भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर (तस्वीर क्रेडिट @epanchjanya)

वेनेजुएला संकट पर भारत की सतर्क नजर — बातचीत से समाधान की अपील और नागरिकों के लिए अलर्ट

लक्जमबर्ग सिटी,7 जनवरी (युआईटीवी)- वेनेजुएला में हाल के दिनों में तेज़ी से बदलते राजनीतिक और सुरक्षा हालात ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस बीच,भारत ने भी अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि वह घटनाक्रम से चिंतित है और सभी पक्षों से संयम व संवाद का रास्ता अपनाने की अपील करता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मंगलवार को अपने बयान में साफ कहा कि वेनेजुएला में जो कुछ हो रहा है,वह चिंता बढ़ाने वाला है और भारत की पहली प्राथमिकता वहाँ के आम लोगों की सुरक्षा और भलाई है। यह बयान ऐसे समय आया जब देश में अमेरिकी कार्रवाई के बाद अस्थिरता बढ़ी है और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय स्थिति पर कड़ी निगरानी रखे हुए है।

जयशंकर ने बताया कि भारत वेनेजुएला के साथ अपने लंबे और सकारात्मक रिश्तों को महत्व देता है। उनका कहना था कि भारत चाहता है कि सभी पक्ष बैठकर बातचीत के जरिए ऐसा रास्ता निकालें,जिससे हिंसा और अस्थिरता को रोका जा सके और आम जनता को राहत मिले। लक्ज़मबर्ग के डिप्टी प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री जेवियर बेटेल के साथ मुलाकात के दौरान जयशंकर ने यह बात साझा की। इस बैठक में दोनों देशों ने द्विपक्षीय रिश्तों की समीक्षा की और अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर परस्पर सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की।

भारत का रुख इस बात पर ज़ोर देता है कि किसी भी संकट का दीर्घकालिक समाधान केवल संवाद और राजनीतिक सहमति के माध्यम से ही संभव है। विदेश मंत्रालय ने भी इससे पहले एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा था कि वेनेजुएला में हो रहे हालिया घटनाक्रम गहरी चिंता का विषय हैं और भारत लगातार स्थिति की निगरानी कर रहा है। मंत्रालय का कहना था कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सभी पक्ष शांति,संयम और बातचीत का रास्ता अपनाएँ।

सरकार की चिंता का एक बड़ा कारण वहाँ रहने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भी है। इसी को ध्यान में रखते हुए विदेश मंत्रालय ने शनिवार को एक एडवाइजरी जारी की,जिसमें भारतीयों को वेनेजुएला की गैर-जरूरी यात्राओं से बचने की सलाह दी गई। जो भारतीय पहले से वहाँ मौजूद हैं,उन्हें सावधानी बरतने,अनावश्यक आवाजाही कम करने और स्थानीय हालात की जानकारी नियमित रूप से लेते रहने को कहा गया। काराकास स्थित भारतीय दूतावास को चौबीसों घंटे सतर्क रखा गया है और दूतावास ने समुदाय के सदस्यों से संपर्क में रहने,निर्देशों का पालन करने और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत सूचना देने को कहा है।

यह सतर्कता ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है,जब राजधानी काराकास सहित कई हिस्सों में तनाव और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। लोगों के भीतर सुरक्षा को लेकर चिंता है और प्रशासनिक कदमों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। भारतीय दूतावास ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह हर संभव सहायता के लिए उपलब्ध रहेगा और जरूरत पड़ने पर स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर भारतीय समुदाय की मदद करेगा।

इसी बीच,वेनेजुएला में भारत के पूर्व राजदूत वाई. के. सिन्हा ने मौजूदा हालात और भारत की प्रतिक्रिया पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उनका कहना था कि नई दिल्ली का बयान “नपा-तुला” और संतुलित है। उन्होंने समझाया कि भारत को न केवल वेनेजुएला की स्थिति पर विचार करना है,बल्कि अमेरिका और अन्य प्रमुख देशों के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों का भी ध्यान रखना है। सिन्हा के अनुसार,अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने बड़े पैमाने पर अमेरिकी कार्रवाई का खुलकर समर्थन नहीं किया है। कुछ देशों—जैसे इज़राइल और अर्जेंटीना ने जरूर समर्थन के संकेत दिए,लेकिन यूरोप के कई देशों ने संयमित प्रतिक्रिया देना ही बेहतर समझा। इसके उलट,चीन और रूस ने इस कार्रवाई की कड़ी आलोचना की और इसे एक संप्रभु देश के खिलाफ आक्रामक कदम बताया।

सिन्हा ने यह भी कहा कि विदेश मंत्रालय का बयान इस बात की ओर संकेत करता है कि भारत इस चरण पर किसी को कटघरे में खड़ा करने के बजाय स्थिति को शांत करने के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है। उनका मानना है कि ऐसे संवेदनशील समय में साझा ज़िम्मेदारी यह होनी चाहिए कि तनाव को बढ़ाने वाले कदमों से बचा जाए और किसी भी समाधान को वेनेजुएला की जनता के हितों के अनुरूप ढाला जाए।

वेनेजुएला की स्थिति में नया मोड़ तब आया,जब अमेरिकी कार्रवाई के बाद पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को हिरासत में लिया गया। दोनों पर ड्रग्स और हथियारों से जुड़े आरोप लगाए गए हैं,जिनसे उन्होंने खुद को निर्दोष बताया है। यह गिरफ्तारी अमेरिकी-वेनेजुएला संबंधों को एक नए तनाव के स्तर पर ले जाती दिख रही है और इसके असर से व्यापक क्षेत्रीय राजनीति भी प्रभावित हो सकती है। ब्रुकलिन,न्यूयॉर्क स्थित मेट्रोपॉलिटन डिटेंशन सेंटर में उनकी हिरासत ने अंतर्राष्ट्रीय बहस को हवा दे दी है—क्या यह कदम लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के नाम पर उठाया गया है या फिर इससे संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय कानून से जुड़े नए सवाल खड़े होते हैं?

भारत की ओर से जारी किए गए बयानों को देखें तो स्पष्ट है कि नई दिल्ली इस पूरे मसले में किसी पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय,मानवीय दृष्टिकोण और स्थिरता को प्राथमिकता दे रही है। भारत ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि किसी भी देश में राजनीतिक मतभेदों का समाधान बाहरी हस्तक्षेप या सैन्य कार्रवाई से नहीं,बल्कि संवैधानिक प्रक्रियाओं और संवाद से होना चाहिए।

भारत और वेनेजुएला के बीच लंबे समय से ऊर्जा,व्यापार और विकास सहयोग जैसे क्षेत्रों में रिश्ते रहे हैं। तेल आयात के संदर्भ में भी वेनेजुएला भारत के लिए एक अहम साझेदार रहा है। ऐसे में भारत की चिंता सिर्फ कूटनीतिक नहीं,बल्कि आर्थिक और सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यदि वेनेजुएला में अस्थिरता लंबी खिंचती है,तो उसका असर कई देशों के साथ-साथ वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पर भी पड़ सकता है।

भारत के लिए एक और चुनौती यह है कि वह अपने अमेरिकी संबंधों को भी संतुलित रखे। अमेरिका भारत का बड़ा रणनीतिक साझेदार है—रक्षा,व्यापार,प्रौद्योगिकी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग के स्तर पर दोनों देश एक-दूसरे के करीब आए हैं। ऐसे में वेनेजुएला मसले पर कोई भी टिप्पणी बेहद सावधानी से देनी पड़ती है,ताकि न तो भारत के मूल सिद्धांतों—यानी संप्रभुता,संवाद और शांति से समझौता हो और न ही उसके महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ रिश्ते कमजोर पड़ें।

इस पृष्ठभूमि में जयशंकर का बयान यह दर्शाता है कि भारत का ध्यान मुख्य रूप से नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर केंद्रित है। यह वही नीति है जो भारत अक्सर संकटग्रस्त क्षेत्रों में अपनाता है—पहले मानवीय स्थिति का आकलन, फिर नागरिकों को सुरक्षित रखने के उपाय और समानांतर रूप से कूटनीतिक स्तर पर संवाद को बढ़ावा देना।

मौजूदा परिदृश्य में एक बड़ा सवाल यह भी है कि आगे रास्ता किस ओर जाता है। यदि वेनेजुएला में राजनीतिक तनाव और गहराता है,तो वहाँ के लोग पहले से भी बड़ी आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। पहले ही देश महँगाई,बेरोज़गारी और आपूर्ति संकटों से जूझ रहा है। ऐसे में किसी भी तरह की हिंसा या राजनीतिक टकराव आम जनता की परेशानियों को कई गुना बढ़ा सकता है। भारत की चिंता का केंद्र भी यही है कि कहीं यह संकट मानवीय त्रासदी का रूप न ले ले।

दूसरी तरफ,अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी यह मसला कई देशों की विदेश नीति के लिए कसौटी बनने जा रहा है। क्या देश अमेरिकी कार्रवाई के समर्थन में खड़े होंगे या फिर वे संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय कानून के सवाल को प्राथमिकता देंगे? अभी तक की प्रतिक्रियाएँ बताती हैं कि दुनिया स्पष्ट विभाजन की ओर नहीं बढ़ रही,बल्कि अधिकांश देश अपने शब्दों का चयन बेहद सावधानी से कर रहे हैं। भारत का संतुलित बयान इसी व्यापक वैश्विक रुख का हिस्सा है,जहाँ हर देश अपने हितों और मूल्यों के बीच सही संतुलन खोजने की कोशिश कर रहा है।

आने वाले दिनों में यह देखा जाएगा कि क्या वेनेजुएला के राजनीतिक नेतृत्व और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच किसी तरह का संवाद स्थापित हो पाता है या नहीं। यदि बातचीत का रास्ता खुलता है,तो यह तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम होगा। अन्यथा, स्थिति और जटिल हो सकती है,जिसका असर न केवल वेनेजुएला,बल्कि पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा।

फिलहाल,भारत ने अपने नागरिकों के लिए चेतावनी जारी कर दी है और दूतावास को सक्रिय मोड में रखा है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह जरूरत पड़ने पर आगे भी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी। साथ ही,वह सभी पक्षों से अपील करती है कि वे हिंसा और टकराव से बचें और बातचीत के जरिए समाधान निकालें।

इस पूरे परिदृश्य में भारत का रुख एक परिपक्व और जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी की छवि को मजबूत करता है,जहाँ वह न तो जल्दबाज़ी में फैसले लेता है और न ही किसी एक धुरी की तरफ झुकता दिखाई देता है। बल्कि,वह शांति,स्थिरता और लोगों की भलाई को केंद्र में रखकर अपनी भूमिका निभाने की कोशिश करता है। वेनेजुएला संकट के बीच यही संतुलित दृष्टिकोण आने वाले समय में कूटनीतिक पहलों की दिशा तय कर सकता है।