नई दिल्ली,28 मार्च (युआईटीवी)- भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाते हुए सरकार ने स्वदेशी आर्टिलरी सिस्टम को मजबूत करने का फैसला किया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) की बैठक में थलसेना के लिए 300 स्वदेशी धनुष गन सिस्टम की खरीद को मंजूरी दे दी गई। यह निर्णय भारतीय सेना की मारक क्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूती देगा।
धनुष गन सिस्टम को भारतीय रक्षा क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है। यह 155 मिमी, 45 कैलिबर की अत्याधुनिक तोप है,जिसे स्वदेशी तकनीक के जरिए विकसित किया गया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी मारक क्षमता है,जो लगभग 40 किलोमीटर तक लक्ष्य को भेद सकती है। तुलना करें तो यह रेंज प्रसिद्ध बोफोर्स तोप से भी ज्यादा है, जिसकी मारक क्षमता करीब 27 किलोमीटर मानी जाती है। यही वजह है कि धनुष को ‘देसी बोफोर्स’ के नाम से भी जाना जाता है।
इस तोप का निर्माण गन कैरिज फैक्ट्री द्वारा किया जा रहा है,जो देश में रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में अहम भूमिका निभा रही है। धनुष प्रणाली में आधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम और बेहतर ऑटोमेशन शामिल है,जिससे यह युद्ध के मैदान में अधिक सटीकता और तेजी से काम कर सकती है।
इस नई खरीद के बाद भारतीय सेना की आर्टिलरी क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। वर्तमान में सेना में धनुष की करीब तीन रेजिमेंट शामिल हो चुकी हैं,जबकि तीन और रेजिमेंट जल्द ही शामिल होने वाली हैं। 300 नई तोपों के शामिल होने से 15 से अधिक नई रेजिमेंट तैयार की जा सकेंगी,जिससे सेना की फायरपावर कई गुना बढ़ जाएगी।
गौरतलब है कि भारतीय सेना ने 1999 के बाद से अपने आर्टिलरी आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया है। इस योजना के तहत 2027 तक करीब 2800 आधुनिक तोपों को सेना में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें विभिन्न प्रकार की आर्टिलरी प्रणालियाँ शामिल हैं,ताकि अलग-अलग भौगोलिक और सामरिक परिस्थितियों में प्रभावी तरीके से कार्रवाई की जा सके।
इस आधुनिकीकरण योजना में टोड आर्टिलरी गन,जिन्हें वाहनों के जरिए खींचा जाता है, ट्रक-माउंटेड गन,ट्रैक्ड और व्हील्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड गन तथा अल्ट्रा-लाइट होवित्जर जैसी प्रणालियाँ शामिल हैं। ये सभी सिस्टम मिलकर सेना को एक बहुआयामी और लचीली आर्टिलरी ताकत प्रदान करते हैं।
विशेष रूप से अल्ट्रा-लाइट होवित्जर तोपों का महत्व पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में काफी बढ़ जाता है। इन्हें हेलीकॉप्टर के जरिए उन स्थानों तक पहुँचाया जा सकता है,जहाँ सड़क मार्ग से पहुँचना मुश्किल होता है। भारतीय सेना पहले ही 145 एम-777 अल्ट्रा-लाइट होवित्जर तोपों को अपने बेड़े में शामिल कर चुकी है,जो उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में तैनाती के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रही हैं।
इसके अलावा,सेना के पास 100 के-9 वज्र ट्रैक्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड गन भी हैं,जो तेज गति से आगे बढ़ते हुए दुश्मन पर सटीक हमला करने में सक्षम हैं। इन आधुनिक प्रणालियों के साथ धनुष जैसी स्वदेशी तोपों का जुड़ना भारतीय सेना को और अधिक शक्तिशाली बनाएगा।
धनुष गन सिस्टम का उपयोग पहले भी ऑपरेशनल परिस्थितियों में किया जा चुका है। हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान इसकी तैनाती की गई थी,जहाँ इसने अपनी क्षमता का सफल प्रदर्शन किया। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि यह प्रणाली न केवल तकनीकी रूप से उन्नत है,बल्कि वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में भी भरोसेमंद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने से भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता मजबूत होगी। इससे न केवल विदेशी निर्भरता कम होगी,बल्कि देश के भीतर रक्षा उद्योग को भी प्रोत्साहन मिलेगा। रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और तकनीकी विकास को भी गति मिलेगी।
300 धनुष तोपों की खरीद को मंजूरी मिलना भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह कदम न केवल सेना की ताकत को बढ़ाएगा,बल्कि भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लक्ष्य को भी मजबूती प्रदान करेगा। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह प्रणाली किस तरह भारत की रक्षा रणनीति में अहम भूमिका निभाती है और देश की सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाती है।
