्वीकार किया है, लेकिन अपने जवाब से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी आतंकवादी गतिविधि को सहन नहीं करेगा।

भारत ने कूटनीतिक मोर्चे पर संयुक्त राष्ट्र में प्रदर्शनी और प्रेस ब्रीफिंग के जरिए पाकिस्तान को घेरने की कोशिश की,जबकि सैन्य मोर्चे पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए प्रत्यक्ष कार्रवाई की।

यह दो-स्तरीय प्रतिक्रिया भारत की नई आतंकवाद विरोधी नीति को दर्शाती है, जिसमें केवल बयानबाज़ी नहीं,बल्कि जमीन पर कार्यवाही शामिल है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अध्यक्षता भले ही पाकिस्तान को मिल गई हो,लेकिन उसकी आतंकवाद को लेकर भूमिका आज भी वैश्विक चिंता का विषय है। भारत ने इस मौके का इस्तेमाल वैश्विक मंच पर पाकिस्तान को घेरने और उसकी नीतियों की पोल खोलने के लिए किया है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘द ह्यूमन कॉस्ट ऑफ टेररिज्म’ जैसी पहलें यह दिखाती हैं कि भारत अब आतंकवाद के खिलाफ केवल कड़े शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस रणनीतियों और कार्रवाई से जवाब देगा।

आगामी दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत कैसे वैश्विक समर्थन हासिल करता है और क्या पाकिस्तान इस दबाव में कोई नीति परिवर्तन करता है या नहीं। फिलहाल, सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता पाकिस्तान के लिए एक राजनयिक अवसर है, लेकिन साथ ही परीक्षा की घड़ी भी।