आईएनएसवी ‘कौंडिन्य’ की पहली विदेशी यात्रा (तस्वीर क्रेडिट@TawdeVinod)

आईएनएसवी ‘कौंडिन्य’ की पहली विदेशी यात्रा: प्राचीन समुद्री विरासत को फिर से जीता रहा है भारत

नई दिल्ली,30 दिसंबर (युआईटीवी)- भारतीय नौसेना के स्वदेशी रूप से बनाए गए पारंपरिक सिलाई वाले सेलिंग वेसल आईएनएसवी कौंडिन्य ने इतिहास के पन्नों को एक बार फिर जीवंत कर दिया है। 29 दिसंबर को गुजरात के पोरबंदर से ओमान सल्तनत के मस्कट के लिए रवाना हुआ यह जहाज केवल एक नौसैनिक अभियान नहीं,बल्कि भारत की सदियों पुरानी समुद्री परंपराओं और कारीगरी का जीवंत प्रतीक बन गया है। अपनी पहली विदेशी यात्रा पर निकलते हुए इस जहाज ने न केवल नौसेना की रचनात्मकता और तकनीकी दक्षता को प्रदर्शित किया है,बल्कि उन ऐतिहासिक समुद्री मार्गों को भी पुनर्जीवित किया है,जिन्होंने कभी भारत और अरब दुनिया के बीच व्यापार,संस्कृति और मानवीय संपर्क को आगे बढ़ाया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईएनएसवी कौंडिन्य के इस अभियान पर खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि यह देखकर प्रसन्नता होती है कि पोरबंदर से अपनी पहली यात्रा पर निकल रहा यह जहाज भारत की समृद्ध समुद्री परंपराओं का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने संदेश में इसे एक अनूठा प्रयास बताया और उन डिजाइनरों,कारीगरों,जहाज निर्माण विशेषज्ञों और भारतीय नौसेना के अधिकारियों की सराहना की,जिन्होंने अत्यंत समर्पण के साथ इस जहाज को आकार दिया। प्रधानमंत्री ने चालक दल को सुरक्षित और यादगार यात्रा की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि यह मिशन केवल वर्तमान का नहीं,बल्कि अतीत तथा भविष्य के बीच एक पुल का कार्य करेगा।

आईएनएसवी कौंडिन्य को पारंपरिक सिलाई वाली जहाज निर्माण तकनीक का उपयोग करके तैयार किया गया है—एक ऐसी विधि जिसमें लकड़ी के पैनलों को धातु की कीलों के बजाय रस्सियों और प्राकृतिक रेशों से जोड़ा जाता है। समुद्री इतिहासकार बताते हैं कि प्राचीन भारतीय नाविक इसी तरह के जहाजों का उपयोग करके हिंद महासागर में लंबी यात्राएँ करते थे और दक्षिण-पूर्व एशिया,अरब प्रायद्वीप और अफ्रीका के पूर्वी तटों तक व्यापारिक संपर्क स्थापित करते थे। इस जहाज के निर्माण में प्राकृतिक सामग्री,ऐतिहासिक दस्तावेज,पुरातात्विक अध्ययन और पुराने फोटोग्राफ जैसी बारीकियों का सहारा लिया गया,ताकि उसकी संरचना और डिजाइन यथासंभव परंपरागत रूप में ही सामने आए।

पोरबंदर से मस्कट तक की यह यात्रा उन प्राचीन समुद्री रास्तों को दोबारा जीवित करती है,जिन्होंने सदियों पहले भारतीय तटीय नगरों को ओमान और खाड़ी क्षेत्र से जोड़ा था। इन रास्तों के माध्यम से मसालों,वस्त्रों,मोतियों और कीमती पत्थरों जैसी वस्तुओं के साथ-साथ ज्ञान,संस्कृति और परंपराओं का भी आदान-प्रदान होता था। इतिहासकारों के अनुसार,यह संपर्क केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहा,बल्कि इससे मानवीय रिश्तों और सभ्यताओं के बीच परस्पर समझ को भी मजबूती मिली।


इस अभियान को भारत की समुद्री विरासत को समझने,संरक्षित करने और जीवंत रखने के प्रयासों में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में कहा कि यह ऐतिहासिक अभियान प्राचीन समुद्री विरासत को एक जीवित समुद्री यात्रा के जरिये पुनर्जीवित करने और उसका जश्न मनाने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे प्रयास युवाओं और शोधकर्ताओं को प्रेरित करेंगे,ताकि वे समुद्री इतिहास और नौसंचालन परंपराओं को नए दृष्टिकोण से समझ सकें।

आईएनएसवी कौंडिन्य को रवाना करने के लिए आयोजित समारोह में वेस्टर्न नेवल कमांड के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ,वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। उनके साथ भारत में ओमान सल्तनत के राजदूत महामहिम इस्सा सालेह अल शिबानी,भारतीय नौसेना के वरिष्ठ अधिकारी और विशिष्ट अतिथि भी मौजूद रहे। जहाज को औपचारिक रूप से हरी झंडी दिखाने के इस अवसर ने यह संदेश भी दिया कि भारत और ओमान के समुद्री संबंध केवल राजनयिक नहीं,बल्कि ऐतिहासिक और भावनात्मक गहराई से जुड़े हुए हैं।

यह सेलिंग वेसल आधुनिक नेविगेशन उपकरणों के न्यूनतम उपयोग के साथ पारंपरिक नौसंचालन कौशल को बढ़ावा देता है। चालक दल को समुद्री धाराओं,हवाओं और तारों के सहारे दिशा का अनुमान लगाने जैसे पुराने तरीकों का अनुभव करने का अवसर मिलेगा। ऐसा करके भारतीय नौसेना न केवल अपने कर्मियों में आत्मनिर्भरता और पारंपरिक कौशल का विकास कर रही है,बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रही है कि आधुनिक तकनीक के दौर में पुरातन ज्ञान की उपयोगिता को भुलाया न जाए।

यात्रा के दौरान आईएनएसवी कौंडिन्य कई सांकेतिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का हिस्सा बनेगा,जिनका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में साझा विरासत को उजागर करना है। मस्कट में आयोजित होने वाले स्वागत समारोहों में दोनों देशों के नौसैनिक अधिकारी,इतिहासकार और समुद्री विशेषज्ञ इस अभियान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और समकालीन महत्व पर चर्चा करेंगे। इससे दोनों देशों के बीच नौसैनिक सहयोग,समुद्री सुरक्षा और मानव-से-मानव संबंधों को और प्रगाढ़ बनाने की उम्मीद है।

इस अभियान का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह भारत की स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता और कारीगर परंपरा पर भरोसे को दोहराता है। पारंपरिक तकनीकों के पुनरुत्थान से न केवल लोक-ज्ञान सुरक्षित रहता है,बल्कि स्थानीय कारीगरों को पहचान और प्रोत्साहन भी मिलता है। कौंडिन्य की सफलता भविष्य में ऐसे और प्रोजेक्ट्स को प्रेरित कर सकती है,जिनमें इतिहास,संस्कृति और आधुनिक नौसैनिक जरूरतों का सुंदर संगम दिखाई दे।

समग्र रूप से देखा जाए तो आईएनएसवी कौंडिन्य की यह पहली विदेशी यात्रा एक साधारण नौसैनिक अभियान से कहीं अधिक है। यह भारत के समुद्री अतीत का सम्मान,वर्तमान की क्षमता का प्रदर्शन और भविष्य के लिए एक दृष्टि—इन तीनों का मिलाजुला रूप है। जब यह जहाज अरब सागर की लहरों को चीरते हुए मस्कट की ओर बढ़ रहा है,तब इसके साथ भारत की सदियों पुरानी समुद्री कहानियाँ,कारीगरी की खुशबू और मित्रता का संदेश भी सफर कर रहा है।